आजादी के शूरवीर से राम मंदिर आंदोलन के पहले सूत्रधार तक… कहानी दाऊ दयाल खन्ना की, जिनके पत्र ने बदला था देश का इतिहास

आजादी के शूरवीर से राम मंदिर आंदोलन के पहले सूत्रधार तक… कहानी दाऊ दयाल खन्ना की, जिनके पत्र ने बदला था देश का इतिहास

Daau Dayal Khanna: मुरादाबाद के अताई मोहल्ला निवासी दाऊ दयाल खन्ना भारत के इतिहास की उन दुर्लभ और अद्वितीय शख्सियतों में से थे, जिन्होंने देश की स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने के साथसाथ आजाद भारत में श्री रामजन्मभूमि मुक्ति आंदोलन की भी मजबूत नींव रखी. वर्ष 1929 में उच्च शिक्षा का त्याग कर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के माध्यम से स्वतंत्रता संग्राम में कूदे खन्ना जी ने महात्मा गांधी के आह्वान पर नमक सत्याग्रह, सविनय अवज्ञा और भारत छोड़ो आंदोलन में अग्रणी भूमिका निभाई थी.

आजादी के शूरवीर से राम मंदिर आंदोलन के पहले सूत्रधार तक… कहानी दाऊ दयाल खन्ना की, जिनके पत्र ने बदला था देश का इतिहास

इस दौरान अंग्रेजों की बर्बर यातनाएं झेलने, अनेक बार कठोर कारावास काटने और भारी आर्थिक दंड सहने के बावजूद उनका संकल्प कभी नहीं डगमगाया. स्वतंत्रता के बाद दाऊ दयाल खन्ना ने उत्तर प्रदेश सरकार में स्वास्थ्य मंत्री और मुरादाबाद नगर पालिका सदस्य के रूप में जनसेवा की अमिट छाप छोड़ी, लेकिन उनका योगदान यहीं समाप्त नहीं हुआ है. 1980 के दशक में दाऊ दयाल खन्ना ने राम मंदिर निर्माण के लिए पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को ऐतिहासिक पत्र लिखकर इस अभियान को नई दिशा दी गई थी.

स्वतंत्रता आंदोलन में पदार्पण और पहला संघर्ष

इसके बाद दिल्ली में आयोजित धर्म संसद ने इस मांग को जनआंदोलन का रूप दे दिया था. एक स्वाधीनता सेनानी, कुशल राजनेता और सांस्कृतिक पुनर्जागरण के सूत्रधार के रूप में दाऊ दयाल खन्ना का जीवन अद्वितीय निष्ठा और राष्ट्रप्रेम का प्रतीक है. छात्र जीवन में ही देश सेवा का व्रत लेने वाले दाऊ दयाल खन्ना का आवास क्रांतिकारियों और स्थानीय आंदोलनों की रणनीतियों का गुप्त केंद्र हुआ करता था. 1930 के नमक सत्याग्रह में पहली बार दाऊ दयाल खन्ना को छह माह का कारावास हुआ था. इसके बाद 1932 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में भाग लेने पर उन्हें पुन छह महीने की कठोर कैद और आर्थिक दंड की सजा दी गई थी.

दीर्घकालिक नजरबंदी और कठोर जेल यात्रा

स्वाधीनता आंदोलन के दौरान ब्रिटिश हुकूमत की नजरों में दाऊ दयाल खन्ना एक प्रमुख चुनौती बन चुके थे. वर्ष 1941 के व्यक्तिगत सत्याग्रह और 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के समय सुरक्षा कानूनों के तहत उन्हें सितंबर 1941 से जून 1944 तक लगातार लगभग तीन वर्षों के लिए जेल में नजरबंद रखा गया था. तमाम यातनाओं के बाद भी दाऊ दयाल खन्ना कभी समझौता नहीं किया था.

आजादी के बाद जनसेवा का दौर

देश आजाद होने के बाद खन्ना जी ने संसदीय राजनीति में कदम रखा और उत्तर प्रदेश विधानसभा के सदस्य निर्वाचित हुए थे. वर्ष 1962 से 1967 तक उत्तर प्रदेश सरकार में स्वास्थ्य मंत्री के पद पर रहते हुए दाऊ दयाल खन्ना ने चिकित्सा क्षेत्र और जनकल्याणकारी नीतियों के लिए अभूतपूर्व कार्य किए हैं. वह मुरादाबाद नगर पालिका के सदस्य के रूप में भी स्थानीय विकास से लगातार जुड़े रहे थे.

दो युगों के सूत्रधार, आजादी और राम मंदिर आंदोलन

दाऊ दयाल खन्ना भारत के इतिहास में शायद इकलौती ऐसी शख्सियत हैं, जिन्होंने देश की आजादी के अग्रिम मोर्चे पर लड़ाई लड़ने के साथसाथ श्री रामजन्मभूमि आंदोलन के पहले सूत्रधार की भूमिका भी निभाई है. कांग्रेस सरकार में कैबिनेट मंत्री रहने के बावजूद दाऊ दयाल खन्ना ने सांस्कृतिक निष्ठा से कभी समझौता नहीं किया था. ये खबर आप क्विक समाचार में पढ़ रहे हैं। उन्होंने ही रामजन्मभूमि की मुक्ति के लिए पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को पत्र लिखकर इस विषय को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में ला खड़ा किया था.

इसके बाद दिल्ली में आयोजित धर्म संसद ने इसे व्यापक रूप दिया और अभियान धीरेधीरे देशव्यापी आंदोलन बन गया था. एक ही जीवनकाल में देश की राजनीतिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक पुनर्जागरण दोनों के लिए ऐतिहासिक योगदान देने वाले वह देश के अनूठे राष्ट्रनायक थे.

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