Quit India Movement Day 2026: आज फिर गूंज रहा ‘करो या मरो’, जानिए 8 अगस्त की उस क्रांति की पूरी कहानी

Quit India Movement Day 2026: आज फिर गूंज रहा ‘करो या मरो’, जानिए 8 अगस्त की उस क्रांति की पूरी कहानी

Quit India Movement Day 2026: आज 8 अगस्त 2026 है और देश Quit India Movement Day, यानी अगस्त क्रांति दिवस मना रहा है। 1942 में आज ही के दिन मुंबई के गोवालिया टैंक मैदान से अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ एक ऐसी आवाज उठी थी, जिसने पूरे देश को एकजुट कर दिया था। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने अंग्रेजों से भारत छोड़ने की मांग रखी और महात्मा गांधी ने देश को दिया अपना ऐतिहासिक मंत्र—‘करो या मरो’। यह सिर्फ एक नारा नहीं था, बल्कि आजादी के लिए आखिरी और निर्णायक संघर्ष का ऐलान था। इसलिए हर साल 8 अगस्त को यह दिन उन लाखों भारतीयों के साहस और बलिदान को याद करने के लिए मनाया जाता है, जिन्होंने आजाद भारत का सपना देखा और उसके लिए संघर्ष किया।

Quit India Movement Day 2026: आज फिर गूंज रहा ‘करो या मरो’, जानिए 8 अगस्त की उस क्रांति की पूरी कहानी

आखिर 1942 में ऐसा क्या हुआ कि उठी ‘भारत छोड़ो’ की आवाज ?

इस आवाज के पीछे कई सालों का गुस्सा और कई ताजा वजहें थीं। 1942 में ब्रिटिश सरकार का क्रिप्स मिशन भारत को तुरंत आजादी देने में नाकाम रहा। ऊपर से ब्रिटेन ने भारतीय नेताओं से सलाह किए बिना देश को द्वितीय विश्व युद्ध में शामिल कर दिया। युद्ध के बीच महंगाई, खाने की कमी और बेरोजगारी ने आम लोगों की मुश्किलें बढ़ा दीं। अंग्रेजी सरकार की गिरफ्तारियां, सेंसरशिप और सख्त नीतियां अलग से लोगों का गुस्सा बढ़ा रही थीं। अब भारतीय नेताओं को लगने लगा था कि आधेअधूरे सुधारों से काम नहीं चलेगा। देश को चाहिए था पूरा स्वराज, और इसी सोच ने भारत छोड़ो आंदोलन की जमीन तैयार की।

गांधी की आवाज थी आगे, लेकिन लड़ाई पूरे देश की थी

8 अगस्त को गांधी ने ‘करो या मरो’ का संदेश दिया, लेकिन अगले ही दिन अंग्रेजों ने गांधी समेत कांग्रेस के कई बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर लिया। अंग्रेजों को लगा कि नेताओं को जेल में डालते ही आंदोलन शांत हो जाएगा, लेकिन हुआ इसका उल्टा। नेतृत्व की गिरफ्तारी के बाद आम लोग खुद आगे आने लगे। अरुणा आसफ अली ने गोवालिया टैंक मैदान में तिरंगा फहराकर विरोध की आवाज बुलंद की। उषा मेहता ने गुप्त कांग्रेस रेडियो के जरिए आंदोलन के संदेश लोगों तक पहुंचाए। राम मनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण जैसे नेताओं ने भूमिगत रहकर आंदोलन को आगे बढ़ाया। ये खबर आप क्विक समाचार में पढ़ रहे हैं। यानी नेताओं को कैद किया जा सकता था, लेकिन आजादी की आवाज को नहीं।

जब छात्र, किसान, मजदूर और महिलाएं बन गए आंदोलन की ताकत

यही भारत छोड़ो आंदोलन की सबसे बड़ी खासियत थी—यह सिर्फ नेताओं का आंदोलन नहीं रहा, बल्कि आम लोगों का आंदोलन बन गया। छात्र सड़कों पर उतरे, किसानों और मजदूरों ने विरोध किया और महिलाओं ने भी बढ़चढ़कर हिस्सा लिया। देश के अलगअलग हिस्सों में प्रदर्शन, हड़ताल और गुप्त गतिविधियां जारी रहीं। ब्रिटिश सरकार ने आंदोलन को दबाने के लिए गिरफ्तारियां और सख्त कार्रवाई की, लेकिन इससे लोगों का हौसला नहीं टूटा। आंदोलन को भले ही अंग्रेजों ने दबाने की कोशिश की, लेकिन उसने एक बात साफ कर दी थी—भारत अब गुलामी की जंजीरों में ज्यादा समय तक नहीं रहने वाला। 1942 की यह क्रांति 1947 की आजादी की राह में एक बड़ा मोड़ साबित हुई।

आजादी सिर्फ मिली नहीं थी, बल्कि इसके लिए लड़ाई लड़ी गई थी

आज Quit India Movement Day 2026 पर जब हम गांधी, अरुणा आसफ अली, उषा मेहता और दूसरे स्वतंत्रता सेनानियों की पुरानी तस्वीरें देखते हैं, तो वे सिर्फ इतिहास का हिस्सा नहीं लगतीं। वे याद दिलाती हैं कि आजादी की इस कहानी में लाखों जानेअनजाने चेहरों का योगदान है। अलगअलग भाषा, धर्म और इलाकों के लोग एक लक्ष्य के लिए साथ खड़े हुए थे—आजाद भारत। इसलिए 8 अगस्त सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि उस एकता और हिम्मत को याद करने का दिन है, जिसने देश को आजादी की ओर बढ़ाया। आज जब तिरंगा शान से लहराता है, तो उसके साथ 1942 की वही आवाज भी सुनाई देती है—भारत छोड़ो।

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