क्या प्राचीन भारत में भी होती थी लव मैरिज? जानिए शास्त्रों में दर्ज ‘गंधर्व विवाह’ के दिलचस्प नियम और सच

क्या प्राचीन भारत में भी होती थी लव मैरिज? जानिए शास्त्रों में दर्ज ‘गंधर्व विवाह’ के दिलचस्प नियम और सच

आज के दौर की लव मैरिज प्राचीन काल का गंधर्व विवाह ही है, जिसका वर्णन ऋग्वेद और मनुस्मृति जैसे ग्रंथों में आपसी प्रेम और बिना किसी सामाजिक आडंबर के विवाह के रूप में मिलता है.

क्या प्राचीन भारत में भी होती थी लव मैरिज? जानिए शास्त्रों में दर्ज 'गंधर्व विवाह' के दिलचस्प नियम और सच

आज के समय में हम जिसे लव मैरिज कहते हैं, वह कोई नई बात नहीं है. हमारे प्राचीन हिंदू शास्त्रों में इसे गंधर्व विवाह का नाम दिया गया है. बहुत से लोगों को लगता है कि अपनी मर्जी से शादी करने का चलन पश्चिमी देशों से आया है. लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है. 

हमारे पौराणिक ग्रंथों में इसका जिक्र बहुत पुराने समय से मिलता है. उस जमाने में भी जब कोई लड़का और लड़की एक दूसरे को दिल दे बैठते थे, तो वे बिना किसी आडंबर के शादी कर लेते थे. आइए आसान भाषा में समझते हैं कि गंधर्व विवाह आखिर क्या है और शास्त्रों में इसे लेकर क्या लिखा गया है.

गंधर्व विवाह की शुरुआत कहां से हुई

इस अनोखी शादी की शुरुआत का पहला जिक्र ऋग्वेद में देखने को मिलता है. ऋग्वेद के दसवें मंडल में गंधर्वों का उल्लेख किया गया है. प्राचीन कथाओं के अनुसार, एक गंधर्व ने अप्सरा से उसकी मर्जी से शादी की थी. इस शादी में कोई बड़े कर्मकांड या पंडित की जरूरत नहीं पड़ी थी. 

ये पूरी तरह से दोनों के बीच के सच्चे प्रेम और आकर्षण पर टिका था. ये खबर आप क्विक समाचार में पढ़ रहे हैं। नारद स्मृति में भी स्पष्ट लिखा है कि जब एक युवक और युवती अपनी पूरी इच्छा से एक दूसरे को जीवनसाथी मान लेते हैं, तो उसे ही गंधर्व विवाह कहा जाता है.

मनुस्मृति में आठ तरह की शादियों का जिक्र

हिंदू धर्म के प्रसिद्ध ग्रंथ मनुस्मृति में इंसानों के लिए आठ तरह के विवाहों के बारे में बताया गया है. इनमें ब्रह्म, देव, आर्ष, प्राजापत्य, आसुर, गंधर्व, राक्षस और पैशाच विवाह शामिल हैं. 

मनुस्मृति के तीसरे अध्याय के अनुसार, जब कोई लड़का और लड़की एक दूसरे को पसंद करके बिना माता पिता की अनुमति के शादी का फैसला लेते हैं, तो वह गंधर्व विवाह की श्रेणी में आता है. इस तरह के विवाह में दोनों का मानसिक और भावनात्मक रूप से एक होना सबसे जरूरी माना गया है.

बिना समाज और परिवार के होता था ये बंधन

गंधर्व विवाह की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि इसमें परिवार या समाज की दखलअंदाजी नहीं होती थी. इसमें न तो कोई लंबी चौड़ी रस्में होती थीं और न ही रिश्तेदारों का जमावड़ा लगता था. 

दो प्रेमी बस एक दूसरे को वरमाला पहनाकर या मन ही मन पति पत्नी स्वीकार कर लेते थे. कई मामलों में इस तरह के रिश्तों में शारीरिक जुड़ाव भी शादी का मुख्य आधार बनता था. राजा दुष्यंत और शकुंतला की प्रसिद्ध कहानी गंधर्व विवाह का ही सबसे बड़ा और ऐतिहासिक उदाहरण मानी जाती है.

आज के दौर में गंधर्व विवाह का बदला रूप

पुराने जमाने में आठ तरह की शादियां होती थीं, लेकिन आज के दौर में मुख्य रूप से दो ही रूप बचे हैं. पहला है ब्रह्म विवाह, जिसे हम सब अरेंज मैरिज कहते हैं. इसमें परिवार के बड़े बुजुर्ग सब मिलकर शादी तय करते हैं. 

दूसरा है गंधर्व विवाह, जिसे आज लव मैरिज कहा जाता है. आज के समय में युवा अपने पार्टनर का चुनाव खुद करते हैं. जब दो लोग अपनी पसंद से शादी का फैसला लेते हैं, तो वह सीधे तौर पर प्राचीन गंधर्व विवाह का ही आधुनिक रूप होता है.

गंधर्व विवाह के सामने आने वाली बड़ी चुनौतियां

शास्त्रों में गंधर्व विवाह को मान्यता तो दी गई, लेकिन इसे सबसे उत्तम नहीं माना गया. इसके पीछे कुछ व्यावहारिक कारण भी हैं. इस विवाह में अक्सर परिवार का सहयोग नहीं मिलता है. जब शादी के बाद जिंदगी में असली परेशानियां आती हैं, तो मार्गदर्शन देने वाला कोई बड़ा साथ नहीं होता.

 ऐसे में जब छोटी छोटी बातों पर तनाव बढ़ता है, तो बात जल्दी बिगड़ने लगती है. यही वजह है कि बिना पारिवारिक समर्थन के कई बार ऐसे रिश्तों में दरार आने का खतरा काफी बढ़ जाता है.

डिस्क्लेमर: यह लेख पौराणिक ग्रंथों, प्राचीन धार्मिक मान्यताओं और शास्त्र सम्मत जानकारियों पर आधारित है. इसे केवल एक ज्ञानवर्धक और सांस्कृतिक जानकारी के रूप में पढ़ें.

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