कुदरत का अनोखा करिश्मा! जमीन के अंदर दबकर भी सालों जिंदा रहती है ये मछली, जानिए इसका रहस्य?

कुदरत का अनोखा करिश्मा! जमीन के अंदर दबकर भी सालों जिंदा रहती है ये मछली, जानिए इसका रहस्य?
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दुनियाभर में कई ऐसे विचित्र जीव-जंतु हैं, जिनके बारे में जानकर हैरानी होती है. इनमें से कुछ जीव अपनी ही प्रजाति के दूसरे जीवों से बिल्कुल अलग होते हैं. अब मछली को ही ले लीजिए. बचपन से ही हम पढ़ते आ रहे हैं कि ‘मछली जल की रानी है, जीवन उसका पानी है’, यानी बिना पानी के मछली का जिंदा रहना नामुमकीन है. ये खबर आप क्विक समाचार में पढ़ रहे हैं। वो तड़प-तड़प कर मर जाएगी. लेकिन एक मछली ऐसी भी है, जो पानी के बिना महीनों ही नहीं, बल्कि कई सालों तक जमीन पर जिंदा रह सकती है. इस अनोखी और रहस्यमयी मछली का नाम लंगफिश है, जिसे कई जगहों पर सालामैंडरफिश के नाम से भी पहचाना जाता है. यह मीठे पानी में पाई जाने वाली एक विशेष प्रकार की मछली है, जो जमीन पर रहने के अपने अद्भुत गुण के लिए दुनिया भर में मशहूर है.

लंगफिश, इसके नाम से ही साफ पता चलता है, इस मछली के पास एक बहुत ही विकसित श्वसन तंत्र होता है. इंसानों और जमीनी जानवरों की तरह यह मछली भी सीधे हवा से ऑक्सीजन लेने में सक्षम होती है. लंगफिश का शरीर काफी लंबा और पतला होता है, जो देखने में बिल्कुल बाम मछली की तरह दिखाई देता है. इसके पास धागे जैसे पतले पंख होते हैं, जिनका उपयोग यह पानी में तैरने और सतह पर रेंगने के लिए करती है. यह मछली आमतौर पर उथले पानी के सोर्स जैसे दलदल, पोखर और झीलों में रहना पसंद करती है. जब तक पानी मौजूद रहता है, तब तक यह बाकी सामान्य मछलियों की तरह ही व्यवहार करती है और छोटे जीवों तथा केकड़ों को अपना भोजन बनाती है.

सबसे हैरान कर देने वाली बात यह है कि वयस्क होने पर इनमें से कुछ प्रजातियों के गलफड़े काम करना लगभग बंद कर देते हैं. ऐसे में पानी में रहते हुए भी इन्हें सांस लेने के लिए बार-बार सतह पर आना पड़ता है. अगर इस मछली को लंबे समय तक पानी के अंदर ही दबाकर रखा जाए, तो सांस न ले पाने के कारण यह पानी के भीतर ही डूबकर मर सकती है. यह बात इसे दुनिया की बाकी सभी मछलियों से एकदम अलग और अनोखा बनाती है. जब भीषण गर्मी और सूखे का मौसम आता है और नदियां-तालाब सूखने लगते हैं, तब लंगफिश अपनी जान बचाने का अनोखा तरीका अपनाती है. यह अपने मुंह में मिट्टी भरकर और उसे गलफड़ों से बाहर निकालकर कीचड़ के अंदर एक गहरा गड्ढा खोद लेती है.

उस गड्ढे की गहराई में पहुंचने के बाद यह अपनी त्वचा से एक विशेष तरल पदार्थ (म्यूकस) छोड़ती है, जो सूखकर एक सुरक्षात्मक खोल बन जाता है. इस खोल के अंदर मछली का केवल मुंह सांस लेने के लिए खुला रहता है. सूखे के इस लंबे दौर में मछली अपनी मेटाबॉलिज्म को बहुत कम कर देती है और अपनी पूंछ के मांसपेशियों के ऊतकों को खाकर जीवित रहती है. जब दोबारा बारिश होती है और मिट्टी नरम पड़ती है, तो यह बाहर निकल आती है. यह मछली सूखे कीचड़ में 4 साल तक बिना पानी के जिंदा रह सकती है. यह मुख्य रूप से अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में पाई जाती है, जहां स्थानीय लोग सूखे के दौरान जमीन खोदकर इसे खाने के लिए निकालते हैं.

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