विदेशी दुर्लभ जानवर…नवाब वाजिद अली का चिड़ियाघर कितने में नीलाम हुआ?

विदेशी दुर्लभ जानवर…नवाब वाजिद अली का चिड़ियाघर कितने में नीलाम हुआ?

ब्रिटिश सरकार यह फैसला पहले ही कर चुकी थी कि अवध के आख़िरी बादशाह वाज़िद अली शाह की मौत के बाद उनका कोई वंशज शाही विरासत का दावा नहीं पेश कर सकेगा. 21 सितंबर 1887 को बादशाह की जीवन लीला समाप्त हुई. जल्दी ही ब्रिटिश हुकूमत ने कलकत्ता के गार्डन रिज जहां बादशाह ने जिंदगी के आखिरी तीन दशक गुजारे थे, की संपत्तियों की नीलामी और वे चीजें, जो राजशाही की याद दिला सकती थीं, की नीलामी शुरू कर दी. इस सूची में उस चिड़ियाघर के जानवर और पक्षी भी थे, जिन्हें बादशाह आखिरी दौर में बेगमों से ज्यादा प्यार करने लगे थे.

विदेशी दुर्लभ जानवर…नवाब वाजिद अली का चिड़ियाघर कितने में नीलाम हुआ?

खरीद में बहावलपुर के नवाब और अफगानिस्तान के राजदूत भी शामिल थे. अलीपुर चिड़ियाघर के डायरेक्टर राम ब्रह्म सान्याल ने दो हजार में दो गैंडे और साठ रुपए में एक काफी बड़ा चूहा खरीदा था. फरवरी 1888 तक उस चिड़ियाघर जिसमें दुर्लभ देशी विदेशी जानवरपक्षी इकट्ठा करने में बादशाह ने दिल खोलकर खर्च किया था, की नीलामी से कुल तीस हजार की रकम जुटी थी. पढ़िए वाज़िद अली शाह की मौत के बाद का हाल.

आगे किसी को बादशाह का ख़िताब नहीं

वाज़िद अली शाह को बता दिया गया था कि बादशाह का ख़िताब उनके साथ ही खत्म हो जाएगा और उनका कोई वारिस इसकी दावेदारी पेश नहीं कर सकेगा. फिर भी ब्रिटिश सरकार 21 सितंबर 1887 को बादशाह की मौत के बाद फिक्रमंद थी कि उनका बड़ा बेटा शहज़ादा कमर क़द्र दावेदारी पेश कर बगावत जैसे हालात न पैदा कर दे.

वाजिद अली शाह.

सरकार इस बात को लेकर सचेत थी कि बादशाह की मौत के बाद उनकी दौलत की लूटपाट न शुरू हो जाए. इस वक्त तक गार्डन रिज में लगभग पांच हजार ऐसे लोग थे, जिनकी रोजीरोटी बादशाह के भरोसे थी. इसके अलावा दो निकाहशुदा और अन्य दोढ़ाई सौ मुताह बेगमें, इक्कीस बेटे, छब्बीस बेटियों सहित परिवार के तकरीबन एक हजार सदस्य अथवा उनके सेवक शामिल थे.

तार के जवाब के लिए दो रुपए की पेशगी

बादशाह ने कोई वसीयत नहीं की थी. ऐसे में सरकार को अंदेशा था कि उनके विशाल परिवार में संपत्ति का विवाद हिंसक रूप भी ले सकता है. बादशाह की मृत्यु के एक हफ्ते पहले स्टेट्समैन अख़बार के रिपोर्टर ने लिखा, “बादशाह बिस्तर पर पड़े हैं और उनके नौकरचाकर उनके मालअसबाब पर हाथ साफ कर रहे हैं. यहां तक कि गाड़ियों में भरकर उनका सामान ले जाया जा रहा है. “

बादशाह की निकाहशुदा पहली बेगम ख़ासमहल ने लेफ्टिनेंट गवर्नर को तीन तार भेजे. इनमें एक के साथ जवाबी तार खर्च के लिए दो रुपए की रकम चुकाई गई थी. तार में प्रार्थना थी, ” ख़ुदा और महामहिम आप तथा महारानी विक्टोरिया की खैर करे. मुझे भरोसा है कि बेवा को आपकी रहम हासिल होगी. तार से जवाब के लिए दो रुपए पहले ही चुकता कर दिए हैं. ” इस अपील का उन्हें कोई जवाब नहीं मिला. संबंधित क्लर्क ने दो रुपए की वापसी के बारे में जानना चाहा था. उसे इसे भूल जाने की नसीहत दी गई थी.

कैसरबाग का ग्रेट गेट, नवाब की सम्पत्ति का हिस्सा था. फोटो: Getty Images

बादशाह की जायदाद के दर्जनों हिस्सेदार

कर्नल प्राइडाक्स पर बादशाह की गार्डन रिज की जागीर की सम्पत्ति का ब्यौरा जुटाने और नीलामी की जिम्मेदारी थी. मुस्लिम कानून के तहत बादशाह की संपत्ति के दो जीवित निकाहशुदा बीवियां और 47 जायज बच्चे हक़दार थे. ये खबर आप क्विक समाचार में पढ़ रहे हैं। जेवरात बहुत कम बचे थे. मुमकिन है कि इन्हें बादशाह ने अपनी तमाम मुताह बेगमों के बीच बांट दिया हो.

प्राइडाक्स ने जब शाही जेवरात की हिफाज़त करने वाले भीकन खान से इनकी वापसी के लिए कहा तो उसने जवाब दिया कि उसके पास कोई जेवर नहीं है. मुताह बेगमों ने अपने नाम रजिस्टर में दर्ज ब्यौरों को गलत बताया. कुछ ने कहा कि वे उन्हें बेच चुकी हैं. प्राइडाक्स ने महसूस किया कि इस सिलसिले की कोशिशों से बदमजगी बढ़ेगी और हासिल कुछ नहीं होगा. इसलिए बेहतर है , जो सामने दिख रहा और कब्ज़े में है, उसे नीलाम कर फुर्सत ली जाए.

कुल जायदाद की कीमत नौ लाख

अचल संपत्तियों के साथ ही चांदी से मढ़े बेड, झाड़फानूस और कीमती साजसामानों को नीलामी के मकसद से कीमत नौ लाख रुपए तय की गई. दो ब्रिटिश कम्पनियां इस खरीद के लिए आगे आईं. मार्च 1888 के दूसरे हफ्ते से जून 1888 के पहले हफ्ते के बीच नीलामी का काम निपट चुका था. शहज़ादा कमर क़द्र ने बादशाह की रिहाइश वाले मकानों सुल्तानख़ाना और गोसाईं सुल्तानी की बिक्री इस आधार पर रोकने की कोशिश की , कि उनके भीतर छोटी मस्जिदें और इमामबाड़े बने हुए थे. मस्जिद में नमाज पढ़े जाने की दलील भी दी गई.

अफसर नीलामी को टालना नहीं चाहते थे. सरकारी वकील ने रास्ता सुझाया कि जहां मस्जिद है, उसके चारों ओर बैरिकेडिंग कर दी जाए. 1890 के मध्य तक बादशाह के निवास सुल्तानख़ाना का दक्षिणी हिस्सा रेलवे के जनरल मैनेजर का निवास बन गए. शहज़ादे की कोशिश से एक छोटी मस्जिद बच सकी. फ़िलहाल गार्डन रिज की निशानी के नाम पर वहां वाज़िद अली शाह रोड पर क़ब्रगाह सिबतैनाबाद इमामबाड़ा है. वहां उनकी कब्र शीशे और लोहे की जाली से घिरी एक छोटे कमरे में है.

बादशाह ने चिड़ियाघर में दुर्लभ देशीविदेशी जानवरपक्षी इकट्ठा करने के लिए दिल खोलकर खर्च किया था. फोटो: AI Generated

सबसे कीमती चिड़ियाघर

बादशाह की मौत के पहले ब्रिटिश एजेंट का अनुमान था कि उनकी मौजूदा संपत्ति में संभवत सबसे कीमती चिड़ियाघर और गैसजल संस्थान की मशीनरी है. अक्टूबर 1887 तक देखभाल और खाने के अभाव में चिड़ियाघर के तमाम जानवर मरने लगे. कलकत्ता के मशहूर पशु विशेषज्ञ रटलेज जिसने बादशाह के समय इस चिड़ियाघर के लिए काफी पशु पक्षियों की व्यवस्था की थी, को नीलामी की रकम का दस फीसद कमीशन की शर्त पर इस काम से जोड़ा गया. सूची बनाने के साथ ही उन चिड़ियों को भी वापस लाना था, जो पास पड़ोस की इमारतों पर डेरा डाले हुए थीं.

पशुपक्षियों को बेचने से पहले जिंदा रखने के लिए खिलाने की जिम्मेदारी भी रटलेज को सौंपी गई. रटलेज को बादशाह के अस्तबल और उनकी गाड़ियों की जिम्मेदारी के साथ बड़ी संख्या में बचे नौकरों पर निगाह रखने का भी भार सौंपा गया.

चंद महीनों में गार्डन रिज हुआ वीरान

तय पाया गया कि पक्षियों को झुंड में बेचने की जगह पिंजड़ों में बेचने पर ज्यादा कीमत मिलेगी. गार्डन रिज के मकानों से अट्ठारह हजार कबूतर और अन्य पक्षी पकड़ कर पिंजरों में पहुंचाए गए. पार्को में विचर रहे हिरनों पर घेरा डाला गया. लगभग सौ मोर पकड़े गए. बहावलपुर के नवाब और अफगानिस्तान के राजदूत ने भी कुछ पशु खरीदे. अलीपुर चिड़ियाघर के डायरेक्टर राम ब्रह्म सान्याल ने दो हजार में दो गैंडे और साठ रुपए में एक काफी बड़ा चूहा खरीदा था.

फरवरी 1888 तक उस चिड़ियाघर जिसमें दुर्लभ देशीविदेशी जानवरपक्षी इकट्ठा करने में बादशाह ने दिल खोलकर खर्च किया था, वीरान हो चुका था. नीलामी करने वाली मिल्टन एंड कम्पनी और प्राइडाक्स का मानना था कि बेहतर इंतजाम की बदौलत नीलामी से जुटी तीस हजार की रकम काफी संतोषजनक रही. बात दीगर है कि बादशाह ने अपने इस शौक के लिए जितनी बड़ी राशि खर्च की थी, उसका यह मामूली हिस्सा भी नहीं था.

चंद महीनों के भीतर वे हजारों लोग जो किसी न किसी तौर पर आश्रित थे , इधरउधर रोजीरोजगार के लिए कहीं अन्यत्र रवाना हुए या फिर कलकत्ता में ही हाथपैर मारते रहे. बेगमों और वंशजों के लिए सबसे मुश्किल समय था, क्योंकि उन्होंने कभी कोई काम नहीं किया था और उनके सिर पर अब किसी बादशाह का हाथ नहीं था.

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