छात्र आंदोलन में पुलिस पीटने वालों का अब पक्का इलाज होगा

छात्र आंदोलन में पुलिस पीटने वालों का अब पक्का इलाज होगा

पिछले 24 घंटे में इन दंगाइयों को लग रहा था कि ये जो चाहे वो आसानी से करवा लेंगे. बिहार, असम और महाराष्ट्र में प्रदर्शनकारियों के खिलाफ केस वापस हुए तो इनका घमंड बढ़ गया. तो ये लोग तुरंत माहौल बनाने लगे कि सरकार इनका अब कुछ नहीं बिगाड़ पाएगी. लेकिन आज इन लोगों के सीने में आग लगी हुई है. इसका कारण यह है कि आज सुप्रीम कोर्ट का एक बहुत बड़ा फैसला आ गया है. आज सुप्रीम कोर्ट में हिंसा के तमाम मामलों को लेकर एक अहम सुनवाई हुई.

छात्र आंदोलन में पुलिस पीटने वालों का अब पक्का इलाज होगा

इस महत्वपूर्ण सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने जो कहा वह उपद्रवियों के लिए बड़ा झटका है. सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि 18 साल से कम उम्र के प्रदर्शनकारियों को छोड़ दिया जाए. लेकिन इसमें भी एक बहुत बड़ी और अहम शर्त जोड़ी गई है. अदालत ने कहा है कि फौरन रिहा सिर्फ उनको किया जाए जिनका कोई क्रिमिनल रिकॉर्ड नहीं है. जिन लोगों पर पहले से कोई भी क्रिमिनल केस दर्ज नहीं है उन पर राहत मिलेगी. उन पर फिलहाल पुलिस की तरफ से कोई बहुत सख्त एक्शन नहीं लिया जाएगा.

लेकिन अदालत ने सबूतों को लेकर बहुत ही कड़ा आदेश दिया है. कोर्ट ने कहा है कि प्रदर्शन से जुड़े सभी सीसीटीवी फुटेज सुरक्षित रखे जाएं. इसके साथ ही ड्रोन फुटेज और सारे डिजिटल सबूत भी सुरक्षित रखने को कहा गया है. पुलिस एक्शन की भी एक पूरी तरह निष्पक्ष जांच की जाएगी. अगर किसी ने जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग किया है तो उसकी जवाबदेही तय की जाएगी. अदालत ने बहुत साफ शब्दों में कहा है कि जिसने भी ज्यादती की है उस पर एक्शन होगा. जिसने भी कानून अपने हाथ में लिया है उनके खिलाफ सख्त एक्शन होना ही चाहिए. अगर किसी भी प्रोटोकॉल का उल्लंघन हुआ है तो कानून को अपना काम जरूर करना चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का मतलब बहुत सीधा और साफ है. सुप्रीम कोर्ट ने सिर्फ और सिर्फ नाबालिगों को फौरन छोड़ने को कहा है. साथ ही यह भी कहा है कि फिलहाल कोई बहुत सख्त कार्रवाई नहीं होगी. इसका सीधा मतलब यह है कि आने वाले समय में आगे कार्रवाई जरूर हो सकती है. लेकिन कॉकरोच पार्टी वाले तो अब देश के सुप्रीम कोर्ट को भी नहीं मान रहे हैं. कॉकरोच पार्टी लगातार कह रही है कि जिन उपद्रवियों पर एफआईआर है उनको भी तुरंत छोड़ा जाए.

सौरभ दास ने एफआईआर पर यही बात कही है जो सुप्रीम कोर्ट की अवमानना जैसी है. सोचिए ये लोग अब सुप्रीम कोर्ट की बात भी मानने को तैयार नहीं हैं. कॉकरोच वाले सरेआम कह रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट का आदेश इन्हें बिल्कुल मंजूर नहीं है. कॉकरोच वाले आज पूरे दिन बोल रहे हैं कि जिन पर एफआईआर है उनको भी छोड़ा जाए. जबकि कल तक यही लोग एक अलग ही सुर में बोल रहे थे. कल तक ये बोल रहे थे कि जिन्होंने हुड़दंग और गुंडई की है उन पर कड़ा एक्शन होना चाहिए.
अब ये लोग रातों रात दूसरी बात करने लगे हैं और अपने बयान से पलट गए हैं. ये लोग ना सुप्रीम कोर्ट को मान रहे हैं और ना ही सरकार को मान रहे हैं. जिन उपद्रवियों को बचाने के लिए कॉकरोच वाले ये सब ड्रामा कर रहे हैं उनकी असलियत जान लीजिए. उन लोगों को पहले तो कॉकरोच वाले कहते थे कि ये बीजेपी और संघ के लोग हैं. कॉकरोच पार्टी के फाउंडर अभिजीत दीपके भी हिंसा पर यही बात कह रहे थे. आप खुद देखिए कि कॉकरोच पार्टी कभी कहती है कि गुंडई करने वाले बीजेपी के लोग थे. और कभी यही पार्टी कहती है कि जिन पर पहले से केस दर्ज हैं उनको भी छोड़ दिया जाए.

कॉकरोच पार्टी की इस दोहरी राजनीति के बीच दिल्ली पुलिस पहले ही एक बड़ा खुलासा कर चुकी है. पुलिस ने बताया है कि इस तथाकथित छात्र प्रोटेस्ट में सैकड़ों अपराधी घुसे हुए थे. ये अपराधी कोई आम छात्र नहीं थे बल्कि पेशेवर क्रिमिनल थे. इन लोगों पर पहले से ही हत्या के संगीन केस चल रहे हैं. इनमें से कई पर रेप और डकैती जैसे खौफनाक मामले दर्ज हैं. कुछ प्रदर्शनकारियों पर पॉक्सो एक्ट के गंभीर मामले भी पहले से दर्ज हैं.

इस प्रोटेस्ट की भीड़ में महिलाओं से छेड़छाड़ के पुराने आरोपी भी शामिल थे. अब आप ही तय कीजिए कि क्या ऐसे खतरनाक लोगों के खिलाफ एक्शन नहीं होना चाहिए. ये खबर आप क्विक समाचार में पढ़ रहे हैं। क्या कॉकरोच पार्टी के कहने पर इन सभी खूंखार अपराधियों को खुला छोड़ देना चाहिए. कॉकरोच पार्टी ऐसा नहीं करने पर फिर से देश में धरना प्रदर्शन की धमकी दे रही है. सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेश को भी कॉकरोच पार्टी वाले मानने को बिल्कुल तैयार नहीं हैं. इसी बीच दिल्ली हाईकोर्ट में भी प्रोटेस्ट से जुड़े कई मामलों पर सुनवाई हुई है.

दिल्ली हाईकोर्ट ने पुलिस की अहम जिम्मेदारियों को लेकर बिल्कुल साफ और कड़ी टिप्पणी की है. कोर्ट में जंतर मंतर पर प्रोटेस्ट के दौरान पुलिस द्वारा एक महिला को थप्पड़ मारने के केस में सुनवाई हुई. इस गंभीर मामले पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने पुलिस को फटकार भी लगाई. कोर्ट ने कहा कि आपको हर हाल में पूरी तरह निष्पक्ष रहना होगा. संस्थानों की साख को इस तरह से कमजोर करना तुरंत बंद कीजिए. अगर उस अधिकारी ने कुछ भी गलत किया है तो उसे उसके परिणाम जरूर भुगतने होंगे.

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि अधिकारी की गलती का मतलब यह नहीं कि पूरा काम वापस ले लिया जाए. क्या आज एक घटना की वजह से पूरी दिल्ली पुलिस कटघरे में खड़ी है. फिर क्या दिल्ली पुलिस अपना काम करना और एफआईआर दर्ज करना भी पूरी तरह बंद कर दे. जंतर मंतर पर हुई भयंकर हिंसा के बाद पुलिस ने कई एफआईआर दर्ज की थीं. इन सारी दर्ज एफआईआर को वापस लेने की एक बहुत लंबी कानूनी प्रक्रिया होती है. ऐसा बिल्कुल नहीं है कि किसी ने मुंह से बोल दिया और एफआईआर रातों रात वापस हो गई या रद्द हो गई.

जंतर मंतर हिंसा और उससे जुड़े अन्य मामलों में करीब बीस केस दर्ज हुए हैं. इनमें से चौदह केस सीधे तौर पर प्रोटेस्ट और उस दौरान हुई हिंसा से जुड़े हुए हैं. एक केस बिना अनुमति के नियम तोड़कर ड्रोन उड़ाने का दर्ज किया गया है. बाकी के सभी केस पत्रकारों ने खुद के साथ हुई मारपीट पर दर्ज कराए हैं. पहले सरकार की तरफ से केस वापस लेने का एक औपचारिक आदेश आएगा. फिर स्टेट यानी अभियोजन की तरफ से दिल्ली पुलिस एलजी को एक पत्र लिखेगी.

इस पत्र में दिल्ली पुलिस आगे कोई कार्रवाई नहीं करने की अपनी बात बताएगी. दिल्ली पुलिस के इस महत्वपूर्ण पत्र पर एलजी का अप्रूवल आएगा. एलजी का अप्रूवल आने के बाद पुलिस संबंधित कोर्ट को इसकी पूरी जानकारी देगी. पुलिस कोर्ट को बताएगी कि हमें इन मामलों में आगे प्रॉसिक्यूट बिल्कुल नहीं करना है. इसके बाद यह पूरी तरह से कोर्ट पर निर्भर करता है कि वो इस पर क्या आदेश दे. दिल्ली पुलिस के दर्ज किए हुए केस वापस हो सकते हैं लेकिन पत्रकारों वाले केस वापस नहीं होंगे.

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