उत्तर प्रदेश में निषाद समुदाय की नाराजगी अब धीरेधीरे बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनती दिख रही है. आरक्षण की पुरानी मांग को लेकर समुदाय में पहले से असंतोष है, लेकिन गोंडा में निषाद पार्टी से जुड़े कार्यकर्ता और व्यापारी विनोद कुमार साहनी की मौत के बाद यह गुस्सा और बढ़ गया. विनोद पर बुधवार रात हमला हुआ था. गंभीर हालत में उन्हें लखनऊ के KGMU लाया गया, जहां इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई. इसके बाद निषाद पार्टी के अध्यक्ष और यूपी सरकार में मंत्री संजय निषाद KGMU पहुंचे और धरने पर बैठ गए. उन्होंने दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की मांग की.

यह मामला बीजेपी के लिए इसलिए अहम है क्योंकि निषाद पार्टी बीजेपी की सहयोगी है और निषाद समुदाय पूर्वी यूपी की कई सीटों पर चुनावी समीकरण को प्रभावित करने की ताकत रखता है. ऐसे में अगर आरक्षण, सुरक्षा और गोंडा की घटना जैसे मुद्दों को लेकर समुदाय की नाराजगी बढ़ती है, तो इसका दबाव बीजेपी और उसके सहयोगी दल दोनों पर पड़ सकता है. ये खबर आप क्विक समाचार में पढ़ रहे हैं। 2027 का विधानसभा चुनाव भी ज्यादा दूर नहीं है. ऐसे में सवाल सिर्फ यह नहीं है कि निषाद क्यों नाराज हैं, बल्कि बड़ा सवाल यह है कि क्या यह नाराजगी चुनावी नुकसान में बदल सकती है?
निषाद वोट बीजेपी के लिए क्यों अहम?
निषाद, केवट, मल्लाह और बिंद जैसे समुदायों की खास मौजूदगी पूर्वी उत्तर प्रदेश में है. गोरखपुर, संतकबीरनगर, भदोही, मिर्जापुर, प्रयागराज और आसपास के इलाकों में इनकी राजनीतिक भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है. कई विधानसभा सीटों पर इनका वोट जीतहार का अंतर बदलने की क्षमता रखता है. यही वजह है कि बीजेपी से लेकर समाजवादी पार्टी तक सभी दल निषाद समुदाय को अपने साथ जोड़ने की कोशिश करते हैं. बीजेपी ने भी इसी रणनीति के तहत निषाद पार्टी के साथ गठबंधन किया.
साल 2022 के विधानसभा चुनाव में निषाद पार्टी के 6 विधायक जीतकर विधानसभा पहुंचे थे. लेकिन, 2024 के लोकसभा चुनाव में यूपी का राजनीतिक समीकरण बदला. बीजेपी को राज्य में बड़ा नुकसान हुआ, जबकि समाजवादी पार्टी और कांग्रेस गठबंधन ने कई सीटों पर बेहतर प्रदर्शन किया. ऐसे में 2027 से पहले बीजेपी के लिए अपने सहयोगी दलों और पिछड़े वर्गों के बीच समर्थन मजबूत रखना और भी जरूरी हो गया है.
निषाद समुदाय क्यों नाराज है?
- आरक्षण सबसे बड़ा मुद्दा: निषाद समुदाय लंबे समय से निषाद, केवट, मल्लाह और बिंद जैसी जातियों को अनुसूचित जाति की सूची में शामिल करने की मांग कर रहा है.
- गोंडा की घटना ने बढ़ाया गुस्सा: विनोद साहनी की मौत के बाद समुदाय में आक्रोश बढ़ा है. परिवार और समर्थक दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग कर रहे हैं.
- पुलिस कार्रवाई पर सवाल: संजय निषाद ने पुलिस की भूमिका पर सवाल उठाए और कार्रवाई की मांग की. इसके बाद दो पुलिस अधिकारियों के निलंबन की बात सामने आई.
- सोशल मीडिया विवाद: पुलिस की शुरुआती जांच के मुताबिक, विनोद साहनी की सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर विवाद हुआ था. इसी विवाद के बाद उन पर हमला होने की बात सामने आई.
बीजेपी के लिए क्यों बढ़ सकती है टेंशन?
बीजेपी की सबसे बड़ी चिंता यह है कि निषाद पार्टी उसकी सहयोगी है. ऐसे में अगर निषाद समुदाय के बीच यह संदेश जाता है कि उनकी मांगों और शिकायतों को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा, तो इसका असर बीजेपीनिषाद पार्टी के रिश्तों पर पड़ सकता है. गोंडा मामले में संजय निषाद का खुद धरने पर बैठना भी बताता है कि यह मुद्दा उनके लिए कितना संवेदनशील है. अगर आरक्षण की मांग और सुरक्षा से जुड़े सवाल लगातार उठते रहे, तो विपक्ष को बीजेपी पर हमला करने का मौका मिलेगा.
कितनी विधानसभा सीटों पर असर?
- गोरखपुरबस्ती बेल्ट गोरखपुर, संत कबीर नगर, बस्ती, देवरिया, कुशीनगर
- अयोध्याअंबेडकर नगर बेल्ट अयोध्या, अंबेडकर नगर, सुल्तानपुर के कुछ हिस्से
- पूर्वांचल का गंगाघाघरा क्षेत्र गाजीपुर, बलिया, मऊ, आजमगढ़, जौनपुर
- काशीमिर्जापुर क्षेत्र वाराणसी, चंदौली, मिर्जापुर, भदोही
- प्रयागराज क्षेत्र प्रयागराज और आसपास के कुछ विधानसभा क्षेत्र
हालांकि, अभी यह कहना सही नहीं होगा कि निषाद समुदाय पूरी तरह बीजेपी से दूर हो रहा है. लेकिन, चुनावी राजनीति में कुछ सीटों पर छोटा सा वोट स्विंग भी बड़ा फर्क पैदा कर सकता है. यही वजह है कि बीजेपी के लिए निषादों की नाराजगी को समय रहते संभालना जरूरी होगा.
निषाद vs ठाकुर एंगल क्यों चर्चा में?
गोंडा में विनोद साहनी की मौत के बाद मामला जातीय तनाव के एंगल से भी देखा जाने लगा है. पुलिस के मुताबिक, मामले में गिरफ्तार आरोपी ठाकुर जाति से हैं. यही वजह है कि निषाद समुदाय के बीच यह सवाल उठ रहा है कि क्या उनके साथ न्याय और सुरक्षा के मामले में भेदभाव हो रहा है. हालांकि, पहले भी निषाद और ठाकुरों के बीच कई मामले सुनने में आए हैं, लेकिन विनोद साहनी के मामले ने इस विवाद को और बढ़ा दिया है.
आरक्षण की मांग कितनी पुरानी है?
निषाद समुदाय की आरक्षण की मांग नई नहीं है. समुदाय लंबे समय से निषाद, केवट, मल्लाह और उनसे जुड़ी जातियों को अनुसूचित जाति की सूची में शामिल करने की मांग करता रहा है. हाल ही में कासगंज के पटियाली में भी निषाद समाज ने आरक्षण को लेकर प्रशासन को ज्ञापन सौंपा. समुदाय के लोगों ने अपनी जातियों को अनुसूचित जाति की सूची में शामिल करने की मांग दोहराई. आरक्षण का मुद्दा अभी भी समुदाय के बीच सक्रिय है. अगर इसके साथ गोंडा की घटना जैसे स्थानीय मुद्दे जुड़ते हैं, तो नाराजगी ज्यादा व्यापक हो सकती है.