कर्मचारियों को जबरन नहीं पहना सकते सांता क्लॉज की लाल टोपी इलाहाबाद हाईकोर्ट​

कर्मचारियों को जबरन नहीं पहना सकते सांता क्लॉज की लाल टोपी इलाहाबाद हाईकोर्ट​

कार्यस्थल पर कर्मचारियों की धार्मिक आस्था और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अहम टिप्पणी की है. कोर्ट ने कहा कि किसी कर्मचारी को उसकी इच्छा के खिलाफ सांता क्लॉज की लाल टोपी पहनने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता. अदालत के मुताबिक, अलगअलग धर्म और विश्वास रखने वाले कर्मचारियों पर किसी धार्मिक या सांस्कृतिक प्रतीक को थोपने से उनकी भावनाएं आहत हो सकती हैं और इससे कार्यस्थल का शांतिपूर्ण एवं सौहार्दपूर्ण माहौल भी प्रभावित हो सकता है.

यह टिप्पणी जस्टिस सौरभ श्रीवास्तव की सिंगल बेंच ने विक्रम सिंह उर्फ विश्व विक्रम सिंह बनाम उत्तर प्रदेश सरकार व अन्य मामले में की. मामला आगरा के सदर बाजार स्थित वी बाजार से जुड़ा है. आरोप था कि वर्ष 2022 में संस्थान के वरिष्ठ अधिकारियों की ओर से कर्मचारियों को सांता क्लॉज की लाल टोपी पहनने के निर्देश दिए गए थे. इसे लेकर धार्मिक भावनाएं आहत होने की शिकायत के बाद पुलिस ने मुकदमा दर्ज किया था.

2023 में जारी हुआ था समन

पुलिस जांच के बाद मामले में आईपीसी की धारा 298 और 504 के तहत आरोप पत्र दाखिल किया गया. ये खबर आप क्विक समाचार में पढ़ रहे हैं। इसके बाद आगरा के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने दिसंबर 2023 में आरोपी के खिलाफ संज्ञान लेते हुए समन जारी किया था. इस कार्रवाई को चुनौती देते हुए विक्रम सिंह ने हाईकोर्ट का रुख किया और चार्जशीट, समन आदेश तथा आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने की मांग की.

याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि धारा 298 और 504 आईपीसी के तहत अपराध गैरसंज्ञेय हैं. ऐसे में सीआरपीसी की धारा 2 की व्याख्या के मुताबिक पुलिस की ओर से दाखिल रिपोर्ट को शिकायत के तौर पर माना जाना चाहिए, न कि सामान्य पुलिस केस के रूप में.

कोर्ट की चेतावनी

हाईकोर्ट ने इस कानूनी दलील को स्वीकार करते हुए कहा कि मजिस्ट्रेट ने चार्जशीट पर राज्य के मुकदमे के रूप में संज्ञान लेकर कानूनी त्रुटि की. अदालत ने आवेदक के खिलाफ दिसंबर 2023 के समन आदेश को रद्द कर दिया. हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि संबंधित अदालत कानून के मुताबिक इस मामले को शिकायत वाद के रूप में आगे बढ़ा सकती है.

इसके साथ ही अदालत ने कार्यस्थल पर कर्मचारियों के बीच सौहार्द बनाए रखने को लेकर भी चेतावनी दी. कोर्ट ने कहा कि किसी कर्मचारी की आस्था के विपरीत इस तरह का दबाव अलगअलग विश्वास रखने वाले लोगों की भावनाओं को प्रभावित कर सकता है. अदालत ने आवेदक और उनके वरिष्ठ अधिकारियों को भविष्य में ऐसे निर्देश दोहराने से बचने की चेतावनी दी, जिनसे कार्यस्थल का शांतिपूर्ण और सौहार्दपूर्ण वातावरण प्रभावित हो.

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