फिरोज गांधी को सिर्फ नेहरू के दामाद या इंदिरा गांधी के पति के रूप में याद करना उनके राजनीतिक व्यक्तित्व को छोटा कर देना है. वे उस दौर के उन विरले सांसदों में थे जिन्होंने अपने पद को परिवार की प्रतिष्ठा से नहीं, जनता के प्रति जवाबदेही से परिभाषित किया. लोकसभा में उनकी सीट पिछली कतारों में थी. लेकिन उनकी नज़र लोकतंत्र के प्रति जवाबदेही के हर पहलू पर थी. वे सत्ता दल के सांसद थे.

ससुर सरकार के मुखिया और पत्नी पार्टी अध्यक्ष थीं . लेकिन सरकार या पार्टी के फैसलों से असहमति की स्थिति में इन रिश्तों की दीवारें फिरोज गांधी को एक जनप्रतिनिधि के दायित्व से विरत नहीं कर पाईं. जन्मदिन के मौके पर याद करते हैं फिरोज गांधी की, जो नेहरू जैसे वटवृक्ष के नीचे भी अपनी स्वतंत्र पहचान विकसित करने में सफल रहे.
सरकार हमारी, सवाल जनता का है
फिरोज गांधी 1952 में पहली लोकसभा के लिए रायबरेली से सांसद चुने गए. उन्हें सरकार में कोई जिम्मेदारी नहीं मिली थी. प्रधानमंत्री के दामाद और इंदिरा गांधी के पति के नाते उम्मीद की जाती थी कि उनकी भूमिका सरकार के फैसलों के समर्थन तक सीमित रहेगी. लोकसभा की पिछली कतारों में उनकी सीट थी. लेकिन सत्ता दल से जुड़े होने के बाद भी जल्द ही सरकार के फैसलों से नाइत्तफाकी की स्थिति में उनके असहमति के स्वर मुखर हुए. ऐसा सदन जहां औपचारिक विपक्ष की संख्या नगण्य थी. संख्याबल से सत्तापक्ष बेहद मजबूत स्थिति में था.
फिरोज गांधी.
सरकार का नेतृत्व कर रहे पंडित नेहरू का आभामंडल विराट था. ऐसे सदन में अपनी ही सरकार से असहज करने वाले सवाल पूछना आसान नहीं था. लेकिन फिरोज गांधी ने सदन से सड़क तक लोगों को चौंकाया. नेहरू परिवार से रिश्ते ने फिरोज गांधी को मशहूर किया. लेकिन ये रिश्ते उनकी इकलौती पूंजी नहीं थी. एक ऐसे प्रखर सांसद के तौर पर उन्होंने स्वयं को स्थापित किया जो मानता था कि सरकार किसी भी दल की हो सकती है, लेकिन जनता के पैसे का हिसाब मांगना सांसद का अधिकार ही नहीं, कर्तव्य भी है.
जनता को प्रतिनिधियों का काम जानने का अधिकार
आज संसद की कार्यवाही का सीधा प्रसारण होता है. लेकिन आजादी के शुरुआती वर्षों में दौर में संसद की कार्यवाही की स्वतंत्र रिपोर्टिंग की इजाजत नहीं थी. संसद कवर करने वाले पत्रकारों/संपादकों सिर पर हमेशा विशेषाधिकार हनन और मानहानि कानूनों की तलवार लटकती रहती थी. फिरोज गांधी ने इस सवाल को संसद के भीतर उठाया.1956 में उन्होंने Proceedings of Legislatures Bill नाम से निजी सदस्य विधेयक पेश किया. बाद में इसका नाम बदलकर Proceedings of Parliament Bill हुआ.
विधेयक लोकसभा से पारित हुआ, राज्यसभा ने भी इसे मंजूरी दी और 26 मई 1956 को यह Parliamentary Proceedings Act, 1956 बना. राज्यसभा के आधिकारिक दस्तावेज में भी इस कानून का श्रेय विधेयक के मूल प्रस्तावक फिरोज गांधी को दिया गया है. फिरोज गांधी ने दो टूक कहा था कि
संसद जनता की है. सांसद जनता के प्रतिनिधि हैं. जनता को यह जानने का अधिकार है कि उसके प्रतिनिधि सदन में क्या कर रहे और क्या कह रहे हैं? सचेत किया था कि लोकतंत्र में जनता को उसके प्रतिनिधियों के कामकाज से दूर नहीं रखा जा सकता.
26 मार्च 1942 को इंदिरा और फिरोज गांधी शादी के बंधन में बंधे.
हर आरोप सबूतों के साथ
फिरोज गांधी की संसदीय सक्रियता केवल भाषणों तक सीमित नहीं थी. वित्तीय मामलों पर उनकी गजब की पकड़ थी. ये खबर आप क्विक समाचार में पढ़ रहे हैं। 1955 में उन्होंने निजी बीमा कंपनियों के कामकाज और उनके वित्तीय व्यवहार पर गंभीर सवाल उठाए. 6 दिसंबर 1955 की लोकसभा में बहस में भारत इंश्योरेंस कंपनी सहित बीमा कारोबार से जुड़े वित्तीय लेनदेन के घपलों पर उन्होंने सवाल खड़े किए. प्रमुख उद्योगपति रामकृष्ण डालमिया पर लगे आरोपों ने इस बहस को और सरगर्म किया. बीमा कंपनियों के धन के दुरुपयोग और व्यावसायिक हितों के लिए उसके इस्तेमाल के सबूतों ने सरकार को कार्रवाई के लिए बाध्य कर दिया.
इस मामले में डालमिया को दो साल की सजा हुई. इसी दौर में निजी बीमा क्षेत्र की कार्यप्रणाली और पॉलिसीधारकों के हितों पर राष्ट्रीय बहस तेज हुई. इसके तुरंत बाद 19 जनवरी 1956 को जीवन बीमा का राष्ट्रीयकरण किया गया. सरकार ने पहले अध्यादेश के माध्यम से प्रबंधन अपने हाथ में लिया और बाद में Life Insurance Corporation Act, 1956 के जरिए LIC की स्थापना का रास्ता साफ हुआ. LIC 1 सितंबर 1956 को अस्तित्व में आई. उसी समय 154 भारतीय, 16 गैरभारतीय बीमा कंपनियां और 75 प्रोविडेंट सोसाइटी भी राष्ट्रीयकृत की गईं.
इंदिरा और फिरोज गांधी.
अपनी ही सरकार को सवालों से घेरा
हरिदास मूंदड़ा कांड की गूंज ने फिरोज गांधी को दूर तक चर्चित किया.16 दिसंबर 1957 को लोकसभा में उन्होंने जीवन बीमा निगम द्वारा हरिदास मूंदड़ा से जुड़ी कंपनियों में लगभग 1.26 करोड़ रुपये के निवेश का मुद्दा उठाया. यह वह समय था जब निगम को बने बहुत दिन नहीं बीते थे. फिरोज गांधी ने सिर्फ सनसनी पैदा करने के लिए आरोप नहीं लगाए थे. उन्होंने शेयरों की कीमतों, बाजार की गतिविधियों और एलआईसी के निवेश के तरीकों का गहन अध्ययन किया था.
वे कांग्रेस के सांसद थे और उस सरकार को उन्होंने कठघरे में खड़ा कर दिया जिसके मुखिया उनके ससुर जवाहरलाल नेहरू थे. सबूतों के साथ आरोप लगाया कि सार्वजनिक धन से जुड़ी संस्था को ऐसे निवेश के लिए इस्तेमाल किया गया, जिससे मूंदड़ा की वित्तीय कठिनाइयों को राहत मिल सकती थी.
मामला इतना गंभीर हुआ कि सरकार को जांच के लिए न्यायमूर्ति एम.सी. छागला आयोग गठित करना पड़ा. आयोग की जांच ने तत्कालीन वित्त मंत्री टी.टी. कृष्णामाचारी की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े किए और अंतत उन्हें इस्तीफा देना पड़ा. हरिदास मूंदड़ा को भी जेल जाना पड़ा और दोष सिद्ध होने पर सजा हुई.
नंबूदरीपाद सरकार की बर्खास्तगी का किया विरोध
फिरोज गांधी यहीं नहीं थमे. आगे उन्होंने अपनी पत्नी इंदिरा गांधी की कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर केरल की नंबूदरीपाद सरकार की बर्खास्तगी पर सवाल खड़े करके घर के भीतर से बाहर तक हलचल मचा दी थी. 1957 में ई. एम. एस. नंबूदरीपाद के नेतृत्व में भारत की पहली निर्वाचित कम्युनिस्ट सरकार केरल में बनी. यह केवल केरल की राजनीति की घटना नहीं थी. पूरी दुनिया के लिए यह महत्वपूर्ण था क्योंकि पहली बार कम्युनिस्ट पार्टी ने क्रांति के रास्ते के बजाय चुनाव जीतकर सत्ता हासिल की थी.
नंबूदरीपाद सरकार ने भूमि सुधार और शिक्षा संबंधी सुधार शुरू किए. खासकर एजुकेशन बिल को लेकर चर्च, कुछ ईसाई संस्थान, मुस्लिम लीग और नायर सर्विस सोसायटी सहित प्रभावशाली समूहों में भारी असंतोष पैदा हुआ. धीरेधीरे यह आंदोलन लिब्रेशन स्ट्रगल में बदल गया. उन दिनों इंदिरा गांधी कांग्रेस अध्यक्ष थीं. उन्होंने नंबूदरीपाद सरकार के खिलाफ आंदोलन को राजनीतिक समर्थन दिया और जवाहरलाल नेहरू पर सरकार को बर्खास्त करने के लिए दबाव बढ़ाया. निर्वाचित सरकार को बर्खास्त करने में नेहरू हिचक रहे थे लेकिन आंदोलन और इंदिरा गांधी के बढ़ते दबाव के बीच 31 जुलाई 1959 को केंद्र ने नंबूदरीपाद सरकार को को बर्खास्त कर राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया.
इंदिरा गांधी. फोटो: Getty Images
इंदिरा को कह दिया फासिस्ट
आजादी के बाद राज्य की किसी सरकार की बर्खास्तगी का यह पहला मौका था. विपक्ष केंद्र पर हमलावर था. इसी मसले में फिरोज गांधी के विरोध ने नेहरू और इंदिरा को और परेशान किया. फिरोज और इंदिरा की डाइनिंग टेबल पर हुई झड़प सार्वजनिक विमर्श में आकर इतिहास का हिस्सा बन गई.
फिरोज के जीवनीकार स्वीडिश पत्रकार बर्टिल फॉक ने अपनी किताब Feroze: The Forgotten Gandhi में इसका उल्लेख किया. बर्टिल फॉक ने अपने स्रोत के रूप में वरिष्ठ पत्रकार जनार्दन ठाकुर का हवाला दिया है. ठाकुर के अनुसार एक सुबह तीन मूर्ति भवन में नाश्ते की मेज पर केरल का मुद्दा उठा. जवाहरलाल नेहरू भी वहीं थे. फिरोज ने इंदिरा से तीखे शब्दों में कहा, यह बिल्कुल सही नहीं है. तुम लोगों को धमका रही हो.दबा रही हो. तुम फासीवादी हो.
यह सुनकर इंदिरा भड़क उठीं. प्रतिवाद किया कि तुम मुझे फासिस्ट कह रही हो और और गुस्से में वहां से चली गईं. पंडित नेहरू यह सब देख सुन परेशान हुए थे. यह सिर्फ पतिपत्नी का झगड़ा नहीं था. इसके पीछे लोकतंत्र और सत्ता के इस्तेमाल को लेकर दो बिल्कुल अलग राजनीतिक दृष्टिकोण आमनेनाश्ते की मेज वाला विवाद आखिरी टकराव नहीं था.
वैयक्तिक नहीं, विचारों का टकराव
यह तकरार डाइनिंग टेबल तक नहीं थमी. फिरोज ने पार्टी के भीतर और सार्वजनिक रूप से भी केरल के मामले में केंद्र के फैसले से अपनी असहमति व्यक्त की. उन्होंने सवाल उठाया कि कांग्रेस आखिर किन ताकतों के साथ खड़ी हो रही है और क्या वह जातीय तथा सांप्रदायिक शक्तियों के सहारे एक निर्वाचित सरकार को गिराएगी? फॉक के अनुसार, एक पार्टी की एक बैठक में फिरोज ने चुनौती के अंदाज में कहा कि कांग्रेस के वसूलों का क्या हुआ? कांग्रेस के चर्च, मुस्लिम लीग और जातीय संगठनों के साथ खड़े होने पर फिरोज ने सवाल उठाया. 21 जुलाई 1959 को इंदिरा ने अपनी मित्र डार्थी नॉर्मन को लिखा कि उनके सामने समस्याओं का एक समुद्र है. घरेलू मोर्चे पर उन्होंने फिरोज के बारे में लिखा कि वे मेरा हमेशा विरोध करते हैं. मेरे कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद फिरोज की शत्रुता इतनी बढ़ गई है कि वह वातावरण को विषाक्त कर रही है. उन्होंने यह भी लिखा कि फिरोज और उनके मित्र कुछ मंत्रियों के संपर्क में हैं और इससे स्थिति और कठिन हो रही है.