
भारत में जब शिक्षा को केवल अक्षरज्ञान और पुस्तकालय को केवल किताबों का गोदाम समझा जाता था, तब एक व्यक्ति ने पुस्तकालय को एक जीवंत, लोकतांत्रिक और सामाजिक संस्था के रूप में परिभाषित किया। अद्भुत मेधा के धनी वह व्यक्ति थे डॉ. शियाली रामामृत रंगनाथन जिन्हें आज पूरा विश्व ‘पुस्तकालय विज्ञान के जनक’ के रूप में नमन करता है।
डॉ. रंगनाथन का जीवन इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि एक विचार कैसे पूरे राष्ट्र की ज्ञानसंस्कृति को बदल सकता है। ये खबर आप क्विक समाचार में पढ़ रहे हैं। यह संयोग ही था कि गणित के प्राध्यापक रहे रंगनाथन 1924 में मद्रास विश्वविद्यालय के प्रथम पुस्तकालयाध्यक्ष बने। यह संयोग भारत के लिए सौभाग्य बन गया। उन्होंने लंदन जाकर पुस्तकालय विज्ञान का गहन अध्ययन किया और लौटकर उसे भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप वैज्ञानिक स्वरूप प्रदान किया, जो भारत में पुस्तकालय संस्कृति के सुव्यवस्थित विकास का आधार बना।
पुस्तकालयों को विकसित करने की दिशा में रंगनाथन जी ने पांच प्रमुख सूत्र दिए, जो आज के डिजिटल युग में भी उतने ही प्रासंगिक हैं और पुस्तकालयों की आत्मा हैं यह सूत्र थे ‘पुस्तकें उपयोग के लिए हैं। प्रत्येक पाठक को उसकी पुस्तक मिले। प्रत्येक पुस्तक को उसका पाठक मिले। पाठक का समय बचाइए तथा पुस्तकालय एक वर्धनशील संस्था है।’
उनके द्वारा कहे गए ये पांच वाक्य केवल नियम नहीं, एक दर्शन हैं। पहला नियम कहता है कि पुस्तकें ताले में बंद रखने के लिए नहीं हैं। दूसरा और तीसरा नियम ज्ञान के लोकतंत्रीकरण की बात करता है जाति, धर्म और वर्ग से परे हर पाठक का अधिकार। चौथा नियम पाठक के सम्मान का नियम है और पांचवां नियम दूरदर्शिता का कि पुस्तकालय को समय के साथ बढ़ना, बदलना और तकनीक को अपनाना होगा। आज जब हम ईलाइब्रेरी, ओपन एक्सेस और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की बात करते हैं, तो ये पांचों नियम ही उसका आधार बनते हैं। डॉ. रंगनाथन केवल सिद्धांतकार नहीं थे, वे एक कर्मयोगी निर्माता थे। उन्होंने पुस्तकों के वर्गीकरण के लिए ‘द्विबिंदु वर्गीकरण पद्धति’ बनाई, जिसने पुस्तकों को खोजना अत्यंत वैज्ञानिक और सरल बना दिया। ‘क्लासिफाइड कैटलॉग कोड’ के द्वारा उन्होंने पुस्तकों की सूची बनाने की एक मानक पद्धति दी। उनके ही प्रयासों से 1948 में दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी की स्थापना हुई और ‘राष्ट्रीय पुस्तकालय नीति’ की नींव पड़ी। वे ही थे, जिन्होंने कहा था कि ‘हर गांव में पुस्तकालय होना चाहिए, ठीक वैसे ही जैसे कुआं होता है।’
आज जब हम राष्ट्रीय शिक्षा नीति2020 में पुस्तकालयों को ‘लर्निंग हब’ बनाने की बात कर रहे हैं, तो हमें समझना होगा कि रंगनाथन ने यह स्वप्न सौ वर्ष पहले ही देख लिया था। जरूरत यह है कि इस सपने को साकार करते हुए निरंतरता दी जाए।
यह तकनीकसमृद्ध समय है, पर चिंता का विषय भी है कि डिजिटल क्रांति के शोर में हमारे सार्वजनिक पुस्तकालय कहींनकहीं उपेक्षित हो रहे हैं। कई शहरों में पुस्तकालय भवन तो हैं, पर नई पुस्तकें नहीं हैं, पुस्तकालयाध्यक्ष नहीं हैं, इंटरनेट नहीं है। युवा पीढ़ी गूगल पर सर्च तो करती है, पर शोध करने, संदर्भ जांचने और गहनपठन की आदत लगभग खोती जा रही है। ऐसे समय में रंगनाथन जी को याद करना जरूरी हो जाता है। विशेषकर पठनसंस्कृति के विकास के संदर्भ में। इसके लिए हमें अपने पुस्तकालयों को निरंतर समृद्ध और जीवंत करना होगा। हर स्कूल, हर तहसील और हर ग्राम पंचायत का पुस्तकालय वाईफाई, अच्छी पुस्तकों, प्रशिक्षित पुस्तकालयाध्यक्ष और बुजुर्गोंबच्चों के लिए सुरक्षित और समृद्ध पठनस्थल से युक्त हो, यह हम सबकी प्राथमिकताओं में होना चाहिए।
डॉ. रंगनाथन कहते थे “पुस्तकालय केवल कमरा भर नहीं, वह समाज का हृदय है। जिस समाज के पुस्तकालय जीवित हैं, उस समाज का भविष्य भी जीवित है।” एस. आर. रंगनाथन जी का जन्मदिन 12 अगस्त को भारत में ‘राष्ट्रीय पुस्तकालयाध्यक्ष दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि केवल इमारतें बनाने से देश नहीं बनता, बल्कि सक्रिय पाठक बनाने तथा पठनसंस्कृति के विकास से देश बनता है। पुस्तकालय क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए रंगनाथन जी को वर्ष 1957 में ‘पद्मश्री’ से सम्मानित किया गया। पुस्तकालय विज्ञान को एक आधुनिक एवं गतिशील विषय के रूप में परिवर्तित करने के कारण भारत ही नहीं, पूरे विश्व में उन्हें सदैव याद किया जाता रहेगा।
डॉ. अवनीश यादव, प्रान्तीय शिक्षा सेवा संवर्ग, उ०प्र०