Bareilly : अंग्रेजों ने तोपखाने के साथ की थी चढ़ाई मगर पीछे ने हटे नज्जूबुलंद खां

Bareilly : अंग्रेजों ने तोपखाने के साथ की थी चढ़ाई मगर पीछे ने हटे नज्जूबुलंद खां

मोनिस खान, बरेली। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अंग्रेजों ने क्रांतिकारियों के खिलाफ अपने तोपखाने बड़े पैमाने पर क्रूर इस्तेमाल किया था। बरेली के ‘बैटल ऑफ भिटौरा’ में अंग्रेजों की आग उगलती तोपों के बीच भी क्रांतिवीर नज्जू खांबुलंद खां के कदम पीछे नहीं हटे थे और शहादत देकर माटी का फर्ज निभाया था। पूर्वजों की जमीन पर परिवार जब भी आता है तो सबकी आखें नम हो जाती हैं।

साल 1794 में रामपुर नवाब फैजुल्ला की मौत के बाद उनके उत्तराधिकारियों के बीच विवाद के बीच भिटौरा के पास हुई जंग में भले रूहेलों को हार मिली थी मगर शुरुआत में बड़ी तादाद में अंग्रेज अफसर और सैनिक मारे गए थे। रुहेला लड़ाके भी शहीद हुए थे। उस समय जिला बदरी के कारण बड़ी तादाद में रूहेला लड़ाके और परिवार विस्थापित हुए थे। इनमें हफीज खां का परिवार भी एक है, जो है पीढ़ियों से भिटौरा की जंग के किस्से सुनते आए हैं। मध्यप्रदेश के रतलाम में पठानटोली इलाके में रहने वाला परिवार बरेली में पूर्वजों के शहादत स्थल पर आता है तो सबकी आंखें बरस पड़ती हैं।

हफीज खां बताते हैं कि पिता महफूजुर्रहमान खान से सुना था कि उनके पूर्वज सैद नूर खां उर्फ सद्दू खां दूसरी रुहेला जंग में शहीद हुए थे। वह खुद को सद्दू खां की सातवीं पीढ़ी बताते हैं। पीढ़ी दर पीढ़ी शहादत का किस्सा उन तक पहुंचा। पिता और घर के दूसरे बड़ों से यही सुना की बरेली में फतेहगंज पश्चिमी के पास भिटौरा एक जगह है, जहां अंग्रेजों से जंग हुई थी। ब्रिटिश सरकार ने शहीदों के परिवारों और नवाब का साथ देने वालों को जिलाबदर कर दिया था। तब यहां से होता हुआ परिवार पहले राजस्थान, फिर मध्य प्रदेश जा पहुंचा। फजील खां व उनके भाई फजलुरहमान सरकारी जॉब करते हैं। जिस इलाके में रहते हैं, उसे भी पठान टोली कहा जाता है।

बड़ी संख्या में मारे गए थे अंग्रेज अफसर और सैनिक
वरिष्ठ इतिहासकार डॉ. नवीन गुप्ता बताते हैं कि ये युद्ध 26 अक्टूबर 1794 को लड़ा गया था। 1793 में रामपुर नवाब फैज उल्ला खां की मौत के बाद उनके बेटे मोहम्मद अली खां को नवाब बनाया गया, मगर उनको हटाकर गुलाम मोहम्मद खान सत्ता पर बैठ गए, जिनको अंग्रेजों ने नवाब ही नहीं माना। सेना की कमान संभाल रहे सर रॉबर्ट एबरक्रॉम्बी ने भिटौरा पर सेना भेज दी। जंग की शुरुआत में बड़ी तादाद में अंग्रेज अफसर और सैनिक मारे गए। मगर बाद में अंग्रेजी हुकूमत ने भारी तोपों का इस्तेमाल किया। ये खबर आप क्विक समाचार में पढ़ रहे हैं। नवाब की तरफ से फौज की कयादत कर रहे नज्जू खां और बुलंद खां को भी तोप दागकर शहीद कर दिया। उनके मकबरे आज भी फतेहगंज पश्चिमी के भिटौरा में मौजूद हैं। वह बताते हैं कि इस जंग ने लगभग रूहेलों का असर इस पूरे इलाके में खत्म कर दिया।

यहां ब्रिटिश फौज का सबसे शुरुआती वॉर मैमोरियल
इस जंग में काफी तादाद में अंग्रेज अफसर मारे गए। ब्रिटिश सरकार ने इन अंग्रेज अफसरों और सैनिकों की याद में यहां एक वॉर मैमोरियल भी बनवाया। पिरामिड की शक्ल का ये वॉर मैमोरियल कई दस्तावेजों में ब्रिटिश सरकार के सबसे शुरुआती वॉर मैमोरियल्स में से एक कहा जाता है। फिलहाल ये अब एएसआई के संरक्षण में है। वहीं हफीज खां अपनी बरेली और रामपुर की यात्रा का जिक्र करते हुए बताते हैं कि जब वह भिटौरा गए तो यहां इस वॉर मैमोरियल को देकर उन्हें दुख हुआ। अंग्रेजी सैन्य अफसरों के नाम तो लिखे थे मगर जंग में शहीद हुए रूहेलों के लिए किसी ने कहीं कोई मैमोरियल बनवाने की जहमत नहीं उठाई।

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