प्रधानमंत्री मोदी आज 76 साल के हो गए. उनकी फिटनेस, चेहरे की ताजगी वाकई देखने लायक है. वह आज भी करोड़ों की प्रेरणा के स्रोत हैं. नरेंद्र दामोदर दास मोदी का जन्म 17 सितंबर 1950 को गुजरात के मेहसाणा जिले के वडनगर में हुआ था. उनका परिवार साधारण आर्थिक पृष्ठभूमि से जुड़ा था. बचपन में उन्होंने परिवार के काम में हाथ बंटाया. कालांतर में रेलवे स्टेशन के पास चाय बेचने की कहानी उनके सार्वजनिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई. उनका बचपन सुविधाओं से भरा नहीं था. सीमित संसाधनों के बीच उन्होंने पढ़ाई की. इसी दौर में उनके भीतर आत्मनिर्भरता और मेहनत की भावना मजबूत हुई. छोटे शहर का यह अनुभव आगे चलकर उनकी राजनीतिक शैली में भी दिखाई दिया.

वो पिछले 25 सालों से सत्ता में बने हुए हैं. पहले गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में फिर देश के प्रधानमंत्री के तौर पर. आइए, पीएम मोदी के जन्मदिन के बहाने जानते हैं उनके बचपन, RSS प्रचारक, गुजरात के सीएम और देश के तीसरी बार पीएम के रूप में, कैसे उनके जीवन का हर मोड़ टर्निंग पॉइंट बनता गया?
वडनगर से मिली शुरुआती सीख
वडनगर गुजरात का एक छोटा शहर है. यहां का सामाजिक जीवन सामुदायिक रिश्तों पर आधारित था. नरेंद्र मोदी ने कम उम्र में ही लोगों से संवाद करना सीखा. अलगअलग वर्गों के लोगों से मिलना उनके रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा था. बचपन में ही उनमें देश और समाज को लेकर रुचि पैदा हुई. वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संपर्क में आए. संघ की शाखाओं ने उनके जीवन की दिशा बदलने में बड़ी भूमिका निभाई. यहीं से उनके जीवन में अनुशासन, संगठन और राष्ट्र सेवा जैसे विचार मजबूत हुए. वह नियमित रूप से शाखा में जाने लगे. धीरेधीरे उन्होंने संगठन के काम को गंभीरता से अपनाया.
पीएम मोदी के बचपन की तस्वीर.
RSS से जुड़ाव बना पहला बड़ा मोड़
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ना नरेंद्र मोदी के जीवन का पहला बड़ा राजनीतिक और वैचारिक टर्निंग पॉइंट माना जाता है. संघ में काम करते हुए उन्होंने संगठन चलाने की बारीकियां सीखीं. शाखा में केवल भाषण देना ही काम नहीं था. कार्यकर्ताओं से मिलना, कार्यक्रम आयोजित करना और लोगों को जोड़ना भी जरूरी था. इन गतिविधियों ने मोदी के व्यक्तित्व को आकार दिया. संघ के प्रचारक के रूप में उन्होंने देश के अलगअलग हिस्सों में काम किया. प्रचारक का जीवन निजी सुविधा से अधिक संगठन और सेवा पर केंद्रित होता है.
इस भूमिका ने उन्हें लगातार यात्रा करने, नए लोगों से मिलने और कठिन परिस्थितियों में काम करने का अनुभव दिया. यही अनुभव आगे चलकर उनकी राजनीतिक ताकत बना. वह कार्यकर्ताओं के साथ लंबे समय तक काम करने वाले नेता के रूप में पहचाने जाने लगे.
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ना पीएम नरेंद्र मोदी के जीवन का टर्निंग पॉइंट रहा.
आपातकाल ने राजनीतिक सोच को धार दी
1975 में देश में आपातकाल लगाया गया. इस दौरान नागरिक अधिकारों पर कई तरह की पाबंदियां लगीं. विपक्षी दलों और सरकार विरोधी संगठनों के नेताओं और कार्यकर्ताओं पर कार्रवाई हुई. नरेंद्र मोदी ने भी उस समय संगठनात्मक गतिविधियों में हिस्सा लिया. आपातकाल का दौर उनके लिए राजनीतिक संघर्ष का महत्वपूर्ण अनुभव था. इस समय उन्होंने भूमिगत रहकर काम करने और संदेश पहुंचाने की रणनीतियां सीखीं. आपातकाल के बाद देश की राजनीति में बड़ा बदलाव आया. जनता पार्टी का प्रयोग हुआ. विपक्षी ताकतें एक साथ आईं. ये खबर आप क्विक समाचार में पढ़ रहे हैं। इस पूरे दौर ने मोदी को यह समझने का अवसर दिया कि संगठन और राजनीतिक परिस्थितियां किस तरह एकदूसरे को प्रभावित करती हैं.
फिर मिली भाजपा संगठन की जिम्मेदारियां
साल 1980 में भारतीय जनता पार्टी का गठन हुआ. नरेंद्र मोदी को धीरेधीरे पार्टी के संगठनात्मक काम में जिम्मेदारियां मिलने लगीं. उन्होंने गुजरात में पार्टी को मजबूत करने के लिए काम किया. उनकी भूमिका पर्दे के पीछे रहने वाली थी. वह चुनाव प्रबंधन, कार्यकर्ता संपर्क और संगठन विस्तार पर ध्यान देते थे. उस समय वह बड़े जननेता नहीं थे. लेकिन संगठन के भीतर उनकी उपयोगिता लगातार बढ़ती गई. उन्होंने पार्टी के लिए यात्राओं और अभियानों की योजना बनाने में भूमिका निभाई. कार्यकर्ताओं की क्षमता को पहचानना और उन्हें जिम्मेदारी देना उनकी कार्यशैली का हिस्सा बना.
1980 और 1990 के दशक में भारतीय राजनीति तेजी से बदल रही थी. राम जन्मभूमि आंदोलन और राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के विस्तार ने पार्टी को नई ताकत दी. इसी समय नरेंद्र मोदी का संगठनात्मक प्रभाव भी बढ़ा.
साल 2002 के गुजरात दंगों ने नरेंद्र मोदी के राजनीतिक जीवन पर गहरा असर डाला.
गुजरात की राजनीति में बढ़ता प्रभाव
गुजरात में पार्टी के संगठन को मजबूत करने के बाद नरेंद्र मोदी राष्ट्रीय स्तर पर भी पहचाने जाने लगे. वह चुनावी रणनीति और संगठन प्रबंधन के लिए जाने जाने लगे. 1995 में गुजरात में भाजपा की सरकार बनी. इसके बाद पार्टी के भीतर कई तरह के बदलाव हुए. नरेंद्र मोदी का संगठन में महत्व लगातार बढ़ता रहा. उन्होंने अलगअलग राज्यों में पार्टी के विस्तार के लिए काम किया.
उत्तर भारत और पश्चिम भारत के कई हिस्सों में संगठन खड़ा करने में उनकी भूमिका रही. इस दौरान उन्होंने चुनावी समीकरणों को समझा. यह चरण उनके लिए महत्वपूर्ण था. उन्होंने सीखा कि केवल विचारधारा से चुनाव नहीं जीते जाते. स्थानीय मुद्दे, उम्मीदवार, बूथ स्तर का संगठन और मतदाताओं से सीधा संपर्क भी जरूरी होता है.
साल 2013 में नरेंद्र मोदी को भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद का प्रमुख चेहरा बनाया गया.
साल 2001 में गुजरात के मुख्यमंत्री बने
अक्टूबर 2001 में नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री बने. यह उनके जीवन का सबसे बड़ा राजनीतिक मोड़ था. इससे पहले वह मुख्य रूप से संगठन के नेता थे. अब उन्हें सीधे सरकार चलाने की जिम्मेदारी मिली. गुजरात उस समय कई चुनौतियों से गुजर रहा था. भूकंप के बाद पुनर्निर्माण का काम बड़ा मुद्दा था. प्रशासन को तेज करने और विकास योजनाओं को लागू करने की जरूरत थी.
मुख्यमंत्री के रूप में मोदी ने प्रशासनिक कामकाज पर जोर दिया. सड़क, बिजली, पानी और निवेश जैसे मुद्दे उनकी सरकार के प्रमुख विषय बने. उन्होंने गुजरात को औद्योगिक और कारोबारी राज्य के रूप में प्रस्तुत किया. उनके समर्थकों ने इस दौर को गुजरात के विकास मॉडल से जोड़ा. आलोचकों ने इस मॉडल के लाभों और सामाजिक प्रभावों पर सवाल भी उठाए. फिर भी यह स्पष्ट है कि मुख्यमंत्री के रूप में उनकी पहचान राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत हुई.
साल 2002 के बाद वे देशदुनिया की नजर में आए
साल 2002 के गुजरात दंगों ने नरेंद्र मोदी के राजनीतिक जीवन पर गहरा असर डाला. इस घटना को लेकर उनकी सरकार की भूमिका पर देश और विदेश में बहस हुई. नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार को राजनीतिक और कानूनी जांच का सामना करना पड़ा. इस दौर में मोदी के समर्थकों और आलोचकों के बीच मतभेद और गहरे हुए. समर्थकों ने उन्हें मजबूत प्रशासक बताया. आलोचकों ने सरकार की जवाबदेही पर सवाल उठाए. बाद के वर्षों में नरेंद्र मोदी ने विकास और सुशासन को अपनी राजनीति का मुख्य आधार बनाया. उन्होंने निवेश सम्मेलन आयोजित किए. गुजरात की औद्योगिक छवि को मजबूत किया. इससे उन्हें देश के कारोबारी वर्ग और मध्यम वर्ग के एक हिस्से का समर्थन मिला.
साल 2014 में प्रधानमंत्री बनने तक का सफर
साल 2013 में नरेंद्र मोदी को भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद का प्रमुख चेहरा बनाया गया. यह पार्टी की राष्ट्रीय राजनीति में बड़ा बदलाव था. 2014 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने विकास, रोजगार, महंगाई और मजबूत नेतृत्व को प्रमुख मुद्दा बनाया. उनका चुनाव अभियान आधुनिक तकनीक, सोशल मीडिया और बड़े जनसंपर्क कार्यक्रमों पर आधारित था. उन्होंने देश के कई हिस्सों में रैलियां कीं. उनका संदेश था कि केंद्र में निर्णायक और मजबूत सरकार की जरूरत है. 2014 के चुनाव में भाजपा को लोकसभा में स्पष्ट बहुमत मिला. नरेंद्र मोदी ने मई 2014 में प्रधानमंत्री पद की शपथ ली. यह उनके जीवन का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट था. इस तरह एक छोटे शहर से निकला व्यक्ति देश की सर्वोच्च निर्वाचित राजनीतिक भूमिका तक पहुंचा.
देश हो विदेश, पीएम मोदी के समर्थकों की संख्या बढ़ी है.
प्रधानमंत्री के रूप में लिए कई महत्वपूर्ण फैसले
प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी की सरकार ने कई बड़े फैसले लिए. जनधन योजना, स्वच्छ भारत अभियान, उज्ज्वला योजना और डिजिटल सेवाओं के विस्तार पर जोर दिया गया. 2016 में नोटबंदी का फैसला हुआ. सरकार ने इसे काले धन और नकली मुद्रा के खिलाफ कदम बताया. इस फैसले के आर्थिक प्रभावों पर व्यापक चर्चा हुई. साल 2017 में वस्तु एवं सेवा कर लागू किया गया. इसका उद्देश्य देश में अलगअलग अप्रत्यक्ष करों को एक व्यवस्था में लाना था. इसके बाद कारोबार और कर प्रणाली में कई बदलाव हुए.
साल 2019 में भाजपा को फिर बड़ी जीत मिली. नरेंद्र मोदी दूसरी बार प्रधानमंत्री बने. इसी वर्ष जम्मूकश्मीर से जुड़े संवैधानिक प्रावधानों में बदलाव किया गया. अयोध्या मामले पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद राम मंदिर निर्माण का मार्ग भी साफ हुआ.
PM नरेंद्र मोदी
साल 2024 लोकसभा चुनाव के बाद हालात में हुए बदलाव
2024 के लोकसभा चुनाव के बाद नरेंद्र मोदी ने तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली. हालांकि इस बार सरकार को सहयोगी दलों के समर्थन की जरूरत पड़ी. भाजपा को पूर्ण बहुमत नहीं मिला. यह उनके राजनीतिक सफर का एक नया चरण था. तीसरे कार्यकाल में विकास, बुनियादी ढांचे, तकनीक, रक्षा और वैश्विक कूटनीति पर जोर दिया जा रहा है. भारत की अंतरराष्ट्रीय भूमिका को मजबूत करना भी उनकी राजनीति का प्रमुख हिस्सा है. अभी भी वे देश के पीएम के रूप में मजबूती से काम कर रहे हैं.
इस तरह कहा जा सकता है कि नरेंद्र मोदी के जीवन में कई टर्निंग पॉइंट हैं. उनके समर्थक उन्हें मेहनत, संगठन और निर्णायक नेतृत्व का उदाहरण मानते हैं. आलोचक उनकी नीतियों और फैसलों पर सवाल उठाते हैं. दोनों नजरियों के बीच एक बात स्पष्ट है. नरेंद्र मोदी ने भारतीय राजनीति की शैली, भाषा और चुनावी रणनीति पर गहरा प्रभाव डाला है. उनका जन्मदिन इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह एक ऐसे राजनीतिक सफर को याद करने का अवसर देता है, जिसने छोटे शहर की सीमाओं से निकलकर राष्ट्रीय राजनीति का केंद्र बन गया.