कौन था कालनेमि? जिसका नाम लेकर CM योगी ने किया कार्यकर्ताओं को अलर्ट​

कौन था कालनेमि? जिसका नाम लेकर CM योगी ने किया कार्यकर्ताओं को अलर्ट​

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने लखनऊ में विश्व हिन्दू परिषद के शीर्ष नेता रहे अशोक सिंघल के जन्मशताब्दी वर्ष पर आयोजित कार्यक्रम में रामायण के एक चरित्र कालनेमि को याद किया. कार्यक्रम में मौजूद लोगों से योगी ने अपील की कि बाबरी के भक्त कालनेमि बनकर रामकाज में घुसेंगे. आंदोलन को बदनाम करने की कोशिश करेंगे. सीएम ने कहा कि धर्म की आड़ में काम करने वाले लोगों को पहचानना और उनकी कथित साजिशों को सफल नहीं होने देना है.

सीएम योगी के इस बयान का आशय समझने के लिए पहले उस धार्मिक कथा को जानना जरूरी है, जिसमें कालनेमि का प्रसंग आता है. किसी राजनीतिक बयान में इस नाम का इस्तेमाल एक उपमा की तरह है. आइए, इसी बहाने समझने का प्रयास करते हैं कि कौन था कालनेमि? क्या है उसकी प्रचलित कहानी? रामायण में कहां और किस रूप में आता है उसका प्रसंग? योगी ने क्यों कहा कि इन्हें पहचानें और साजिश विफल करें?

मायावी राक्षस था कालनेमि

रामायण की कथाओं में कालनेमि का प्रसंग एक मायावी राक्षस के रूप में मिलता है. उसका नाम छल, भेष और भ्रम से जुड़ा है. इसी कारण आज भी कालनेमि शब्द का इस्तेमाल ऐसे व्यक्ति के लिए रूपक के तौर पर किया जाता है, जो बाहर से कुछ और दिखे और भीतर से कुछ और करे. कपटी हो. धोखेबाज हो. छल करने में माहिर हो.

कालनेमि का प्रसंग एक मायावी राक्षस के रूप में मिलता है.

संजीवनी की खोज में बाधा डालने की कोशिश

रामायण के युद्ध प्रसंग में लक्ष्मण मेघनाद के अस्त्र से मूर्छित हो जाते हैं. उनके प्राण संकट में होते हैं. वैद्य सुषेण उन्हें बचाने के लिए एक विशेष औषधि लाने की सलाह देते हैं. हनुमान को औषधि लेने के लिए हिमालय पर्वत की ओर भेजा जाता है. उन्हें समय पर लौटना है, क्योंकि लक्ष्मण का जीवन उस औषधि पर निर्भर बताया गया है. रावण को हनुमान के इस अभियान का पता चलता है. वह उन्हें रोकने के लिए कालनेमि को भेजता है. कालनेमि बल से हनुमान को हराने की कोशिश नहीं करता. वह छल का रास्ता चुनता है. कथा में यही उसका मुख्य गुण दिखाई देता है.

लिया साधु का रूप और बनाया मायावी आश्रम

रामचरितमानस के लंका काण्ड में कालनेमि का प्रसंग आता है. वह साधु का वेश धारण करता है. रास्ते में एक आश्रम और सरोवर का भ्रम रचता है. हनुमान वहां पहुंचते हैं, तो कालनेमि उन्हें ठहरने और स्नान करने के लिए कहता है. उसका उद्देश्य हनुमान का समय नष्ट करना है. सामान्य कथा के अनुसार, सरोवर में एक मादा मगरमच्छ हनुमान को पकड़ लेती है. हनुमान उसे मार देते हैं. उसके बाद वह शाप से मुक्त हुई अप्सरा के रूप में प्रकट होकर साधु के भेष में बैठे व्यक्ति का भेद बताती है. हनुमान समझ जाते हैं कि यह कोई सच्चा तपस्वी नहीं, बल्कि रावण का भेजा हुआ कालनेमि है.

सीएम योगी आदित्यनाथ

कुछ यूं हुआ कालनेमि का अंत

भेद खुलने पर कालनेमि का छल काम नहीं आता. हनुमान जी उसका वध करते हैं और अपने अभियान पर आगे बढ़ जाते हैं. कथा में हनुमान की तत्परता, विवेक और अपने उद्देश्य के प्रति निष्ठा प्रमुख हैं. वे केवल बाहरी रूप देखकर निर्णय नहीं करते. वे परिस्थितियों को समझते हैं और सत्य सामने आने पर बिना देर किए आगे बढ़ते हैं. रामचरित मानस में कालनेमि का नाम वेषधारी ठग के उदाहरण के रूप में भी आता है.

इसी संदर्भ में गोस्वामी तुलसीदास लिखते हैं

लाखि सुभेष जग बंचक जेऊ, वेष प्रताप पूजिअहिं तेऊ

उघरहिं अंत न होइ निभाहू, कालनेमि जिमि रावन राहू

इन पंक्तियों का सरल भाव यह है कि अच्छा रूप धारण करने से कोई व्यक्ति सच्चा नहीं हो जाता. लोग शुरू में भेष देखकर सम्मान दे सकते हैं. लेकिन छल अधिक समय तक छिपा नहीं रहता. अंतत उसका भेद खुल जाता है.

क्या है धार्मिक संदर्भ का महत्व?

कालनेमि की कथा को केवल एक राक्षस के वध की कहानी मानकर पढ़ना अधूरा होगा. इसमें यह प्रश्न भी है कि किसी की पहचान कैसे की जाए. कथा का संकेत है कि केवल वेश, मीठी बात या धार्मिक शब्दों के आधार पर किसी पर भरोसा नहीं करना चाहिए. उसके आचरण और उद्देश्य को भी देखना चाहिए. यह सीख किसी धर्म या समुदाय के सभी लोगों पर संदेह करने की नहीं है. कथा का केंद्र छल करने वाला पात्र है. ये खबर आप क्विक समाचार में पढ़ रहे हैं। इसलिए इसे किसी पूरे समूह के विरुद्ध आरोप लगाने का आधार नहीं बनाना चाहिए. इसकी सीख यही है कि व्यक्ति के काम और व्यवहार को परखा जाए. बिना प्रमाण किसी को दोषी ठहराना उचित नहीं है.

योगी के बयान में कालनेमि का रूपक

योगी आदित्यनाथ के बयान में कालनेमि का इस्तेमाल एक धार्मिक रूपक के तौर पर हुआ. इसका संकेत ऐसे लोगों की ओर था, जो उनके अनुसार धर्म का बाहरी रूप लेकर उसके विपरीत काम कर सकते हैं. यह उस वक्तव्य का राजनीतिक और सार्वजनिक संदर्भ है. इसे रामायण की कथा से जोड़कर समझा जा सकता है, लेकिन दोनों को एक ही चीज नहीं माना जा सकता. धार्मिक कथा हमें एक प्रतीक देती है. सार्वजनिक बयान उस प्रतीक को वर्तमान संदर्भ में इस्तेमाल करता है. किसी भी वर्तमान आरोप की सच्चाई का निर्णय कथा के आधार पर नहीं, बल्कि उपलब्ध प्रमाण के आधार पर किया जाना संभव होगा.

क्या है सीख?

कालनेमि का प्रसंग आज भी प्रासंगिक है. यह कई सरल बातें याद दिलाता है. बाहरी रूप हमेशा भीतरी सत्य नहीं बताता. जल्दबाजी में भरोसा करने के बजाय बातों और कर्मों को परखना उचित होगा. संदेह को प्रमाण का विकल्प नहीं बनाना चाहिए. प्रचलित कथा में हनुमान अपने लक्ष्य से विचलित नहीं होते. वे ठहरने के प्रस्ताव को सुनते हैं, लेकिन आगे की घटनाओं से सच पहचान लेते हैं. यही विवेक आज भी उपयोगी है. किसी व्यक्ति की आलोचना हो या उसका समर्थन, निर्णय तथ्यों के आधार पर होना चाहिए. धर्म के नाम पर फैलने वाले भ्रम से बचना जरूरी है. उतना ही जरूरी है कि धर्म के प्रतीकों का इस्तेमाल बिना प्रमाण किसी को बदनाम करने के लिए न किया जाए.

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