गुंडा एक्ट लगाने में एक गलती अब यूपी के अफसरों को पड़ेगी भारी, हाई कोर्ट बोला सैलरी से वसूलेंगे जुर्माना​

गुंडा एक्ट लगाने में एक गलती अब यूपी के अफसरों को पड़ेगी भारी, हाई कोर्ट बोला सैलरी से वसूलेंगे जुर्माना​

उत्तर प्रदेश में गुंडा एक्ट के इस्तेमाल को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अधिकारियों को बेहद कड़ा संदेश दिया है. हाईकोर्ट ने हाल ही में एक केस की सुनवाई के दौरान गाजियाबाद के कमिश्नर समेत इस मामले से जुड़े अधिकारियों पर कुल 50 हजार रुपये का जुर्माना लगाया है. इतना ही नहीं कोर्ट ने साफ कहा है कि अगर अधिकारी इस कानून के तहत बिना ठोस आधार के मनमाने या गैरकानूनी आदेश जारी करते हैं, तो आगे उन्हें अपनी जेब से हर्जाना भी भरना पड़ सकता है.

इलाहाबाद हाईकोर्ट की यह टिप्पणी अभिषेक त्यागी की याचिका पर सुनवाई के दौरान आई. गाजियाबाद कमिश्नरेट के अपर पुलिस आयुक्त ने सितंबर 2025 में त्यागी के खिलाफ उत्तर प्रदेश कंट्रोल ऑफ गुंडाज एक्ट, 1970 के तहत कार्रवाई की थी. अभिषेक को अपने स्थायी पते पर रहने और हर महीने के दूसरे और चौथे शनिवार को संबंधित थाने में हाजिरी लगाने का आदेश दिया गया था. अभिषेक ने इस कार्रवाई को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी.

मामलों का आधार थे कमजोर

कोर्ट ने रिकॉर्ड देखने के बाद पाया कि उनके खिलाफ जिन दो आपराधिक मामलों का आधार लिया गया था, उनके बीच करीब तीन साल का अंतर था. अदालत ने माना कि केवल इन दो मामलों के आधार पर उन्हें आदतन अपराधी नहीं माना जा सकता. मामले की सुनवाई जस्टिस संदीप जैन ने की. कोर्ट ने अभिषेक के खिलाफ गुंडा एक्ट के तहत शुरू की गई पूरी कार्रवाई को रद्द कर दिया और उन्हें हुई परेशानी और मानसिक पीड़ा के लिए मुआवजा देने का आदेश दिया.

हर्जाना लगाने की मिली चेतावनी

हाईकोर्ट ने कहा कि वह अब तक ऐसे मामलों में अधिकारियों पर हर्जाना लगाने से बचता रहा है, लेकिन बारबार चेतावनी के बावजूद अगर इसी तरह के आदेश जारी होते रहे तो कड़ा संदेश देना जरूरी है. कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसे आदेशों से अदालतों में मुकदमों की संख्या बढ़ती है और आम लोगों को परेशानी होती है.

  • दो केस के आधार पर कार्रवाई: त्यागी के खिलाफ दो आपराधिक मामलों को गुंडा एक्ट की कार्रवाई का आधार बनाया गया था.
  • तीन साल का अंतर: दोनों मामलों के बीच करीब तीन साल का अंतर था, जिसे कोर्ट ने आदतन अपराधी साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं माना.
  • 50 हजार रुपये मुआवजा: हाईकोर्ट ने त्यागी को मानसिक पीड़ा और परेशानी के लिए 50 हजार रुपये देने का आदेश दिया.
  • अफसरों की सैलरी से वसूली: कोर्ट ने कहा कि राज्य चाहे तो हर्जाने की रकम संबंधित अधिकारियों की सैलरी से वसूल सकता है.

अभिषेक त्यागी के मामले में हुआ क्या?

अभिषेक त्यागी के खिलाफ गाजियाबाद कमिश्नरेट के अपर पुलिस आयुक्त ने सितंबर 2025 में गुंडा एक्ट के तहत आदेश जारी किया था. आदेश में उन्हें अपने स्थायी पते पर रहने और महीने में दो बार पुलिस स्टेशन में हाजिरी लगाने के लिए कहा गया था. त्यागी ने हाईकोर्ट में दलील दी कि केवल दो मामलों के आधार पर उन्हें ‘गुंडा’ नहीं कहा जा सकता.

दूसरी तरफ राज्य की ओर से उन्हें आदतन अपराधी बताया गया. अदालत ने जब दोनों मामलों का रिकॉर्ड देखा तो पाया कि उनके बीच करीब तीन साल का अंतर था. कोर्ट ने कहा कि इतनी जानकारी के आधार पर किसी व्यक्ति को लगातार अपराध करने वाला यानी आदतन अपराधी नहीं माना जा सकता.

कोर्ट ने इसलिए गुंडा एक्ट के तहत शुरू की गई कार्रवाई को ही रद्द कर दिया. साथ ही कहा कि इस कार्रवाई से अभिषेक को जो मानसिक परेशानी और सामाजिक नुकसान झेलना पड़ा, उसके लिए उन्हें 50 हजार रुपये का मुआवजा दिया जाए. रकम एक महीने के भीतर देने का आदेश दिया गया है.

अफसरों को क्यों दी सख्त चेतावनी?

हाईकोर्ट की नाराजगी सिर्फ इस एक मामले तक सीमित नहीं है. अदालत ने कहा कि वह पहले भी अधिकारियों को बता चुकी है कि केवल एक या दो मामलों के आधार पर किसी व्यक्ति को गुंडा घोषित नहीं किया जा सकता. इसके बावजूद ऐसे आदेश सामने आ रहे हैं. कोर्ट के मुताबिक, इसका सीधा असर आम लोगों पर पड़ता है.

हाईकोर्ट ने कहा कि गलत तरीके से गुंडा घोषित किए जाने से व्यक्ति को मानसिक परेशानी और बदनामी झेलनी पड़ी. इसलिए कोर्ट ने उसे 50 हजार रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया. खास बात यह है कि कोर्ट ने कहा कि यह रकम जिम्मेदार अधिकारियों की सैलरी से वसूली जा सकती है.

कोर्ट ने आदेश में कहा, ‘इस प्रकार के हर्जाने का भुगतान एक महीने के भीतर किया जाए , अन्यथा याचिकाकर्ता कानून के अनुसार इसकी वसूली के लिए कार्यवाही शुरू कर सकता है.’

जाहिद अली केस ने भी उठाया था सवाल

गुंडा एक्ट को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह रुख अचानक सामने नहीं आया है. ये खबर आप क्विक समाचार में पढ़ रहे हैं। इससे कुछ दिन पहले जाहिद अली के मामले में भी कोर्ट ने इसी कानून के इस्तेमाल पर सवाल उठाए थे. जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की बेंच ने गोंडा के जिला मजिस्ट्रेट के उस आदेश को रद्द कर दिया था, जिसमें जाहिद अली को ‘गुंडा’ घोषित कर छह महीने के लिए जिला बदर यानी निश्चित समय के लिए उस जिले से बाहर किया गया था.

कोर्ट ने कहा था कि गुंडा एक्ट का इस्तेमाल सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़े स्पष्ट मामलों में बहुत सावधानी से किया जाना चाहिए. कोर्ट ने पाया कि जाहिद अली के खिलाफ जिन दो मामलों का सहारा लिया गया था, उनमें से एक में वह पहले ही बरी हो चुके थे. दूसरा मामला साल 2020 का था, जबकि उन्हें 2026 में गुंडा घोषित किया गया.

दोनों के बीच करीब छह साल का अंतर था. अदालत ने कहा कि इतने लंबे अंतर के बावजूद यह साबित नहीं होता कि वह आदतन अपराधी हैं. इसके बाद जिला मजिस्ट्रेट और मंडल आयुक्त के आदेशों को रद्द कर दिया गया.

गुंडा एक्ट मामले में कबकब पड़ी फटकार

  • सितंबर 2026 अभिषेक त्यागी मामला, गाजियाबाद
    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गुंडा एक्ट की कार्रवाई रद्द करते हुए 50 हजार रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया. कोर्ट ने कहा कि केवल दो मुकदमों के आधार पर किसी व्यक्ति को आदतन अपराधी मानना पर्याप्त नहीं है.
  • सितंबर 2026 जाहिद अली मामला, गोंडा
    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने छह महीने के जिला बदर आदेश को रद्द किया. कोर्ट ने कहा कि गुंडा एक्ट का इस्तेमाल बहुत सावधानी से और स्पष्ट सार्वजनिक व्यवस्था के मामलों में किया जाना चाहिए. एक मामले में जाहिद अली पहले ही बरी हो चुके थे, फिर भी उसे कार्रवाई के आधार में शामिल किया गया था.
  • अप्रैल 2026 प्रेम कुमार मौर्य मामला, वाराणसी
    हाईकोर्ट में गुंडा एक्ट के तहत दो महीने के जिला बदर आदेश को चुनौती दी गई. इस मामले में प्रशासन ने पांच मुकदमों को आधार बनाया था और अदालत ने एक्ट में आदतन अपराधी की कानूनी परिभाषा पर विचार किया.
  • मई 2026 सुमित शर्मा, गाजियाबाद
    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि सिर्फ दो मामलों में शामिल होने के आधार पर किसी व्यक्ति को गुंडा नहीं माना जा सकता. इस मामले में सुमित को 6 महीने के लिए जिले से बाहर निकलने का आदेश दिया गया था. कोर्ट ने संबंधित आदेश रद्द कर दिए.

गुंडा एक्ट क्या होता है और कब लगता है?

गुंडा एक्ट यानी उत्तर प्रदेश कंट्रोल ऑफ गुंडाज एक्ट, 1970 एक ऐसा कानून है, जिसका इस्तेमाल ऐसे लोगों के खिलाफ किया जाता है जिनकी गतिविधियों से लोगों में डर पैदा हो या सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित होने का खतरा हो. इसके तहत प्रशासन किसी व्यक्ति को जिला बदर यानी एक तय समय के लिए जिले से बाहर करने या कुछ गतिविधियों पर रोक लगाने जैसी कार्रवाई कर सकता है. इसका मूल उद्देश्य ऐसे लोगों की गतविधियों पर कंट्रोल करना है जो बारबार अपराध करते हैं.

दरअसल बाकी कानूनी मामलों में किसी व्यक्ति पर आरोप लगता है और अदालत में मुकदमा चलता है, लेकिन गुंडा एक्ट मुख्य रूप से सीधे कार्रवाई है, जो प्रशासन की ओर से की जाती है. हालांकि, केवल किसी व्यक्ति के खिलाफ FIR या एकदो आपराधिक मामले दर्ज होना अपने आप में उसे ‘गुंडा’ साबित नहीं करता. कार्रवाई के लिए कानून में तय शर्तों और पर्याप्त आधार का होना जरूरी है. हाल के मामलों में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इसी बात पर जोर दिया है.

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