दो इंजीनियरों की हत्या, 35 से ज्यादा केस… जिस गैंगस्टर के नाम से कांपता था बिहार, कोर्टरूम के अंदर कैसे खत्म हुई उसकी कहानी?​​

दो इंजीनियरों की हत्या, 35 से ज्यादा केस… जिस गैंगस्टर के नाम से कांपता था बिहार, कोर्टरूम के अंदर कैसे खत्म हुई उसकी कहानी?​​
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Gangster Santosh Jha Murder: बिहार के अपराध जगत में कुछ नाम ऐसे रहे, जिनकी चर्चा सिर्फ पुलिस रिकॉर्ड तक सीमित नहीं रही, बल्कि पूरे इलाके में खौफ की वजह बन गई. संतोष झा भी ऐसा ही नाम है. एक समय नक्सली संगठन से जुड़ा यह शख्स बाद में अपना गैंग खड़ा कर बैठा. लेवी और रंगदारी उसका हथियार बनी और देखते ही देखते उत्तर बिहार के कई जिलों में उसका नेटवर्क फैल गया. लेकिन जिस शख्स के इर्द-गिर्द कभी दर्जनों हथियारबंद गुर्गे रहते थे, उसकी कहानी की अंत बेहद चौंकाने वाला हुआ. आज से 8 साल पहले यानी साल 2018 में सीतामढ़ी कोर्ट परिसर में संतोष झा को गोलियों से छलनी कर उसकी हत्या कर दी. ऐसे में हर किसी के मन में यह सवाल जरूर उठ रहे होंगे कि, जिसपर दो इंजीनियरों की हत्या समेत 35 से ज्यादा केस दर्ज हैं. उसका अंत कोर्टरूम के अंदर किसने किया और क्यों?

पहले नक्सली संगठन से जुड़ा, फिर खुद बना गैंग का मुखिया

शिवहर के दोस्तियां गांव में सामान्य परिवार में जन्मे संतोष झा की जिंदगी की शुरुआत अपराध से नहीं हुई थी. 12 वीं के बाद उसने हरियाणा की एक फैक्ट्री में काम किया और फिर गांव लौटकर खेती करने लगा. इसी दौरान करीब दो दशक पहले वह नक्सली संगठन के संपर्क में आया. नकस्ली संगठन के लिए जुर्माना वसूलने का काम करते-करते उसने अपराध की दुनिया को करीब से समझा. ये खबर आप क्विक समाचार में पढ़ रहे हैं। बाद में उसने संगठन से अलग होकर अपना गिरोह खड़ा कर लिया. अब जुर्माना वसूली उसके अपने नेटवर्क के जरिए होने लगी और उसके गिरोह में नए लड़कों की भर्ती तक होने लगी. बताया जाता है कि वह अपने गुर्गों को बाकायदा पैसे देता था.

दो इंजीनियरों की हत्या से पूरे बिहार में मचा हड़कंप

संतोष झा गैंग का नाम सबसे ज्यादा चर्चा में तब आया, जब दरभंगा में सड़क निर्माण कंपनी से जुड़े दो इंजीनियरों मुकेश कुमार और ब्रजेश कुमार की हत्या कर दी गई. मामले में करीब 7.5 अरब  रुपये की सड़क परियोजना से 10 प्रतिशत रंगदारी यानी लगभग 75 करोड़ रुपये मांगने की बात सामने आई. दो इंजीनियरों की हत्या के बाद पुलिस और सरकार की नजरें संतोष झा गैंग पर टिक गईं. गिरोह पर कार्रवाई के लिए STF को भी लगाया गया.

गिरफ्तारी हुई, लेकिन अपराध का सिलसिला नहीं रुका

फरवरी 2012 में संतोष झा को मोतिहारी पुलिस ने रांची से गिरफ्तार किया था. लेकिन पुलिस की ओर से रिमांड नहीं लिए जाने के बाद वह करीब एक महीने में जेल से बाहर आ गया. इसके बाद सीतामढ़ी में रंगदारी से जुड़े मामलों में हत्या के आरोप भी उस पर लगे. उसके खिलाफ 30 से ज्यादा आपराधिक मामले दर्ज बताए गए. कई मामले में गवाही नहीं होने के कारण उसे जमानत मिल चुकी थी, जबकि कुछ गंभीर मामलों में मुकदमे चलते रहे.

2018 में कोर्ट परिसर में ही हो गई हत्या

संतोष झा की अपराध की कहानी का सबसे सनसनीखेज अध्याय 28 अगस्त 2018 में लिखा गया. सीतामढ़ी के सीजेएम कोर्ट में पेशी के बाद जब वह पुलिस सुरक्षा के बीच बाहर निकल रहा था, तभी पेड़ की आड़ से हमलावरों ने उस पर गोलियां चला दीं. अस्पताल ले जाने पर डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया. उस समय संतोष की सुरक्षा में 11 पुलिसकर्मी मौजूद थे, लेकिन गोलीबारी के दौरान जवाबी फायरिंग नहीं होने पर सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठे. इसके बाद लापरवाही के आरोप में 25 पुलिसकर्मियों को सस्पेंड कर दिया गया.

किसने की थी संतोष झा की हत्या?

पुलिस के मुताबिक, जांच में मोतिहारी रिमांड होम से जुड़ी एक कड़ी भी सामने आई. हत्या में शामिल एक आरोपी ने कथित तौर पर डेविड नाम के व्यक्ति का जिक्र किया था, जिसने संतोष की हत्या के लिए सुपारी देने की बात कही थी. पुलिस ने कई ठिकानों पर छापेमारी की, लेकिन इस नाम के व्यक्ति का सुराग नहीं मिला. इस तरह संतोष की कहानी उसी अदालत की चौखट पर खत्म हुई, जहां वह कानून के सामने पेशी के लिए आया था.

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