छोटे कद के लाल बहादुर शास्त्री ने कैसे अपने बड़ेबड़े फैसलों से चौंकाया?​

छोटे कद के लाल बहादुर शास्त्री ने कैसे अपने बड़ेबड़े फैसलों से चौंकाया?​

Lal Bahadur Shastri Jayanti: छोटे कद के लाल बहादुर शास्त्री ने अपने राजनीतिकसार्वजनिक जीवन में सादगी और नैतिकता के साथ ही प्रशासनिक दृढ़ता की बड़ी लकीरें खींचीं. एक मंत्री के तौर पर या फिर प्रधानमंत्री पद के महज उन्नीस महीने के कार्यकाल वे ऐसा कुछ कर सके, जो कई मायनों में नेताओं की अगली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा के साथ चुनौती का विषय भी बन गया. संयोग से उनके और गांधी के जन्मदिन की एक ही तारीख दो अक्तूबर है. गांधी के आह्वान पर वे आजादी की लड़ाई में शामिल हुए. फिर सारा जीवन गांधी की सोचसीख को आचरण में उतारते रहे.

उनकी आर्थिक पृष्ठभूमि बहुत कमजोर थी. अभावों बीच पलेबढ़े और पढ़े. आजाद भारत में राज्य से केंद्र तक के मंत्री या फिर प्रधानमंत्री की कुर्सी पर पहुंचने के बाद भी उनकी माली हालत बेहद मामूली रही. बहुत कम खर्च में उन्होंने जीना सीखा. परिवार और देश को भी यही सिखाने की कोशिश की. उनके जन्मदिन के अवसर पर पढ़िए उनके राजनीतिक जीवन से जुड़े कुछ प्रसंग.

किसी ने मांगा नहीं फिर भी दिया मंत्री पद से इस्तीफा

1956 में महबूबनगर और उसके बाद अरियालूर में हुई रेल दुर्घटनाओं ने रेल मंत्री लाल बहादुर शास्त्री को काफी विचलित किया. अरियालूर की दुर्घटना में बड़ी संख्या में लोगों की जान गई थी. शास्त्री ने दुर्घटना की व्यक्तिगत जिम्मेदारी ली. हालांकि उनके इस्तीफे की कोई मांग नहीं थी. लेकिन नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए उन्होंने मंत्रिपद से इस्तीफा दे दिया. प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू उनके इस्तीफे के पक्ष में नहीं थे.

पंडित नेहरू.

उनके कहने के बाद भी शास्त्री अपने निर्णय पर अटल रहे. उनका तर्क था कि मंत्री हर गलती का व्यक्तिगत दोषी भले न हो, लेकिन मंत्रालय की बड़ी विफलता की राजनीतिक और नैतिक जिम्मेदारी उससे अलग नहीं की जा सकती. शास्त्री का यह इस्तीफा नेताओं की अगली पीढ़ियों के लिए मिसाल और चुनौती दोनों बन गए. असलियत में शास्त्री के लिए सत्ता का मतलब अधिकार नहीं बल्कि उत्तरदायित्व था. उनका इस्तीफा किसी राजनीतिक दबाव का बल्कि उनके नैतिक आग्रह का परिणाम था.

किसी की कठपुतली बनना स्वीकार नहीं

कामराज योजना में नेहरू मंत्रिमंडल के जिन मंत्रियों के इस्तीफे हुए थे, उनमें शास्त्री भी शामिल थे. बाद में बिना विभाग के मंत्री के तौर पर उनकी कैबिनेट में वापसी हुई. नेहरू के समय में यह सवाल पूछा जाता था कि नेहरू के बाद कौन? प्रख्यात पत्रकार कुलदीप नैयर ने एक बार यही सवाल शास्त्री से पूछा था. शास्त्री का जवाब था कि नेहरू के मन में इंदिरा हैं. लेकिन 27 मई 1964 को पंडित नेहरू की मृत्यु के बाद के राजनीतिक घटनाक्रम में तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष के.कामराज की अगुवाई वाले सशक्त धड़े ने मोरारजी देसाई की दावेदारी को किनारे करते हुए शास्त्री का नाम आगे किया और 9 जून 1964 को वे प्रधानमंत्री की कुर्सी पर आसीन हुए.

लाल बहादुर शास्त्री.

जिन लोगों ने उन्हें इस पद पर पहुंचने में सहायता दी थी, उन्हें शास्त्री की कार्यप्रणाली से जल्दी ही संदेश मिल गया कि उन्हें किसी की कठपुतली बनना स्वीकार नहीं है. अपनी कैबिनेट के मंत्री और उनके विभाग तय करने में उन्होंने किसी विचारविमर्श की जरूरत नहीं समझी. विदेश मंत्री के लिए मुहम्मद करीम छागला के नाम को उन्होंने इसलिए नहीं स्वीकार किया कि मुस्लिम होने के नाते वे पाकिस्तान के प्रति अधिक आक्रामक होने का प्रयास कर सकते हैं.

अनुभवी सरदार स्वर्ण सिंह को उन्होंने विदेश विभाग सौंपा. शास्त्री को इंदिरा गांधी की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं का अहसास था, इसलिए उन्हें अपेक्षाकृत कम महत्व के सूचना प्रसारण मंत्रालय का भार देकर बदली राजनीतिक परिस्थितियों का संदेश दिया.

अमेरिकी धमकी को किया नजरअंदाज

1965 में शास्त्री के प्रधानमंत्री पद की जिम्मेदारी संभालते समय चीन के हाथों 1962 की देश की पराजय के सिर्फ तीन साल गुजरे थे. सीमाओं पर बढ़ते खतरों के बीच अमेरिका का पाकिस्तान परस्त रुख संकट को और बढ़ा रहा था. अमेरिकी राजदूत चेस्टर बाउल्स के जरिए राष्ट्रपति लिंडन जॉनसन ने शास्त्री को अमेरिका आने का न्योता दिया था. लेकिन वे कोई उत्तर दे सकें , इसके पहले ही जॉनसन ने निमंत्रण वापस ले लिया.

माना जाता है कि पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल अयूब के दबाव में जॉनसन ने यह फैसला किया. बाद में कनाडा जाते समय जॉनसन ने उनसे वाशिंगटन में रुकने का आग्रह किया. शास्त्री ने इसे सख्ती से ठुकरा दिया. यहीं तक नहीं बल्कि शास्त्री ने अमेरिका की जगह उसके विरोधी सोवियत संघ की यात्रा की. भारत पर दबाव बनाने के लिए अमेरिका ने गेहूं की आपूर्ति रोकने की धमकी दी. उस समय देश गहरे खाद्यान्न संकट का सामना कर रहा था. शास्त्री ने झुकने से इनकार किया और अमेरिकी धमकी के जवाब के लिए देश को नए तरीके से खड़ा किया.

लाल बहादुर शास्त्री सच्चे अर्थों में गांधी के अनुयायी थे.

पहले खुद उपवास, फिर जनता से अपील

शास्त्री ने वियतनाम पर अमेरिका के हमले को गलत बता कर राष्ट्रपति जॉनसन को कड़ा संदेश दिया. शास्त्री सच्चे अर्थों में गांधी के अनुयायी थे. दूसरों को सीख देने के पहले वे उसे आचरण में उतारते थे. उन्होंने खाद्यान्न संकट का मुकाबला करने के लिए जनता से सप्ताह में एक दिन उपवास की अपील की. लेकिन अपील करने से पहले इसे अपने घरपरिवार में अमल की नजीर पेश की. शास्त्री का पूरा जीवन और उनकी ईमानदारी बेमिसाल थी. जनता में उनके प्रति अगाध विश्वास था. उनका नैतिक आभामंडल प्रखर था.

शास्त्री की इस अपील का जादुई असर हुआ और परिवारों के बच्चेबूढ़े भी उपवास में शामिल हो गए. रेस्टोरेंट होटल मालिकों ने भी कमाई का लाभ त्याग कर हफ्ते की एक शाम अपने व्यवसाय स्थल बंद रखना शुरू कर दिया. शास्त्री के कड़े रुख ने अमेरिका का रुख बदला. दिसंबर 1965 में अमेरिका ने फिर 15 लाख टन गेहूं की आपूर्ति और उर्वरक के लिए 5 करोड़ डॉलर के ऋण की घोषणा की. लेकिन शास्त्री को पता था कि यह संकट का स्थायी हल नहीं है. सीमाओं की सुरक्षा के लिए देश की सामरिक क्षमता को बढ़ाना जरूरी था.

आर्थिक आत्मनिर्भरता के लिए खाद्यान्न उत्पादन में वृद्धि जरूरी थी. शास्त्री ने जय जवान जय किसान का नारा दिया. पाकिस्तान से युद्ध के लिए धन की जरूरत थी. उनकी अपील पर लोग उमड़ पड़े. खाद्यान्न में आत्मनिर्भरता की दृष्टि से हरित क्रांति और दुग्ध उत्पादन के लिए श्वेत क्रांति की शास्त्री ने ठोस पहल की. भले थोड़ा वक्त था. लेकिन हर क्षण का उन्होंने देश की भलाई के लिए उपयोग किया.

कड़े फैसलों ने चौंकाया

नेहरू के विराट कद के आगे शास्त्री कहीं नहीं टिकते थे. जाहिर है कि उनके प्रधानमंत्री की शपथ लेने के बाद राजनीति के जानकार उनसे बड़े और कड़े फैसलों की उम्मीद नहीं करते थे. लेकिन शास्त्री ने विपक्षियों से ज्यादा सत्ता दल के सहयोगियों को चौंकाया. पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रताप सिंह कैरो उन दिग्गजों में थे , जिनसे केंद्र टकराव नहीं चाहता था. एस.आर.दास आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कैरो को आर्थिक अनियमितताओं और पद के दुरुपयोग का दोषी ठहराया था. शास्त्री ने कैरो को इस्तीफा देने का संदेश दिया. कैरो हीला हवाली करते रहे. लेकिन शास्त्री के कड़े रुख ने उन्हें इस्तीफा देने के लिए मजबूर कर दिया.

वित्त मंत्री टी. टी. कृष्णामचारी को भी इसी लिए अपनी कुर्सी गंवानी पड़ी. वे चीफ जस्टिस के निर्देश के बाद भी अपने विरुद्ध लगे जांच कराने को तैयार नहीं थे. शास्त्री की पहल पर सुप्रीम कोर्ट के जज एच.आर.खन्ना की एक जांच रिपोर्ट उड़ीसा के तत्कालीन मुख्यमंत्री बिरेन मिश्र और पूर्व मुख्यमंत्री बीजू पटनायक के खिलाफ मुकदमे की की वजह बनी. भ्रष्टाचार पर अंकुश शास्त्री की प्राथमिकताओं में शामिल था. वरिष्ठ कांग्रेस नेता के. संथनम की अगुवाई में उन्होंने इस सवाल पर कमेटी बनाई. गृह मंत्रालय के स्पेशल पुलिस इस्टेबलिशमेंट को उन्होंने सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन में बदला.

पाकिस्तान के मंसूबों पर पानी फेरा

1962 में भारत की पराजय ने पाकिस्तान के हौसले और बढ़ा दिए थे. अमेरिका का हाथ उसके सिर पर था और अब वह चीन से उम्मीद लगाए हुए था. पाकिस्तान ने 1 सितम्बर को कश्मीर के अखनूरजम्मू सेक्टर में युद्ध विराम सीमा का उल्लंघन करके भारत हमला बोल दिया था. 3 सितम्बर को शास्त्रीजी ने सेना को पंजाब में अंतर्राष्ट्रीय सीमा लांघकर पाकिस्तान कूच करने का आदेश दे दिया. ये खबर आप क्विक समाचार में पढ़ रहे हैं। उन्होंने जनरल जे एन चौधरी से कहा कि इससे पहले कि वे कश्मीर पहुंचे, मैं लाहौर पहुंच जाना चाहता हूं. सच तो यह है कि चीन के हाथों पराजय के सबक से भारत ने काफी सीखा था. कच्छ के रण में पाकिस्तान की सैन्य गतिविधियों के बाद से ही भारत की सेना युद्ध के लिए तैयार थी. पाकिस्तान पर हमले का कोड “ऑपरेशन रिडल” रखा गया.

भारतीय सेना ने कश्मीर के मोर्चे पर दबाव कम करने के लिए 6 सितंबर को अमृतसर, फिरोजपुर और गुरुदासपुर से तीन तरफा हमला किया. दो दिन बाद ही स्यालकोट का भी मोर्चा खोल दिया गया. भारी पैमाने पर अमेरिकी पैटन टैंकों और अन्य हथियारों को ध्वस्त करके भारतीय सेना ने पाकिस्तानी हुक्मरानों के मंसूबों पर पानी फेर दिया. 23 सितंबर 1965 को भारतपाकिस्तान ने युद्ध विराम की घोषणा कर दी.

अमेरिकासोवियत संघ का दोहरा दबाव

1965 की जीत ने 1962 की हार पर मरहम लगाया. शास्त्री का कद देश ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय जगत में भी बड़ा हुआ. लेकिन इसी के साथ भारत पर दबाव बढ़ना शुरू हुआ. 20 सितम्बर 1965 को सुरक्षा परिषद ने प्रस्ताव पास किया कि भारत और पाकिस्तान की सेनाएं 5 अगस्त 1965 के पहले की स्थिति में वापस जाएं. इसे लागू कराने के एकदूसरे के विरोधी अमेरिका और सोवियत संघ दोनो साथ हो गए. दबाव में ताशकंद वार्ता में शास्त्री शामिल हुए.

10 जनवरी 1966 के ताशकंद समझौते में यह सहमति हुई कि दोनों देश 25 फरवरी 1966 तक 5 अगस्त 1965 से पहले की स्थिति में आ जायेंगे और युद्ध विराम रेखा पर युद्ध विराम की शर्तों का पालन करेंगे. युद्ध की जीत समझौते की मेज पर हार में बदल चुकी थी. देश में संभावित विपरीत प्रतिक्रिया को लेकर शास्त्री बेचैन थे. उस रात 1.20 पर वे सेवक जगन्नाथ के कमरे के दरवाजे तक पहुंचे. बड़ी मुश्किल से डॉक्टर के लिए पूछ सके. जगन्नाथ और सहयोगियों ने बिस्तर तक पहुंचाया. फौरन ही डॉक्टर चुग पहुंच गए. इंजेक्शन बेअसर रहे. कुछ शेष नहीं था. सांसें थम चुकीं थीं.

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