
बरेली, अमृत विचार। दो साल पहले जब ताइवान की रहने वाली चियाली चेन भारत आने की तैयारी कर रही थीं, तब उनके मन में भारतीय संस्कृति, लोगों और यहां की जीवनशैली को लेकर कई सवाल थे। लेकिन महात्मा ज्योतिबा फुले रूहेलखंड विश्वविद्यालय में मंदारिन भाषा पढ़ाने का मौका मिला तो उन्होंने बिना देर किए इसे स्वीकार कर लिया। आज हालात ऐसे हैं कि भारतीय संस्कृति से उनका लगाव इतना बढ़ गया है कि वह अपना वीजा एक साल के लिए बढ़ाने की तैयारी कर रही हैं।
महात्मा ज्योतिबा फुले रूहेलखंड विश्वविद्यालय के मानविकी विभाग में संचालित मंदारिन भाषा के डिप्लोमा कोर्स में पढ़ाने वाली चियाली चेन ने अमृत विचार से बातचीत में भारत के अपने दो साल के अनुभव साझा किए। उन्होंने कहा कि भारतीयों की सबसे बड़ी खासियत उनकी मेहमाननवाजी है। यहां लोग बिना किसी जानपहचान के भी अपने घर आने का निमंत्रण दे देते हैं और सामने वाले को समझने की कोशिश करते हैं।
चियाली बताती हैं कि ताइवान में ऐसा बहुत कम देखने को मिलता है। वहां लोग केवल बेहद करीबी लोगों को ही अपने घर बुलाते हैं, जबकि भारत की मिलनसार संस्कृति उन्हें दुनिया के बाकी देशों से अलग बनाती है। यही अपनापन उन्हें भारत से जोड़ चुका है।
भारतीय खानपान को लेकर भी उनका अनुभव दिलचस्प रहा। शुरुआती एक साल तक उन्होंने चपाती, नान और दाल का खूब स्वाद लिया, लेकिन अब वह घर पर अपनी पारंपरिक ताइवानी डिशेज़ बनाना पसंद करती हैं। हालांकि भारतीय खाने का स्वाद उन्हें आज भी पसंद है।
भारतीय संस्कृति का असर उनके पहनावे में भी साफ दिखाई देता है। चियाली अब अक्सर विश्वविद्यालय में साड़ी या सलवारसूट पहनकर पढ़ाने जाती हैं। इतना ही नहीं, अगर किसी शादी या पारिवारिक समारोह में शामिल होना हो तो उनकी पहली पसंद साड़ी ही होती है।
ताइवान से आईं चियाली चेन की यह कहानी सिर्फ एक विदेशी शिक्षिका की नहीं, बल्कि भारत की संस्कृति, अपनापन और मेहमाननवाजी से जुड़ते एक खूबसूरत रिश्ते की मिसाल बन गई है।
शुरुआत में ट्रैफिक ने किया परेशान
चियाली बताती हैं कि दो साल पहले भारत आने से पहले उन्होंने कई ऐसे वीडियोज देखे जिसकी वजह से यहां के बारे में उनकी सोच नकारात्मक बनी। मगर जो वीडियो में देखा, यहां तो उससे बिल्कुल अलग दुनिया है। लोग आपकी मदद के लिए तुरंत आगे आते हैं। हालांकि शुरुआत में उन्हें ट्रैफिक ने सबसे ज्यादा परेशान किया। खास तौर से बरेली में जब वह सड़कों पर निकलती हैं तब उन्हें ट्रैफिक में फंसना बहुत बुरा लगता है।
मंदारिन सीखकर खुलेंगे करियर के रास्ते
चियाली चेन बताती हैं कि वह रुहेलखंड विश्वविद्यालय में मंदारिन भाषा पढ़ा रही हैं। इसे पूरा करने के बाद छात्रछात्राओं को ताइवान सरकार की तरफ से स्कॉलरशिप मुहैया कराई जाती है। मंदारिन भाषा पर पकड़ बनाने के लिए वह इसको सुनने, पढ़ने और लिखने की ज्यादा से ज्यादा प्रैक्टिस करने की सलाह देती हैं।