Explained: महंगाई ने फिर टेंशन बढ़ाई! क्या लोन EMI पर बड़ा फैसला ले सकती है RBI?

Explained: महंगाई ने फिर टेंशन बढ़ाई! क्या लोन EMI पर बड़ा फैसला ले सकती है RBI?

इंडियन इकोनॉमी के मोर्चे पर एक बार फिर चिंता की लकीरें खिंच गई हैं. रिटेल महंगाई ?ने एक बार फिर वापसी की है और इसके आंकड़े 4 फीसदी के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार कर गए हैं.महंगाई के इस यूटर्न ने भारतीय रिजर्व बैंक के सामने एक नई धर्मसंकट की स्थिति पैदा कर दी है. बाजार में अब सबसे बड़ा सवाल यह तैर रहा है कि क्या रिजर्व बैंक आगामी मॉनेटरी पॉलिसी की बैठक में ब्याज दरों में बढ़ोतरी करेगा, या फिर आर्थिक रफ्तार को बनाए रखने के लिए दरों को जस का तस छोड़ देगा. आइए समझते हैं इस पूरी इकॉनमी का गणित.

Explained: महंगाई ने फिर टेंशन बढ़ाई! क्या लोन EMI पर बड़ा फैसला ले सकती है RBI?

कितना रहा रिटेल इंफ्लेशन?

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, जून में खानेपीने की चीज़ें महंगी होने की वजह से खुदरा महंगाई दर बढ़कर 4.38 प्रतिशत हो गई. इससे महंगाई दर रिज़र्व बैंक के 4 प्रतिशत के मीडियन टारगेट से ऊपर चली गई. यह पहली बार है जब नई सीरीज़ के तहत खुदरा महंगाई दर 4 प्रतिशत के स्तर से ऊपर गई है. यह नई सीरीज इस साल जनवरी से लागू हुई थी. नई सीरीज़ का बेस ईयर 2024 है. जून में, कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स पर आधारित महंगाई दर मई के 3.93 प्रतिशत से बढ़कर 4.38 प्रतिशत हो गई. नेशनल स्टैटिस्टिक्स ऑफिस द्वारा जारी CPI आंकड़ों के अनुसार, जून में खानेपीने की चीज़ों की महंगाई दर पिछले महीने के 4.78 प्रतिशत से बढ़कर 5.32 प्रतिशत हो गई. NSO के आंकड़ों के अनुसार, जून में सबसे ज़्यादा महंगाई वाली टॉप पांच चीजों चांदी, सोना, हीरा और प्लेटिनम की ज्वेलरी, अदरक, टमाटर, और किशमिश व मुनक्का आदि शामिल रही.

4% की ‘लक्ष्मण रेखा’ पार होने का क्या है मतलब?

RBI को सरकार की तरफ से महंगाई दर को 4 फीसदी पर बनाए रखने का लक्ष्य मिला हुआ है.

टारगेट मिडपॉइंट: 4 फीसदी को महंगाई की आदर्श स्थिति माना जाता है. इससे ऊपर जाना इस बात का संकेत है कि बाजार में खाद्य पदार्थों, ईंधन या अन्य जरूरी सामानों की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं.

ब्याज दरों में कटौती की उम्मीदों को झटका: बाजार में लंबे समय से यह उम्मीद जताई जा रही थी कि अगर महंगाई काबू में रही, तो RBI रेपो रेट में कटौती करके आम जनता को लोन और EMI पर राहत देगा. लेकिन आंकड़ों के 4 फीसदी के पार जाते ही इस उम्मीद पर फिलहाल पानी फिरता नजर आ रहा है.

RBI के सामने क्या है बड़ा धर्मसंकट?

महंगाई पर लगाम: अगर केंद्रीय बैंक महंगाई को काबू में करने को प्राथमिकता देता है, तो उसे बाजार में लिक्विडिटी को कम करने के लिए ब्याज दरों में बढ़ोतरी करनी पड़ सकती है.

आर्थिक विकास की रफ्तार: दूसरी तरफ, अगर ब्याज दरें बढ़ाई जाती हैं, तो पर्सनल लोन और होम लोन महंगे हो जाएंगे. इससे आम कंज्यूमर्स की खर्च करने की क्षमता पर असर पड़ सकता है, जिससे आर्थिक विकास की रफ्तार धीमी होने का जोखिम रहता है.

आम जनता और आपकी जेब पर क्या होगा असर?

अगर रिजर्व बैंक महंगाई के दबाव में आकर सख्त कदम उठाता है, तो आम उपभोक्ताओं पर इसका सीधा असर पड़ेगा:

लोन और EMI में राहत नहीं: मौजूदा स्थिति को देखते हुए यह साफ है कि आने वाले कुछ महीनों तक होम लोन, कार लोन या पर्सनल लोन की EMI कम होने के आसार नहीं हैं.

दरें बढ़ने का खतरा: यदि अगली तिमाही में भी महंगाई इसी तरह बढ़ती रही, तो बैंक कर्ज पर ब्याज दरें बढ़ा भी सकते हैं, जिससे आपकी जेब पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा.

फिक्स्ड डिपॉजिट पर फायदा: कर्जदारों के लिए भले ही यह बुरी खबर हो, लेकिन सीनियर सिटीजंस और FD में निवेश करने वालों के लिए यह राहत की बात हो सकती है, क्योंकि ब्याज दरें ऊंची बनी रहने से FD पर रिटर्न अच्छा मिलता रहेगा.

दो अनिश्चितताओं पर खास ध्यान देने की जरूरत

कच्चा तेल: पश्चिम एशिया में भूराजनीतिक घटनाक्रम अनिश्चित बने हुए हैं, और कच्चे तेल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी का असर अंतत ट्रांसपोर्टेशन कॉस्ट, उत्पादन खर्च और महंगाई की उम्मीदों पर पड़ेगा. मौजूदा बेस इफेक्ट के विपरीत, तेल की कीमतों में लंबे समय तक बढ़ोतरी महंगाई की एक ज़्यादा स्थायी चुनौती बन सकती है.

मानसून: कई इलाकों में बारिश असमान रही है, जिससे खरीफ की बुआई और साल के आखिर में खाद्य पदार्थों की कीमतों को लेकर सवाल उठ रहे हैं. हालांकि बेहतर बफर स्टॉक, बेहतर सिंचाई और ज्यादा कुशल सप्लाईचेन मैनेजमेंट की वजह से भारत की खाद्य महंगाई अब एक दशक पहले की तुलना में मानसून के उतारचढ़ाव के प्रति कम संवेदनशील हो गई है, फिर भी कृषि एक महत्वपूर्ण फैक्टर बनी हुई है. उम्मीद से कम फसल होने पर खाद्य महंगाई लंबे समय तक ऊंची बनी रह सकती है.

एक्सपर्ट्स का क्या है मानना?

अधिकांश आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि RBI तुरंत ब्याज दरों में बढ़ोतरी का फैसला नहीं लेगा. केंद्रीय बैंक अभी ‘वेट एंड वॉच’ की नीति अपना सकता है. हालांकि, दरों में कटौती की संभावना अब पूरी तरह से खत्म हो चुकी है और सख्त मौद्रिक रुख आगे भी जारी रहने की उम्मीद है. महंगाई का 4% के पार जाना यह साफ संकेत देता है कि वैश्विक अनिश्चितताओं और घरेलू बाजार में आपूर्ति की दिक्कतों का असर इकॉनमी पर दिख रहा है. अब सबकी नजरें रिजर्व बैंक की अगली पॉलिसी मीटिंग पर टिकी हैं, जो यह तय करेगी कि आपकी जेब से निकलने वाली EMI का ऊँट किस करवट बैठेगा.

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