कमीशन और कमाई पर यूपी के कोटेदारों का बवाल, किस राज्य में कितना मिलता है?

कमीशन और कमाई पर यूपी के कोटेदारों का बवाल, किस राज्य में कितना मिलता है?

देश में करीबन 80 करोड़ लोग हर महीने मुफ्त या रियायती दर पर PDS यानी पब्लिक डिस्ट्रिब्यूशन सिस्टम के तहत राशन अनाज लेते हैं. इस पूरी व्यवस्था का सबसे अहम हिस्सा फेयर प्राइस शॉप , यानी राशन की दुकानें हैं. आम बोलचाल की भाषा में इन दुकानों को कोटे की दुकान कहा जाता है. इन्हें संचालित करने वाला व्यक्ति कोटेदार कहलाता है. सरकार के आंकड़ों के मुताबिक देश में 5.4 लाख से अधिक राशन की दुकानें संचालित हैं.

कमीशन और कमाई पर यूपी के कोटेदारों का बवाल, किस राज्य में कितना मिलता है?

कोटे की दुकानों के जरिए ही राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत पात्र परिवारों को गेहूं, चावल और अन्य खाद्यान्न दिया जाता है. हाल के सालों में कई राज्यों में कोटेदारों ने कम कमीशन, बढ़ते परिचालन खर्च और सरकारी कर्मचारी का दर्जा देने की मांग को लेकर आंदोलन भी किया. अब उत्तर प्रदेश के राशन कोटेदारों ने 28 जुलाई 2026 को लखनऊ में कमीशन बढ़ाने और बकाया भुगतान की मांग को लेकर भारी प्रदर्शन किया.

कोटेदारों ने मांगें न माने जाने पर अगस्त महीने में पूरे प्रदेश में राशन वितरण बंद करने की चेतावनी दी है. यूपी में कोटेदारों को प्रति क्विंटल केवल 90 रुपये लाभांश मिलता है, जिसे बढ़ाकर 200 रुपये प्रति क्विंटल करने की मांग है. उनका कहना है कि हरियाणा, गोवा और गुजरात जैसे अन्य राज्यों में कमीशन और मानदेय काफी अधिक हैं. इसके अलावा लंबित भुगतानों से भी वह नाराज हैं.

कोटेदारों की कमाई कैसे होती है?

  • कोटेदारों को वेतन नहीं मिलता उनकी आय मुख्य रूप से राशन वितरण पर मिलने वाले कमीशन पर आधारित होती है.
  • केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत राज्यों को प्रति क्विंटल अनाज वितरण पर एक निश्चित वित्तीय सहायता देती है.
  • इसके अलावा राज्य सरकारें भी अपने स्तर पर अतिरिक्त कमीशन या मानदेय भी दे सकती हैं.
  • इसका साफ अर्थ है यह है कि पूरे देश में कोटेदारों की कमाई एक जैसी नहीं होती है.

साल 2022 में केंद्र सरकार ने सामान्य राज्यों में कोटेदारों को 90 प्रति क्विंटल और पूर्वोत्तर, हिमालयी और द्वीपीय राज्य के लिए 180 रुपये प्रति क्विंटल का बेसिक मार्जिन तय किया था. इसके अलावा ईपीओएस मशीन के जरिए अनाज वितरण पर भी अतिरिक्त राशि सहायता के तौर पर दी जाती है. ये खबर आप क्विक समाचार में पढ़ रहे हैं। हालांकि, यह राशि सीधे कोटेदारों के खाते में नहीं आती है, बल्कि केंद्र सरकार की तरफ से राज्य सरकार को मुहैया कराई जाती है. अगर राज्य सरकार चाहें तो अपने बजट से इसके लिए कोटेदारों को भुगतान कर सकता है. हर राज्य में कोटेदारों की कमीशन और आय अलगअलग होती है.

किस राज्य में कोटेदारों को कितना कमीशन मिलता है?

  • उत्तर प्रदेश में कोटेदारों को राशन वितरण के लिए 90 रुपये प्रति क्विंटल मिलता है.
  • बिहार में कोटेदारों को कुल 258.40 रुपये प्रति क्विंटल कमीशन मिलता है.
  • महाराष्ट्र में राशन दुकानदारों या कोटेदारों को प्रति क्विंटल 170 रुपये का कमीशन मिलता है.
  • राजस्थान में राशन डीलरों को गेहूं वितरण पर 150.70 रुपये प्रति क्विंटल कमीशन मिलता है.
  • मध्य प्रदेश में 70 रुपये प्रति क्विंटल की दर से कोटेदारों को कमीशन दिया जाता है.
  • छत्तीसगढ़ में कोटेदारों को 120 रुपये प्रति कुंतल दिया जाता है.

कोटेदारों को अतिरिक्त आय के लिए और कौन सी सुविधाएं दी जाती है?

यूपी में कोटेदारों को राशन वितरण पर ईपीओएस मशीन, डिजिटल भुगतान और वितरण व्यवस्था से जुड़ी कई सुविधाएं दी जाती हैं ताकि उनकी अधिक आमदनी हो सके. राजस्थान में राज्य सरकार कोटेदारों को अतिरिक्त मार्जिन देती है. इसके अलावा कई राशन दुकानों को ईमित्र सेवाओं से भी जोड़ा गया है. इससे कोटेदार बिजली बिल जमा कराने, प्रमाण पत्र और अन्य सरकारी सेवाओं के जरिए एक्सट्रा आय हासिल कर सकते हैं.

मध्य प्रदेश पर भी कई राशन की दुकानों को कॉमन सर्विस सेंटर जैसी सेवाओं से जोड़ा गया है ताकि कोटेदारों को डिजिटल सर्विस के जरिए एक्स्ट्रा आय हासिल हो सके.उधर केरल और तमिलनाडु में अधिकांश राशन दुकानें सहकारी संस्थाओं के जरिए चलाई जाती हैं. यहां कई दुकानों में कर्मचारियों को नियमित वेतन और अन्य सुविधाएं भी मिलती हैं,

एक कोटेदार की औसत कमाई कितनी होती है?

कोटेदार की मासिक आय पूरी तरह इस बात पर निर्भर करती है कि उसकी दुकान से कितने राशन कार्ड जुड़े हैं और हर महीने कितना राशन का वितरण किया जा रहा है. आमतौर पर छोटे गांवों में संचालित राशन दुकानों की मासिक आय 8,000 से 15,000 रुपये के बीच होती है. वहीं, मध्यम आकार की दुकानों में यह आय 15,000 से 30,000 रुपये तक पहुंच सकती है. जिन दुकानों से बड़ी संख्या में लाभार्थी जुड़े हैं, वहां कोटेदारों को 40,000 से 50,000 रुपये आमदनी हासिल हो सकती है. लेकिन कोटेदारों का कहना है कि दुकान का किराया, बिजली, कर्मचारी, परिवहन और अन्य खर्च निकालने के बाद बचत काफी कम होता है.

कोटेदारों की लंबे समय से क्या रही है मांग?

इस बीच कई राज्यों में कोटेदारों की तरफ से आंदोलन की खबरें आती रही हैं. वह 30,000 से 50,000 मासिक मानदेय, सरकारी कर्मचारी का दर्जा, पेंशन, स्वास्थ्य बीमा, दुर्घटना बीमा, परिवहन खर्च का पूरा भुगतान और समयसमय पर कमीशन में बढ़ोतरी मांगों को उठाते रहे हैं. उनका कहना है कि मुफ्त राशन योजना का दायरा बढ़ने के साथ काम का बोझ भी बढ़ा है, लेकिन कमीशन उसी अनुपात में नहीं बढ़ा. इसके अलावा उन पर डिजिटल सत्यापन, आधार प्रमाणीकरण और रिकॉर्ड रखने जैसी नई जिम्मेदारियां भी आ गई हैं.

पूरे देश में एक जैसा कमीशन क्यों नहीं?

भारत में सार्वजनिक वितरण प्रणाली केंद्र और राज्य सरकार मिलकर संभालती हैं. केंद्र सरकार खाद्यान्न उपलब्ध कराती है और न्यूनतम वित्तीय सहायता तय करती है, जबकि राशन दुकानों के संचालन, अतिरिक्त कमीशन, मानदेय और अन्य सुविधाओं का फैसला राज्य सरकारें अपने बजट और नीतियों के अनुसार करती हैं. यही वजह है कि हर राज्य में कोटेदारों की आय और सुविधाओं में बड़ा अंतर देखने को मिलता है.

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