यह अद्भुत था, अविस्मरणीय और अतुलनीय भी. जन आस्था के ज्वार जैसी इस कांवड़ यात्रा में यदि शिवभक्त योगी सरकार के सेवाभाव से संतृप्त दिखाई दिए तो निश्चित रूप से इसका श्रेय श्रद्दा को सम्मान के भाव से रचीबसी नीति और अकल्पनीय महाप्रबंधन को जाएगा. यह एक महायज्ञ की पूर्णाहुति जैसा था, इसलिए कि इस बार कांवड़ यात्रा में 4.5 करोड़ से अधिक श्रद्धालु अपने आराध्य का जलाभिषेक करने सड़कों पर उतरे.

कांवड़ मार्गों पर बढ़ते प्रभु के दीवाने इस बात के प्रतीक थे कि भक्ति जब संगठित संकल्प के साथ मिलती है, तो धरती पर साक्षात कैलाश परिक्रमा की अनुभूति होने लगती है. इस भाव को शब्दों में बांधना मुश्किल है, लेकिन शब्दों में वह यथार्थ जरूर रखा जा सकता है जो योगी सरकार ने इस यात्रा को सुगम, सुचारु और सुरक्षित बनाने के लिए किया.
सिर्फ संहार के देवता नहीं. वह करुणा और वात्सल्य के भी अधिष्ठाता हैं. वे भोलेनाथ हैं, आशुतोष हैं, जो भक्त की सच्ची पुकार पर तत्काल प्रसन्न हो जाते हैं. हलाहल विष को अपने कंठ में धारण करते हैं ताकि सृष्टि का कल्याण हो सके. कांवड़ यात्रा की परंपरा उन्हीं नीलकंठ के प्रति कृतज्ञता प्रकट करती है.
सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा
इसी भाव में लाखों कांवड़िए नंगे पांव, कंधों पर कांवड़ लेकर सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा करते हैं. न धूप की परवाह, न वर्षा की चिंता, बस एक ही लक्ष्य, अपने आराध्य के चरणों में पवित्र जल अर्पित करना. उनकी सेवा भी पुण्य का माध्यम है और यह पुण्य कई स्तरों पर अर्जित होता है.
सेवा शिविरों में पूरी तन्मयता से कांवड़ियों की सेवा करते लोग यह पुण्य लाभ हासिल करते हैं तो राज्य की मशीनरी किसी भी भक्त को कोई कष्ट न हो, यह सुनिश्चित करके पुण्य की भागीदार बनती है. पुष्प वर्षा के बीच जब कांवड़ियों का स्वागत होता है, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो भगवान शिव के गण स्वयं धरती पर उतर आए हों.
श्रीधरानंद ब्रह्मचारी
किसी यात्रा में यदि 4.5 करोड़ से अधिक लोग शामिल हों तो उनके लिए सुरक्षित, सुव्यवस्थित और गरिमामय ढंग से सम्पन्न कराना कोई सरल कार्य नहीं है. सैकड़ों किलोमीटर लंबा मार्ग, अलगअलग जिलों और क्षेत्रों का समन्वय, यातायात प्रबंधन, स्वास्थ्य सेवाएं, पेयजल और स्वच्छता की व्यवस्था. इस चुनौती को प्रदेश सरकार ने जिस सहजता से निभाया और जिस तरह के प्रबंध किए, उसकी प्रशंसा की जानी चाहिए.
जगहजगह दिखे चिकित्सा शिविर
मार्गों की समुचित बैरिकेडिंग, ड्रोन के माध्यम से निगरानी, जगहजगह चिकित्सा शिविर, महिला कांवड़ियों के लिए पृथक विश्राम स्थल, स्वच्छ पेयजल की उपलब्धता और सुरक्षा बलों की सजग तैनाती. योगी सरकार की ओर से यह भक्ति का सम्मान था. जब आस्था को सुरक्षा का संबल मिलता है, तो भक्ति और अधिक निर्भीक होकर प्रवाहित होती है.
कांवड़ यात्रा पहले भी होती रही है लेकिन पूर्व की सरकारों के लिए यह महत्व का विषय नहीं था. 2017 में मुख्यमंत्री का पद संभालने के बाद योगी आदित्यनाथ ने इसे अपनी प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल किया तो नौ वर्षों में इसका स्वरूप पूरी तरह निखरकर और सजीव हो उठा है और आने वाली कांवड़ यात्राओं में व्यवस्था को लेकर और भी संभावनाओं की उम्मीद जगा दी है.
जाति, वर्ग या समाज का भेद नहीं
कांवड़ यात्रा में जाति, वर्ग या सामाजिक स्थिति का कोई भेद नहीं दिखता. एक मजदूर, एक व्यापारी, एक विद्यार्थी, एक अधिकारी….बम भोले के जयकारों में सबकी आवाज़ एक हो जाती है. यह दृश्य भारत की उस सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है, जहां आस्था सारे भेदों को मिटाकर सबको एक सूत्र में पिरो देती है. जब कांवड़िए अपने गंतव्य पर पहुँचकर शिवलिंग पर जल अर्पित करते हैं, तो उनके चेहरे पर जो संतोष और आनंद की आभा होती है, वह अवर्णनीय है. महीनों की प्रतीक्षा, दिनों की कठिन यात्रा, शारीरिक कष्ट, सब कुछ उस एक क्षण में सार्थक हो जाता है.
प्रयागराज से जल लेकर काशी विश्वनाथ या अन्य शिवधामों को जाने वाले कांवड़िए अब भी दिख रहे हैं. ये खबर आप क्विक समाचार में पढ़ रहे हैं। इसके साथ ही राज्य के शिवालयों में भी श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ रही है. यह सब उत्तर प्रदेश की धार्मिक अस्मिता के पुनरोत्थान की प्रतीक बन चुके हैं जहां आस्था का संयम और समर्पण से संगम है. शिव तप और संयम के प्रतीक हैं और कांवड़िए उन्ही की एक झलक हैं.
योगी सरकार कांवड़ियों में मनुष्यत्व नहीं, शिवत्व भाव देखती है और इसीलिए उनके उत्सव में सहबागी बनकर गौरव की अनुभूति करती है. जब प्रशासन से लेकर आम नागरिक तक इस यात्रा को सफल बनाने में अपना योगदान देता है, तो भारत की सांस्कृतिक जड़ें और भी मजबूती पाती हैं. आने वाले वर्षों में प्रशासन, समाज और स्वयंसेवी संगठन मिलकर इसे और बेहतर बनाएंगे और इसमें कोई संशय नहीं कि यह यात्रा भारत की सांस्कृतिक पहचान का एक गौरवशाली अध्याय लिखेगी.