क्या मां दुर्गा की प्रतिमा बनाने में वेश्यालय की मिट्टी का उपयोग होता है? जानिए इस अनोखी परंपरा का इतिहास..

क्या मां दुर्गा की प्रतिमा बनाने में वेश्यालय की मिट्टी का उपयोग होता है? जानिए इस अनोखी परंपरा का इतिहास..
क्या मां दुर्गा की प्रतिमा बनाने में वेश्यालय की मिट्टी का उपयोग होता है? जानिए इस अनोखी परंपरा का इतिहास..

भारत में दुर्गा पूजा से जुड़ी कई प्राचीन परंपराएं हैं। इनमें से एक प्रसिद्ध मान्यता यह है कि कुछ क्षेत्रों, विशेषकर पश्चिम बंगाल की पारंपरिक दुर्गा प्रतिमा निर्माण कला में, प्रतिमा बनाने के लिए थोड़ी मात्रा में वेश्यालय (जिसे ‘निषिद्ध पल्ली’ भी कहा जाता है) के द्वार की मिट्टी मिलाई जाती है। इसे बंगाली परंपरा में “निषिद्धो पल्लीर माटी” कहा जाता है।

हालांकि, यह परंपरा पूरे भारत में नहीं अपनाई जाती और सभी मूर्तिकार या पूजा समितियां इसका पालन भी नहीं करतीं।

क्या वेश्याओं के पैसों से मूर्ति बनाई जाती है?

सोशल मीडिया पर अक्सर यह दावा किया जाता है कि “मां दुर्गा की मूर्ति वेश्याओं के पैसों से बनाई जाती है।”

यह दावा सही नहीं है। पारंपरिक मान्यता मिट्टी से जुड़ी है, पैसों से नहीं। कुछ स्थानों पर केवल प्रतीकात्मक रूप से वेश्यालय के प्रवेश द्वार की थोड़ी-सी मिट्टी प्रतिमा निर्माण में मिलाई जाती है।

इस परंपरा के पीछे क्या मान्यता है?

लोक मान्यताओं के अनुसार, जब कोई व्यक्ति वेश्यालय के द्वार पर प्रवेश करता है, तो वह अपने सामाजिक अहंकार और बाहरी पहचान को वहीं छोड़ देता है। इसी कारण उस स्थान की मिट्टी को प्रतीकात्मक रूप से पवित्र माना गया और उसे देवी की प्रतिमा में शामिल करने की परंपरा विकसित हुई।

कुछ विद्वान इसे समाज के हाशिए पर रहने वाले लोगों को भी देवी की कृपा और सम्मान के दायरे में शामिल करने का प्रतीक मानते हैं।

क्या यह धार्मिक नियम है?

नहीं। इस परंपरा का उल्लेख सभी धार्मिक ग्रंथों में अनिवार्य नियम के रूप में नहीं मिलता। यह मुख्य रूप से कुछ क्षेत्रों की सांस्कृतिक और लोक परंपरा है, जिसे सभी स्थानों पर नहीं अपनाया जाता।

निष्कर्ष

मां दुर्गा की प्रतिमा में कुछ क्षेत्रों में वेश्यालय के द्वार की मिट्टी मिलाने की परंपरा जरूर प्रचलित रही है, लेकिन यह कहना कि मूर्ति “वेश्याओं के पैसों से बनाई जाती है”, तथ्यात्मक रूप से सही नहीं है। यह परंपरा सामाजिक समावेश, करुणा और देवी की दृष्टि में सभी मनुष्यों की समानता का प्रतीक मानी जाती है, न कि किसी आर्थिक योगदान का।

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