इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने राज्य प्रशासन द्वारा उस जमीन मालिक को पूरा मुआवजा न देने पर कड़ी नाराजगी जताई है, जिसके परिवार की ज़मीन 65 साल पहले 1959 में अधिग्रहित की गई थी. कोर्ट ने लखनऊ के अतिरिक्त ज़िला मजिस्ट्रेट और मुख्य कोषागार अधिकारी को 6 अक्टूबर को व्यक्तिगत रूप से पेश होने और यह बताने के लिए तलब किया है कि ‘जमीन अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन प्राधिकरण’ के आदेशों का पालन न करने पर उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई क्यों न की जाए.

जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस मंजीव शुक्ला की बेंच ने सोमवार को ज़मीन मालिक राजकुमार शैलेंद्र सिंह की याचिका पर यह आदेश पारित किया. कोर्ट ने गौर किया कि जमीन अधिग्रहण की मूल कार्यवाही 1959 की थी, जबकि मुआवजे की वसूली के लिए निष्पादन कार्यवाही 2019 से लंबित थी. इसके बावजूद, याचिकाकर्ता को अभी तक उसका पूरा मुआवजा नहीं मिला था.
2007 में अवार्ड के खिलाफ पहली अपील दायर
कोर्ट को बताया गया कि कलेक्टर ने 14 अक्टूबर 1959 को मूल अवार्ड पारित किया था. ये खबर आप क्विक समाचार में पढ़ रहे हैं। इसके बाद रेफरेंस कोर्ट ने 6 सितंबर 1996 को अपना अवार्ड पारित किया. राज्य ने 2007 में अवार्ड के खिलाफ पहली अपील दायर की, जिसे 9 सितंबर 2019 को खारिज कर दिया गया.
मुआवजे के तौर पर केवल 11.72 लाख रुपए मिले
कानूनी कार्यवाही पूरी होने के बावजूद, याचिकाकर्ता को अब तक मुआवजे के तौर पर केवल 11.72 लाख रुपए मिले हैं. LARA के अनुसार, अगस्त 2025 तक याचिकाकर्ता को 38.25 लाख रुपए का भुगतान किया जाना था. याचिकाकर्ता के वकील अमित जायसवाल ने कहा कि बकाया राशि पर 15 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से ब्याज भी देय था.
सुनवाई की अगली तारीख 6 अक्टूबर तय
बेंच ने पाया कि LARA द्वारा पारित कई आदेशों का पालन नहीं किया गया था. इसने ADM और मुख्य कोषागार अधिकारी को 6 अक्टूबर को उपस्थित रहने और आदेशों का पालन न करने के कारणों तथा उनके खिलाफ कार्रवाई क्यों न की जाए, इस पर स्पष्टीकरण देने का निर्देश दिया. कोर्ट ने सुनवाई की अगली तारीख 6 अक्टूबर तय की है.