गुरुदेव रवींन्द्र नाथ टैगोर भारत की थाती थे, हैं और रहेंगे. अंग्रेजी राज में भी उन्होंने अपनी कलम से कभी समझौता नहीं किया. वे ब्रिटेन के राजा के सम्मान में गीत लिखने से इनकार करने वाली हस्ती थे. उस जमाने में यह कोई आसान नहीं था. वे कवि थे. दार्शनिक थे. शिक्षाविद थे. स्वतंत्र चेतना के बड़े ध्वज वाहक भी. उन्हीं की रचना जनगणमन आज भारत का राष्ट्रगान है. लेकिन इस गीत को लेकर एक विवाद बारबार उठता रहा है. सवाल पूछा जाता है कि क्या टैगोर ने यह गीत ब्रिटेन के राजा जॉर्ज पंचम के सम्मान में लिखा था? क्या अधिनायक और भारत भाग्य विधाता जैसे शब्द अंग्रेजी सम्राट के लिए थे?

आइए, गुरुदेव की पुण्यतिथि के बहाने समझते हैं इस विवाद की असलियत. जानते हैं कि जनगणमन उन्होंने वाकई किसके सम्मान में लिखा. अधिनायक शब्द के असल मायने क्या है?
जनगणमन की रचना कब हुई?
गुरुदेव टैगोर ने 1911 में जनगणमन गीत लिखा था. इसका मूल नाम भारतो भाग्यो बिधाता था. यह संस्कृतनिष्ठ बांग्ला में लिखा गया एक ब्रह्मोगीत था. इसका पहला अंतरा आज भारत का राष्ट्रगान है. इसे पहली बार 27 दिसंबर 1911 को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में गाया गया था. 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा ने इसके पहले अंतरे को भारत के राष्ट्रगान के रूप में अपनाया. टैगोर ने भारत का राष्ट्रगान ही नहीं लिखा. बांग्लादेश का राष्ट्रगान आमार सोनार बांग्ला भी उन्हीं की रचना है. यह अपने आप में असाधारण उपलब्धि है.
रबींद्रनाथ टैगोर.
जॉर्ज पंचम से विवाद कैसे जुड़ा?
साल 1911 में ब्रिटेन के राजा जॉर्ज पंचम भारत आए थे. उसी वर्ष दिल्ली दरबार हुआ. ब्रिटिश शासन ने इस आयोजन को बहुत बड़े साम्राज्यवादी उत्सव की तरह पेश किया. संयोग यह था कि जनगणमन भी उसी समय लिखा गया और कांग्रेस अधिवेशन में गाया गया. इस समय ने भ्रम पैदा किया. कुछ अंग्रेजी अखबारों ने यह धारणा फैलाई कि टैगोर का गीत राजा जॉर्ज पंचम के स्वागत में लिखा गया. तब के एंग्लोइंडियन प्रेस ने गीत के अर्थ की गहराई पर ध्यान नहीं दिया. उसने राजनीतिक माहौल को देखकर इसे शाही स्वागतगीत मान लिया. यही गलत रिपोर्टिंग बाद में लंबे विवाद का कारण बनी. कई वर्षों तक यह बात दोहराई जाती रही कि टैगोर ने ब्रिटिश सम्राट की प्रशंसा की थी. पर, इतिहास और टैगोर के अपने स्पष्टीकरण इस दावे को स्वीकार नहीं करते.
टैगोर ने खुद क्या कहा था?
टैगोर ने इस आरोप से दुखी होकर साफ शब्दों में अपना पक्ष रखा था. साल 1937 में लिखे एक पत्र में उन्होंने बताया कि उनके एक मित्र ने उनसे राजा के स्वागत में गीत लिखने का अनुरोध किया था और इसे उन्होंने स्वीकार नहीं किया. उन्होंने लिखा कि इस आग्रह से उनके मन में गहरी बेचैनी हुई. उसी प्रतिक्रिया में उन्होंने भारत भाग्य विधाता की विजय का गीत लिखा. गुरुदेव के अनुसार भाग्य विधाता वह शक्ति है जो भारत के रथ को हर उतारचढ़ाव में संभालती रही है.
टैगोर ने स्पष्ट कहा था कि वह न जॉर्ज पंचम हो सकता है, न जॉर्ज षष्ठम, और न कोई अन्य जॉर्ज. यह स्पष्टीकरण इस विवाद का सबसे महत्वपूर्ण उत्तर है. टैगोर ने अधिनायक को किसी अंग्रेज हुक्मरान के लिए नहीं लिखा था. वे एक ऐसी शाश्वत शक्ति की बात कर रहे थे जो जनमन को प्रेरित करती है. इस संदर्भ का उल्लेख टैगोर की जीवनी और अनेक ऐतिहासिक अध्ययनों में मिलता है.
अधिनायक का क्या अर्थ है?
विवाद का एक केंद्र अधिनायक शब्द है, जो जनमनगण में बुना गया है. कुछ लोग इसे तानाशाह या शासक के अर्थ में पढ़ते हैं. फिर वे इसे ब्रिटिश राजा से जोड़ देते हैं. लेकिन कविता में शब्द का अर्थ केवल शब्दकोश से तय नहीं होता. उसका अर्थ संदर्भ से तय होता है. टैगोर की रचनाओं में ईश्वर, मानवता, आत्मा और नैतिक चेतना की उपस्थिति बारबार मिलती है. जन गण मन अधिनायक जय हे, में अधिनायक का अर्थ जनमन का नेतृत्व करने वाली महान शक्ति है. यह अधिनायक सत्ता का अहंकारी शासक नहीं है. यह जन की चेतना का पथप्रदर्शक है. अगली पंक्ति आती है, भारत भाग्य विधाता. टैगोर के लिए यह किसी राजा की प्रशस्ति नहीं थी. यह भारत की ऐतिहासिक यात्रा को दिशा देने वाली स्थायी चेतना का स्मरण था.
असली भ्रम कहां पैदा हुआ?
भ्रम केवल गीत के समय से नहीं पैदा हुआ. कार्यक्रमों की परिस्थितियों ने भी इसे बढ़ाया. कांग्रेस अधिवेशन के आसपास राजा के सम्मान से जुड़े आयोजन हुए. कुछ जगह ब्रिटिश सम्राट की प्रशंसा में अलग गीत भी लिखेगाए गए. बाद के वर्षों में इन अलगअलग घटनाओं को मिलाकर देखा गया. ये खबर आप क्विक समाचार में पढ़ रहे हैं। इससे यह गलत धारणा बनी कि जन गण मन भी उसी शाही प्रशंसा का हिस्सा था. कुछ अखबारों ने इस बात को तथ्य की तरह छापा. दूसरी ओर, बांग्ला समाचारपत्रों में इसे टैगोर का देशभक्ति और प्रार्थनागीत बताया गया. टैगोर का जीवन भी इस आरोप का जवाब है. उनके जीवन को देखें तो उन्हें ब्रिटिश सत्ता का चाटुकार कहना अनुचित होगा. वे उपनिवेशवाद के आलोचक थे. वे मनुष्य की स्वतंत्रता को सबसे ऊंचा मूल्य मानते थे.
टैगोर ने लौट दी थी नाइटहुड की उपाधि
साल 1919 के जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद टैगोर ने ब्रिटिश सरकार से मिली नाइटहुड की उपाधि लौटा दी थी. यह बहुत बड़ा नैतिक कदम था. उस समय उन्हें सर की उपाधि मिली हुई थी. उन्होंने ब्रिटिश वायसराय को पत्र लिखकर इसे भी त्याग दिया. टैगोर का संदेश साफ था. ऐसी क्रूर सत्ता के सम्मान से जुड़ना उनके लिए असंभव था. यह घटना बताती है कि वे अंग्रेजी राज की प्रशंसा के लिए कविता लिखने वाले व्यक्ति नहीं थे.
क्या टैगोर का राष्ट्रवाद अलग था?
टैगोर देश से प्रेम करते थे. पर, उनका राष्ट्रवाद संकीर्ण नहीं था. वे किसी दूसरे देश से नफरत को देशभक्ति नहीं मानते थे. वे मानवता में विश्वास करते थे. उनकी प्रसिद्ध पंक्ति है, जहां मन भय से मुक्त हो. यह केवल राजनीतिक आजादी की बात नहीं है. यह मानसिक आजादी की भी बात है. टैगोर चाहते थे कि भारत भय, अज्ञान, संकीर्णता और गुलामी की सोच से मुक्त हो. और यही उनका राष्ट्रवाद था. जनगणमन भी इसी व्यापक दृष्टि का गीत है. इसमें भारत के अलगअलग भूभागों को याद किया गया है. पंजाब, सिंध, गुजरात, मराठा, द्राविड़, उत्कल और बंग का उल्लेख है. यह गीत भारत की विविधता को एक साझा भाव में जोड़ता है.