बसपा में उत्तराधिकार का संघर्ष नहीं बल्कि गद्दी परिवार में किसे सौंपी जाए, की दुविधा है. मुखिया मायावती कहती भले हों कि पार्टी और बहुजन के हित उनके लिए सर्वोपरि हैं, लेकिन उत्तराधिकारी की तलाश उन्हें परिवार के बीच ही है. दो भतीजों में एक आकाश आनन्द को वे तीन बार आगे कर फिर घर वापस भेज चुकी हैं. फिर उसके छोटे भाई ईशान को जिम्मेदारियां दीं. महज हफ्ते भर के भीतर उससे मोहभंग हुआ और कहा कि दोनों भाईयों को तो नहीं लेकिन अगर उनकी बहन दीपिका चाहेगी तो उसे बसपा में आगे किया जाएगा. 20 सितंबर का ताजा बयान है कि दीपिका की शादी के बाद उनका मामला भी आकाश की तरह निकला तो यह पार्टी के हित में नहीं होगा.

फिलहाल ईशान आनंद की फिर वापसी हुई है. जल्दीजल्दी बदलते मायावती के फैसलों ने पार्टी के कैडर और समर्थकों को हतोत्साहित और विपक्षियों को हंसने और प्रहार का अवसर दिया है.
पार्टी कमजोर, मायावती की पकड़ बदस्तूर
क्षेत्रीय पार्टियों पर किसी एक परिवार का वर्चस्व भारतीय राजनीति का ऐसा सच है जिसे उन पार्टियों से जुड़े लोगों से लेकर वोटरों तक ने चाहेअनचाहे स्वीकार किया है. ऐसी पार्टियों के संस्थापक या चेहरे के अवसान काल में राजनीतिक उत्तराधिकार के संघर्ष का सिलसिला रहा है. आंध्र में एन टी रामाराव की तेलगु देशम हो या फिर तामिलनाडु में करुणानिधि की द्रमुक. कर्नाटक में एच डी देवेगौड़ा की जे डी या फिर महाराष्ट्र में शिवसेना और शरद पवार की एन.सी.पी. बिहार में लालू की राजद, झारखंड में शिबू सोरेन की झारखंड मुक्ति मोर्चा और उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी. सबमें बागडोर संभालने को लेकर संघर्ष हुआ.
मायावती, आकाश, दीपिका और ईशान. फोटो: PTI
टूटनबिखराव के बीच जो शक्तिशाली साबित हुआ वह पार्टी का चेहरा बना. लेकिन बसपा का मामला इन सबसे अलग है. कांशीराम ने मायावती को पार्टी सौंपी. उत्तर प्रदेश में तीन अवसरों पर गठबंधन और 2007 में पूर्ण बहुमत की मायावती की सरकार बनी. इस सफर में पार्टी के तमाम परिचित चेहरे उसे छोड़ते या बाहर किए जाते रहे. पार्टी कमजोर होते हुए लोकसभा में शून्य और उत्तर प्रदेश विधानसभा में एक पर पहुंच गई. दिलचस्प है कि पार्टी कमजोर हुई है. लेकिन पार्टी पर मायावती की पकड़ और उनके नेतृत्व पर कोई सवाल नहीं है.
भाजपा, सपा की चुनावी तैयारी, बसपा को उत्तराधिकारी की तलाश
2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव की गूंज तेज हो रही है. भाजपा अपनी तीसरी जीत के लिए तो सपा वापसी के लिए कमर कसे हुए है. राज्य की तीसरी बड़ी ताकत बसपा की क्या तैयारी है? फिलहाल का सच यह है कि प्रदेश में बसपा की चर्चा अगले चुनाव में संभावित प्रदर्शन की जगह मायावती के राजनीतिक उत्तराधिकारी को लेकर है. यह चर्चा और उसे लेकर चल रहे मजाक किसी विरोधी की देन नहीं है. इसका मौका खुद मायावती ने दिया है.
प्रतिद्वंद्वी दलों को इस बात की फिक्र नहीं है कि बसपा की आगे कमान कौन संभालेगा? उनकी कोशिश मायावती के समय में ही बसपा के वोट बैंक को अपनी ओर खींचने की है. दूसरी तरफ मायावती अपना राजनीतिक आधार सहेजने की जगह उत्तराधिकारी चयन की दुविधा में फंसी हुई हैं. वे बारबार बाबा साहब डॉ. भीमराव आंबेडकर और बसपा संस्थापक कांशीराम का उल्लेख करती हैं. कहती हैं कि उनके लिए बहुजन समाज ही परिवार है और पार्टी किसी व्यक्ति या परिवार की निजी संपत्ति नहीं है. लेकिन जब बात अपने राजनीतिक उत्तराधिकारी की आती है तो तलाश बारबार उनके छोटे भाई आनंद कुमार के परिवार में जाकर ठहर जाती है. वे इस काम को अपने बाद के लिए नहीं छोड़ना चाहतीं.
मायावती और आकाश आनंद. फोटो: PTI
बोर्ड पर बारबार बदलते नाम
पहले आकाश आनन्द को उन्होंने आगे किया. फिर पार्टी से बाहर कर दिया. फिर वापसी हुई. फिर जिम्मेदारियां मिलीं. फिर उन्हें हटाया गया. उनके राजनीतिक व्यवहार पर सवाल उठे और मायावती ने उनके ससुर अशोक सिद्धार्थ के गलत प्रभाव का भी उल्लेख किया. इसके बाद छोटे भाई ईशान आनंद का नाम सामने आया. फिर दोनों भतीजों को राजनीति से दूर रखने की बात कही गई और बहन दीपिका आनंद को भविष्य में जिम्मेदारी दिए जाने की संभावना जताई गई. अब 20 सितंबर को एक बार फिर तस्वीर बदल गई है आकाश और दीपिका को जिम्मेदारी से बाहर रखने और ईशान आनंद को आगे बढ़ाने की घोषणा की गई है. यानी उत्तराधिकारी की तलाश में कोई स्थिर मंजिल नहीं हैं.
बोर्ड पर नाम बारबार बदल रहे हैं आकाश, ईशान, दीपिका और अब फिर ईशान. बसपा में इन दिनों जो कुछ चल रहा है , उसके केंद्र में मायावती का परिवार है. पर परिवार के द्वंद का सीधा असर पार्टी की सेहत को नुकसान पहुंचा रहा है.
बसपा सुप्रीमो मायावती. फोटो: PTI
एक समय उत्तर प्रदेश में थी बसपा की धूम
बसपा की स्थापना जिस सामाजिकराजनीतिक दर्शन को लेकर हुई थी, उसमें व्यक्ति से अधिक मिशन और परिवार से अधिक बहुजन समाज को महत्व देने की बात थी. कांशीराम ने एक ऐसे संगठन की कल्पना की थी जिसमें दलित, पिछड़े, अल्पसंख्यक और सामाजिक रूप से वंचित समूह राजनीतिक सत्ता में हिस्सेदारी हासिल करें.मायावती इस आंदोलन की सबसे सफल राजनीतिक उत्तराधिकारी बनीं. उन्होंने कांशीराम की राजनीतिक विरासत को केवल संभाला ही नहीं, उसे उत्तर प्रदेश की सत्ता तक पहुंचाया.
2007 में बसपा ने उत्तर प्रदेश में अपने दम पर पूर्ण बहुमत हासिल किया. पार्टी को 30.43 प्रतिशत वोट और 403 सदस्यीय विधानसभा में 206 सीटें मिलीं. यह बसपा के राजनीतिक उत्कर्ष का ऐसा दौर था, जब बसपा दबाव की राजनीति का औजार नहीं बल्कि निर्णायक सत्ता शक्ति बन गई थी.
फिर ढलान की ओर
कहानी का अगला दौर बसपा के ढलान का है. 2012 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बसपा की सीटें घटकर 80 रह गईं. पिछले विधानसभा चुनाव की तुलना में लगभग पांच प्रतिशत वोट कम होकर प्रतिशत 25.95 रह गया. 2017 में और कमी आई. वोट प्रतिशत 22.23 पर आया और सीटें घटकर सिर्फ 19 रह गईं. 2022 का झटका और जबरदस्त था. वोट प्रतिशत 12.88 रह गया और 403 सदस्यीय विधानसभा में पार्टी केवल एक सीट पर सिमट गई.लोकसभा चुनावों की कहानी भी ऐसी ही रही. 2004 में उत्तर प्रदेश में पार्टी ने 19 सीटें जीतीं और लगभग 24.67 प्रतिशत वोट हासिल किए.
चुनाव दर चुनाव बसपा के सिकुड़ने के कई कारण हैं. फोटो: PTI
2009 में उसका प्रदर्शन और बेहतर रहा. 20 सीटें और 27.42 प्रतिशत वोट मिले. लेकिन 2014 में मोदी लहर के बीच बसपा का खाता नहीं खुला, हालांकि उसे 19.77 प्रतिशत वोट मिले थे. 2019 में सपा के साथ गठबंधन ने बसपा को साभाला. ये खबर आप क्विक समाचार में पढ़ रहे हैं। पार्टी ने 10 लोकसभा सीटें जीतीं और करीब 19.42 प्रतिशत वोट पाए. लेकिन 2024 में बसपा अकेले चुनाव मैदान में उतरी और उत्तर प्रदेश की 80 सीटों में से एक भी सीट नहीं जीत सकी. उसका वोट प्रतिशत घटकर 9.39 रह गया. पार्टी ने सिर्फ सीटें नहीं गंवाईं. उसका घटता वोट प्रतिशत बताता है कि पार्टी पर बेशक मायावती की पकड़ निर्विवाद है लेकिन उनका समर्थन आधार लगातार सिकुड़ता जा रहा है.
बसपा क्यों हुई कमजोर?
चुनाव दर चुनाव बसपा के सिकुड़ने के कई कारण हैं. बदलते सामाजिक गठजोड़. दलितों के बीच उभरते नए चेहरे. सपा और भाजपा का अलगअलग सामाजिक समूहों के बीच विस्तार. चुनावी गठबंधनों की बदलती प्रकृति. इन चुनौतियों से मुकाबले के लिए मायावती ने क्या किया अथवा कर रहीं हैं? चुनावी असफलताओं के बीच नेता नए आसरे तलाशते रहे हैं. लेकिन बसपा में यह गति बहुत तेज रही है. वहां कोई भी चेहरा वोटरों या मीडिया में चर्चित होते ही मायावती को खटकने लगता है और फिर जल्दी ही उसकी छुट्टी हो जाती है.
वंचितों की अगुवाई और पैरोकारी करने वाली मायावती की बड़ी चुनावी रैलियों के अलावा सार्वजनिक कार्यक्रमों में उपस्थिति दुर्लभ होती है. उन्हें अपने वोट बैंक पर इतना ज्यादा भरोसा है कि सत्ता से दूर रहने पर उनके हक में जमीनी संघर्ष के लिए स्वयं आगे आने या फिर पार्टी कैडर को सक्रिय करने की उनकी कोशिश नज़र नहीं आती.
मायावती के साथ बैठक में ईशान.
पारिवारिक प्रपंच को किया सार्वजनिक
क्या इन जरूरतों के लिए ही वे अपने भाई आनंद कुमार के दो बेटों और एक बेटी में से किसी एक को आगे करने में आगेपीछे हो रहीं हैं? आकाश आनंद को आगे बढ़ाना अपने आप में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक प्रयोग था. युवा चेहरा, मायावती परिवार की अगली पीढ़ी और डिजिटल दौर की राजनीति से परिचित नेतृत्व, इन सब कारणों से आकाश में नई संभावनाएं देखी गईं.
लेकिन यह प्रयोग स्थिर नहीं रह सका.मायावती ने आकाश को कभी उत्तराधिकारी की भूमिका दी. फिर उन्हें हटाया. बाद में वापसी हुई. जल्दी ही फिर पार्टी की जिम्मेदारियों से मुक्त कर दिया गया.आखिरी बार मायावती ने आकाश के विवाह के बाद के व्यवहार और गतिविधियों को निष्कासन का आधार बनाया और उनके ससुर अशोक सिद्धार्थ पर साजिश के आरोप लगाये. आकाश की अभी कोई बड़ी राजनीतिक हैसियत नहीं बन पायी है. लेकिन मायावती ने पारिवारिक प्रपंच को सार्वजनिक करके अपने फैसलों पर सवाल करने का विपक्षियों को मौका जरूर दे दिया है.
तीन में कौन?
आकाश के बाद उनके छोटे भाई ईशान आनंद को आगे बढ़ाने की मायावती ने बात की. फिर 12 सितंबर को कहा कि उनके दोनों भतीजों आकाश और ईशान में किसी को पार्टी में कोई पद नहीं दिया जाएगा. आगे जोड़ा कि उनके भाई आनंद कुमार की बेटी दीपिका आनंद की मदद ली जा सकती है और भविष्य में उन्हें जिम्मेदारी दी जा सकती है. इससे लगा कि शायद उत्तराधिकार की नई दिशा तय हो गई है. लेकिन 20 सितंबर को उन्होंने फिर फैसला बदला. आकाश और दीपिका दोनों को पार्टी की जिम्मेदारियों से दूर रखने का ऐलान किया. ईशान आनंद की वापसी और संगठन में उन्हें सम्मानजनक भूमिका देने की घोषणा की. 23 सितंबर की पार्टी की बैठक में इसकी औपचारिक घोषणा हो सकती है. आठ दिनों के भीतर मायावती के बारबार बदलते फैसले चुनाव में पार्टी प्रदर्शन में क्या असर छोड़ते हैं, इसमें राजनीति के जानकारों की दिलचस्पी बनी रहेगी.
क्षेत्रीय राजनीति में परिवारवाद कोई नई बात नहीं है. लेकिन बसपा की स्थिति कुछ अलग मानी जाती थी. बसपा पारंपरिक राजनीतिक परिवारों से जुदा राजनीति का दावा करती रही है. कांशीराम का पूरा राजनीतिक जीवन इसी दावे का प्रतीक माना गया. मायावती आज भी दोहराती हैं कि बसपा किसी परिवार की जागीर नहीं है. लेकिन विडंबना है कि मायावती अपने बाद की बसपा की बागडोर सौंपने के लिए सिर्फ अपने भाई के बच्चों के बारे में सोच पा रही हैं. दुविधा सिर्फ इतनी है कि इन तीन में कौन?