भारत का काल ड्रोन इन दिनों चर्चा में है. इसका निर्माण निजी क्षेत्र की कंपनी ने किया है. यह एक हजार किलो मीटर तक जाकर हमला करने में सक्षम है. दो क्विंटल तक पेलोड लेकर सातआठ घंटे तक उड़ने में सक्षम है. अभी यह भारतीय सेना में शामिल तो नहीं किया गया है लेकिन रक्षा क्षेत्र में इसकी चर्चा जोरों से हो रही है. असल में आधुनिक युद्ध तेजी से बदल रहा है. अब लड़ाई केवल टैंक, तोप, लड़ाकू विमान और मिसाइलों से नहीं लड़ी जा रही. ड्रोन भी युद्ध का बड़ा हथियार बन चुके हैं. ये दुश्मन की निगरानी करते हैं. तस्वीरें भेजते हैं. मिसाइल दागते हैं. कई ड्रोन सीधे लक्ष्य से टकराकर विस्फोट भी करते हैं. ऐसे ड्रोन को वनवे अटैक ड्रोन कहा जाता है.

आइए, इसी बहाने समझते हैं कि दुनिया के सबसे पावरफुल ड्रोन किन देशों के पास हैं? ये किस तरह से खास हैं? भारत का नया ड्रोन ‘काल’ कैसे हजारों किलो मीटर दूर बैठे दुश्मन को तबाह करेगा?
ड्रोन युद्ध क्यों बन गया है अहम?
ड्रोन युद्ध को सस्ता, तेज और जोखिम कम करने वाला विकल्प बनाते हैं. किसी लड़ाकू विमान को भेजने में बहुत अधिक खर्च होता है. उसमें प्रशिक्षित पायलट की जान भी दांव पर होती है. इसके मुकाबले ड्रोन बहुत कम लागत में भेजे जा सकते हैं. ड्रोन दुश्मन के ऊपर लंबे समय तक मंडरा सकता है. वह लक्ष्य खोज सकता है. कमांड सेंटर को लाइव वीडियो भेज सकता है. सही समय मिलने पर हमला कर सकता है. इससे लक्ष्य पर सटीक वार की संभावना बढ़ती है. यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया के संघर्षों ने यह साबित किया है कि सस्ते ड्रोन भी महंगे हथियारों को नुकसान पहुंचा सकते हैं. रडार, गोलाबारूद डिपो, तेल भंडार, कमांड पोस्ट और सैन्य वाहनों को ड्रोन से निशाना बनाया गया है.
अमेरिका: सबसे हाइटेक ड्रोन पावर
अमेरिका को सैन्य ड्रोन तकनीक में सबसे मजबूत देशों में गिना जाता है. उसके पास निगरानी, हमला, समुद्री गश्त और खुफिया मिशनों के लिए कई उन्नत ड्रोन हैं. अमेरिकी ड्रोन की बड़ी ताकत उनकी सेंसर क्षमता है. वे हाईरिजॉल्यूशन कैमरे, थर्मल सेंसर, रडार और सुरक्षित डेटा लिंक का इस्तेमाल करते हैं. वे लंबी दूरी तक उड़ सकते हैं.
दुनिया का सबसे पावरफुल ड्रोन फिलहाल अमेरिका के पास है, इसका नाम है MQ9 रीपर.
कई ड्रोन उपग्रह संचार से संचालित होते हैं. इससे ऑपरेटर हजारों किलोमीटर दूर बैठकर भी मिशन नियंत्रित कर सकते हैं. अमेरिका की ताकत केवल एक ड्रोन में नहीं है. उसके पास उपग्रह, लड़ाकू विमान, मिसाइल, जासूसी नेटवर्क और नौसैनिक प्लेटफॉर्म का बड़ा नेटवर्क है. यही नेटवर्क उसके ड्रोन को ज्यादा प्रभावी बनाता है.
चीन: तेजी से बढ़ती ड्रोन महाशक्ति
चीन ने पिछले कुछ वर्षों में ड्रोन निर्माण में तेज प्रगति की है. उसके पास छोटे निगरानी ड्रोन से लेकर बड़े सशस्त्र ड्रोन तक कई विकल्प हैं. चीन ड्रोन का निर्यात भी करता है. इसलिए उसकी तकनीक कई देशों तक पहुंची है. चीन के बड़े ड्रोन लंबी उड़ान, निगरानी और हथियार ले जाने की क्षमता रखते हैं. चीन का फोकस स्वार्म ड्रोन तकनीक पर भी है. इसका मतलब है कि कई ड्रोन एक साथ मिलकर मिशन कर सकते हैं. स्वार्म हमला एयर डिफेंस के लिए बड़ी चुनौती है. यदि एक साथ बहुत से ड्रोन अलगअलग दिशाओं से आएं, तो उन्हें रोकना कठिन हो जाता है. हर ड्रोन पर महंगी मिसाइल खर्च करना भी व्यावहारिक नहीं होता.
चाइनीज ड्रोन.
तुर्की: युद्ध क्षेत्र में साबित हुई ताकत
तुर्किये ने ड्रोन क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई है. उसके सशस्त्र ड्रोन कई संघर्षों में इस्तेमाल हुए हैं. इससे तुर्की का ड्रोन उद्योग दुनिया भर में चर्चा में आया. तुर्की की खासियत यह है कि उसने अपेक्षाकृत कम लागत वाले और उपयोगी सशस्त्र ड्रोन विकसित किए. ये निगरानी कर सकते हैं. लक्ष्य पहचान सकते हैं. और जरूरत पड़ने पर सटीक हथियारों से हमला कर सकते हैं. तुर्की ने ड्रोन को केवल हवाई मंच नहीं माना. उसने उन्हें तोपखाने, जमीनी सैनिकों और खुफिया तंत्र से जोड़ा. यही आधुनिक युद्ध की असली जरूरत है. केवल ड्रोन होना पर्याप्त नहीं है. उसका डेटा तुरंत सही इकाई तक पहुंचना भी जरूरी है.
इजराइल: निगरानी और सटीक वार का विशेषज्ञ
इजराइल लंबे समय से ड्रोन तकनीक में अग्रणी माना जाता है. उसके ड्रोन निगरानी, सीमा सुरक्षा, खुफिया जानकारी और सटीक हमलों के लिए जाने जाते हैं. इजरायल की ताकत उसके सेंसर, कैमरे, इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम और लक्ष्य पहचान तकनीक में है. उसके कई ड्रोन लंबे समय तक हवा में रह सकते हैं. वे छोटे लक्ष्यों पर भी नजर रख सकते हैं. लॉयटरिंग म्यूनिशन के क्षेत्र में भी इजरायल का अनुभव बड़ा है. ऐसे हथियार लक्ष्य क्षेत्र के ऊपर घूमते रहते हैं. लक्ष्य मिलने पर वे खुद ही उस पर हमला करते हैं. भारत ने भी इजरायली मूल के कुछ ड्रोन सिस्टम का उपयोग किया है.
ईरानी ड्रोन. फोटो क्रेडिट Getty Images.
ईरान: कम लागत वाले हमलावर ड्रोन की चुनौती
ईरान के शाहेद श्रेणी के ड्रोन ने दुनिया का ध्यान खींचा है. इनकी चर्चा लंबी दूरी और अपेक्षाकृत कम लागत के कारण हुई. इन ड्रोन की रणनीति अलग है. ये बहुत महंगे और अत्यंत जटिल प्लेटफॉर्म नहीं होते. लेकिन इन्हें बड़ी संख्या में भेजा जा सकता है. इससे दुश्मन का एयर डिफेंस दबाव में आ सकता है. यदि एक सस्ते ड्रोन को रोकने के लिए बहुत महंगी इंटरसेप्टर मिसाइल चलानी पड़े, तो यह आर्थिक चुनौती बन जाती है. इसी कारण वनवे अटैक ड्रोन आधुनिक युद्ध में महत्वपूर्ण हो गए हैं.
रूस और यूक्रेन: ड्रोन युद्ध की नई प्रयोगशाला
रूसयूक्रेन युद्ध ने ड्रोन के उपयोग को पूरी तरह बदल दिया है. यहां छोटे एफपीवी ड्रोन से लेकर लंबी दूरी वाले हमलावर ड्रोन तक बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हुए हैं. एफपीवी ड्रोन छोटे होते हैं. इन्हें ऑपरेटर कैमरे के जरिए नियंत्रित करता है. ये टैंक, बंकर, वाहन और सैनिक ठिकानों तक पहुंच सकते हैं. इनकी लागत कम होती है. लेकिन इनका असर बड़ा हो सकता है. इस युद्ध से एक बात साफ हुई है. अब ड्रोन केवल निगरानी का साधन नहीं हैं. वे युद्ध की गति बदल सकते हैं. वे लगातार निगरानी, लक्ष्य पहचान, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध और हमले का काम कर सकते हैं.
काल ड्रोन.
भारत का काल ड्रोन क्या है?
काल एक स्वदेशी लंबी दूरी वाला वनवे अटैक ड्रोन है. इसका उद्देश्य दुश्मन के क्षेत्र में गहराई तक जाकर महत्वपूर्ण ठिकानों को निशाना बनाना है. इसे मिशन के बाद वापस आने के लिए नहीं बनाया गया है. यह लक्ष्य से टकराकर हमला कर सकता है. इसे बनाने वाली कंपनी आईजी डिफेंस डॉट कॉम की वेबसाइट पर इसकी रेंज करीब एक हजार किलोमीटर बताई गई है. उड़ान अवधि 7 से 8 घंटे तक होने की जानकारी भी मिलती है. यह दो सौ किलोग्राम तक पेलोड या विस्फोटक ले जाने में सक्षम है. इसमें कैमरे, थर्मल सेंसर, एन्क्रिप्टेड डेटा लिंक और नेविगेशन सिस्टम होने का दावा है.
यह भारत के लिए क्यों खास है?
भारत की दो बड़ी संवेदनशील सीमाएं हैं. पश्चिमी सीमा पर पाकिस्तान है. उत्तरी और पूर्वी सीमा पर चीन है. दोनों मोर्चों पर कठिन भूगोल, ऊंचे पर्वत और संवेदनशील सैन्य ठिकाने हैं. ऐसी स्थिति में लंबी दूरी का ड्रोन सेना को नया विकल्प दे सकता है. यह दुश्मन के रडार, संचार केंद्र, गोलाबारूद डिपो, बंकर या कमांड पोस्ट जैसे लक्ष्यों पर नजर रख सकता है. जरूरत पड़ने पर सटीक हमला भी कर सकता है. इससे लड़ाकू विमानों और पायलटों पर शुरुआती जोखिम कम हो सकता है. साथ ही, भारत कम लागत वाले प्लेटफॉर्म की बड़ी संख्या में तैनाती की दिशा में आगे बढ़ सकता है.
तकनीक ही असली परीक्षा होगी
एक हजार किलोमीटर की रेंज बहुत महत्वपूर्ण है. लेकिन केवल रेंज से कोई ड्रोन शक्तिशाली नहीं बनता. उसकी सफलता कई बातों पर निर्भर करेगी. उसे जीपीएस जैमिंग के बीच रास्ता नहीं भूलना चाहिए. उसे दुश्मन के इलेक्ट्रॉनिक हमलों से बचना चाहिए. ये खबर आप क्विक समाचार में पढ़ रहे हैं। उसे लक्ष्य की सही पहचान करनी चाहिए. उसका डेटा लिंक सुरक्षित होना चाहिए. उसकी निर्माण लागत भी नियंत्रित होनी चाहिए. भारतीय सेना के लिए ऐसे ड्रोन की जरूरत है जो पहाड़, रेगिस्तान, जंगल और मैदानी क्षेत्रों में काम कर सकें. उन्हें दिन और रात दोनों समय मिशन पूरा करना होगा. उन्हें स्थानीय रूप से बनाया और बड़ी संख्या में तैयार भी किया जा सके.