आजादी का महापर्व: तिरंगे की शान के लिए खड़ा रहा विवेक, देशप्रेम ने बदल दी मेहनत की कहानी

आजादी का महापर्व: तिरंगे की शान के लिए खड़ा रहा विवेक, देशप्रेम ने बदल दी मेहनत की कहानी

विवेक आज सुबह बहुत जल्दी तैयार हो गया था। आज उसे कई कालोनियों में तिरंगे झंडे बेचने जाना था। स्वतंत्रता दिवस पर हर घर में तिरंगा लहराने वाला था। विवेक ने अपनी मां और बाबू जी के साथ मिलकर ढेर सारे तिरंगे तैयार किए थे। दोपहर में स्कूल से लौटने के बाद वह तिरंगे बनाने में जुट जाता था। उसने सोचा था कि यदि सारे झंडे बिक गए तो मां के लिए साड़ी और बाबू जी के लिए कुर्तापैजामा जरूर खरीदेगा।

उसने थर्माकोल की कई शीटें अपने ठेले पर बिछाकर रस्सी से बांध दीं, ताकि वे हवा में उड़ न सकें। फिर उसने सारे तिरंगे उन पर खड़े करके सजा दिए। मां और बाबू जी के चरण स्पर्श कर उसने कहा, “मुझे आशीर्वाद दीजिए कि आज मेरे सारे झंडे बिक जाएं।” मां ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “जाओ बेटा, भगवान आज तुम्हारी मेहनत का बहुत अच्छा फल देंगे।” विवेक पास की एक बड़ी कालोनी में पहुंचा और आवाज लगाने लगा, “झंडे ले लो भाइयोंबहनों… अपने घरों में तिरंगा लगाओ… आजादी का पर्व मनाओ।” 

उसकी आवाज सुनकर एक वृद्ध व्यक्ति ने उसे रोक लिया। सारे झंडों को खड़ा देखकर उन्होंने पूछा, “बेटे, तुमने झंडों को इस तरह खड़ा करके क्यों लगाया है?” 

विवेक ने मुस्कराकर कहा, “बाबा, यह झंडा हमारे देश की शान है और हमारे देश की शान कभी झुक नहीं सकती। मैंने कोशिश की है कि कोई भी झंडा जमीन या ठेले के फर्श को न छुए। तिरंगा हमारे देश का गौरव है। इसके लिए न जाने कितने बलिदानियों ने अपना जीवन दे दिया। मैं गरीब हूं, इसलिए इन्हें बेच रहा हूं। अगर अमीर होता तो इन्हें निशुल्क बांट देता।” विवेक की बातें सुनकर वृद्ध की आंखों से आंसू बहने लगे। उन्होंने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “बेटा, मुझे गर्व है तुम पर!” उन्होंने जेब से तीन हजार रुपये निकालकर कहा, “मैं तुम्हारे सारे झंडे खरीदकर अपनी कालोनी के हर घर में निशुल्क बांटूंगा। इनकी कोई कीमत नहीं, ये अमूल्य हैं। ये खबर आप क्विक समाचार में पढ़ रहे हैं। ये रुपये तुम्हारे श्रम और देशप्रेम का पुरस्कार हैं।” विवेक ने सारे झंडे उन्हें सौंपे, पैर छुए और मांबाबू जी के लिए नए कपड़े लेने बाजार की ओर चल पड़ा। आजादी के महापर्व ने उसके श्रम और देशप्रेम का उचित मूल्यांकन कर दिया था।

डॉ. देशबंधु, शाहजहांपुर

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