क्या सिंधिया परिवार ने महात्मा गांधी को 25 लाख रुपए दिए थे? यह है पूरी कहानी​

क्या सिंधिया परिवार ने महात्मा गांधी को 25 लाख रुपए दिए थे? यह है पूरी कहानी​

महात्मा गांधी अभी भी देश ही नहीं पूरी दुनिया के लिए शोध का विषय हैं. ज्यादातर भारतवासी उन पर आज भी गर्व महसूस करते हैं. दुनिया छोड़ने के दशकों बाद गांधी चर्चा में हैं तो उन्हें लेकर अनेक किस्सेकहानियां समयसमय पर सामने आते रहते हैं. ऐसा ही एक किस्सा है कि क्या सिंधिया परिवार ने असहयोग आंदोलन के लिए महात्मा गांधी को 25 लाख रुपये की मदद की थी? गांधी जयंती के मौके पर जानिए इसकी पूरी सच्चाई.

असल में इस कहानी को यूं तो इतिहासकार स्वीकार नहीं करते. लेकिन अगर कोई दस्तावेजी सुबूत सामने हो तो इनकार करना बेमानी हो जाता है. उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में स्थित महुआ डाबर संग्रहालय के प्रमुख डॉ शाह आलम राना इस सिलसिले में मध्य प्रदेश के भिंड जिले के एक गजेटियर का न केवल उल्लेख करते हैं बल्कि दस्तावेज भी देते हैं. इसमें पेज संख्या 37 पर साल 1922 में हुए असहयोग आंदोलन की चर्चा की गई है.

महात्मा गांधी का मध्य भारत का दौरा

कहा गया है की गांधी ने असहयोग आंदोलन को हवा देने के इरादे से मध्य भारत का दौरा करने का फैसला किया. उनके लिए जो रूट तय किया गया उसमें ग्वालियर भी था और झांसी भी था. तब सिंधिया घराने की गद्दी पर सर माधो राव सिंधिया प्रथम को गांधी के आगमन की जानकारी मिली तो वे असमंजस में पड़ गए. उनके मन में यह भाव था की अगर गांधी उनके राज्य से गुजरते हैं तो अंग्रेजों को खराब लग सकता है. ऐसे में उनके सामने एक विकल्प यह था कि वे उन्हें अपने राज्य से न गुजरने दें. इसमें एक अलग तरह का जोखिम था.

महात्मा गांधी. फोटो: Getty Images

अंग्रेजों की नजर में तो उठ जाते लेकिन देश की जनता शायद उनके प्रति अच्छा रुख नहीं रखती. महाराजा सिंधिया ने अपने गृह मंत्री सदा शिवराव पवार को सीधे गांधी के पास भेज दिया. गजेटियर में उल्लेख है की उन्होंने जुबानी संदेश भी भेजा, जिसमें गांधी के प्रति आदर की बात कनवे करना था. ये खबर आप क्विक समाचार में पढ़ रहे हैं। इसी के साथ 25 लाख रुपये नगद का एक बॉक्स में भी भेजा गया. यह फंड सिंधिया ने कांग्रेस के लिए भेजा था. यह गजट साल 1996 में प्रकाशित हुआ था. डॉ राना डॉ. डीआर मानकेकर की एक किताब एसेसन टू एक्स टिंकसन के हवाले से भी इस सूचना की पुष्टि करते हैं.

माधो राव सिंधिया प्रथम.

गांधी को क्यों शुरू करना पड़ा असहयोग आंदोलन?

साल 1919 में ब्रिटिश सरकार ने रॉलेट एक्ट लागू किया. इस कानून से सरकार को लोगों को बिना मुकदमे के गिरफ्तार करने और जेल में रखने की ताकत मिली. पंजाब में विरोध हुआ. उसी साल अमृतसर के जलियांवाला बाग में निहत्थे लोगों पर गोली चलाई गई. इस घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया. इसी दौर में खिलाफत का मुद्दा भी सामने आया. प्रथम विश्व युद्ध के बाद तुर्की के खलीफा की स्थिति और पवित्र स्थलों को लेकर भारतीय मुसलमानों में चिंता थी. गांधी ने पंजाब के अन्याय और खिलाफत के सवाल को ब्रिटिश शासन के खिलाफ बड़े आंदोलन से जोड़ा. उनका विचार था कि यदि भारतीय ब्रिटिश संस्थाओं और सामान का साथ देना बंद कर दें, तो शासन की ताकत कमजोर होगी.

असहयोग आंदोलन को खूब मिला जनसमर्थन

1920 में कांग्रेस ने असहयोग का रास्ता अपनाया. गांधी ने लोगों से सरकारी उपाधियां लौटाने, सरकारी स्कूलों और अदालतों से दूरी बनाने, विदेशी कपड़ों का बहिष्कार करने और स्वदेशी को अपनाने की अपील की. आंदोलन का जोर अहिंसा पर था. छात्रों, वकीलों, व्यापारियों और आम लोगों ने अलगअलग रूप में इसमें हिस्सा लिया. कई लोगों ने सरकारी संस्थाओं का बहिष्कार किया. खादी और चरखे को स्वावलंबन का प्रतीक बनाया गया. यह केवल नेताओं का अभियान नहीं रहा. इसकी पहुंच कस्बों और गांवों तक बढ़ी. इतिहासकार बिपिन चंद्र और उनके सह लेखकों ने इंडियाज स्ट्रगल फॉर इंडिपेंडेंस में असहयोग आंदोलन को राष्ट्रीय आंदोलन के जनाधार के विस्तार का अहम चरण बताया है.

क्या आंदोलन को चलाने के लिए धन की जरूरत थी?

किसी भी आंदोलन को चलाने के लिए धन की जरूरत होना स्वाभाविक है. प्रचार, स्वयंसेवक, सभाएं, शिक्षा और संगठन सबमें धन लगता है. ऐसे में इस बात से इनकार करना बेमानी होगा कि कांग्रेस को फंड की जरूरत नहीं थी. कांग्रेस और स्थानीय संगठनों को भी धन की जरूरत पड़ती थी. यह धन लोग ही देते थे, हैं और आगे भी यह सिलसिला चलने की उम्मीद है.

सिंधिया परिवार ने 25 लाख रुपये की रकम दी या नहीं दी, यह सवाल हो सकता है. गजेटियर में स्पष्ट है कि पैसा किसने दिया, कैसे दिया? और यह रकम सन्दूक में रखकर दी गई. डॉ. राना कहते हैं की गजेटियर एक सरकारी दस्तावेज है, ऐसे में इसे झूठ नहीं कहा जा सकता. उनका कहना है कि यह कहानी बहुत ज्यादा इसलिए नहीं पॉपुलर हुई क्योंकि सिंधिया परिवार से जुड़ी हुई थी. इसलिए भी क्योंकि उस जमाने में डाक्यूमेंटेशन का पुख्ता तरीका कम होता था.

कुछ यूं हुआ आंदोलन का अंत

असहयोग आंदोलन के दौरान देश में कई जगह तनाव बढ़ा. 1922 में चौरीचौरा की हिंसक घटना के बाद गांधी ने आंदोलन रोकने का फैसला किया. उनके लिए अहिंसा आंदोलन का मूल आधार थी. इस निर्णय से कांग्रेस के भीतर मतभेद भी हुए. कुछ नेताओं को लगा कि आंदोलन को जारी रखना चाहिए. गांधी का मत था कि हिंसा के माहौल में आगे बढ़ना उचित नहीं होगा. इस तरह धीरेधीरे आंदोलन धीमा पड़ गया.

इस तरह कहा जा सकता है सिंधिया परिवार ने असहयोग आंदोलन के लिए 25 लाख रुपये दिए थे, उह पुख्ता होने के लिए जब तक दान की रसीद, पत्र, कांग्रेस की लेखापुस्तक, समकालीन अखबार या किसी प्रमाणित इतिहासग्रंथ का स्पष्ट संदर्भ न मिले, तब तक इसे उस तरह से पुष्ट नहीं कहा जा सकता. भले ही गजेटियर में इस घटना का उल्लेख है. इतिहास में दान की बातों को जांचते समय मूल दस्तावेज और संदर्भ बहुत महत्वपूर्ण होते हैं. रकम का उल्लेख भर पर्याप्त नहीं है.

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