पति के कर्ज की वसूली विधवा की FD से, SBI ने चुपके से उड़ाए ₹2000000

पति के कर्ज की वसूली विधवा की FD से, SBI ने चुपके से उड़ाए ₹2000000
पति के कर्ज की वसूली विधवा की FD से, SBI ने चुपके से उड़ाए ₹2000000

लखनऊ: एक तरफ बैंक अमीरों का हजारों करोड़ रुपये का लोन माफ कर देता है, तो दूसरी ओर गरीबों से लोन की वसूली गला दबाकर करता है. एक ऐसा ही मामला लखनऊ से आया है, जहां स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) ने मृतक से लोन वसूली के लिए विधवा के एफडी खाते से लगभग 20 लाख उड़ा लिए. जैसे ही ये मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच के पास पहुंचा एसबीआई को जमकर फटकार पड़ी.

दरअसल द्वारा एक मृतक व्यक्ति के कर्ज की वसूली के लिए उसकी विधवा पत्नी के बैंक खाते से जबरन 19.90 लाख रुपए काट लेने पर कोर्ट सख्त हो गया. कोर्ट ने बैंक के इस रवैये को ‘बैंकिंग नीति का घृणित उल्लंघन’ करार देते हुए एसबीआई को आदेश दिया है कि वह महिला का पूरा पैसा एफडी के लागू ब्याज दर के साथ चार हफ्ते के भीतर वापस करे और साथ ही 1 लाख रुपए का दंडात्मक मुआवजा भी दे.

क्या था पूरा मामला और कैसे की गई वसूली?
यह पूरा मामला नेहा मिश्रा नामक याचिकाकर्ता से जुड़ा है, जिनके पति लखनऊ के रिंग रोड स्थित मेडिसिन अस्पताल में सहायक प्रोफेसर थे. ये खबर आप क्विक समाचार में पढ़ रहे हैं। उन्होंने नवंबर 2020 में एसबीआई से 15 लाख रुपए का पर्सनल लोन लिया था. दुर्भाग्यवश, मई 2021 में कोविड संक्रमण के कारण उनके पति का निधन हो गया.

इसके बाद सितंबर 2025 में एसबीआई ने नेहा मिश्रा को कानूनी नोटिस भेजकर 13.87 लाख रुपए के बकाया लोन का भुगतान करने को कहा और उनका वेतन खाता भी सीज कर दिया. हालांकि, आरबीआई लोकपाल (RBI Ombudsman) के हस्तक्षेप के बाद वेतन खाते पर लगी रोक हटाई गई. लेकिन जब दोनों पक्षों के बीच मामले को लेकर बातचीत चल ही रही थी, तब एसबीआई ने गुपचुप तरीके से महिला की फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) भुना ली और उसमें से 19.90 लाख रुपए कर्ज के नाम पर डेबिट कर लिए.

महिला न तो गारंटर थीं और न ही सह-उधारकर्ता
नेहा मिश्रा की याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि मृत प्रोफेसर की पत्नी न तो इस लोन की सह-उधारकर्ता थीं और न ही गारंटर, जमानतदार, क्षतिपूर्तिकर्ता या नॉमिनी. कर्ज के इस लेनदेन में उनका बैंक के साथ किसी भी प्रकार का कॉन्ट्रेक्चुअल संबंध भी नहीं था. इसके अलावा, कोर्ट ने यह भी गौर किया कि कर्ज एक बीमा पॉलिसी से कवर था, जिसके लिए मृतक ने प्रीमियम का भुगतान किया था.

अदालत ने एसबीआई को लताड़ लगाते कहा कि बैंक यह साबित करने में पूरी तरह असफल रहा कि किस कानूनी प्रावधान के तहत वह पति के कर्ज की भरपाई के लिए उसकी पत्नी के निजी खाते से रकम काट सकता है. कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि बैंक अपने ग्राहकों के धन के संरक्षक होते हैं और जनता के पैसों को एक ट्रस्ट के रूप में रखते हैं.

मनमाने और अनियमित तरीके से नहीं की जा सकती वसूली
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में दो टूक कहा कि यदि बैंक कानूनन मृतक के कर्ज की वसूली उसकी पत्नी से कानूनी उत्तराधिकारी के रूप में करने का हकदार था भी, तब भी इसके लिए कानून सम्मत उचित प्रक्रिया अपनानी जरूरी थी. इस तरह रातोंरात गुपचुप तरीके से और मनमाने ढंग से किसी के खाते से पैसे काट लेना पूरी तरह अवैध है. अदालत के इस कड़े रुख से वित्तीय संस्थानों को स्पष्ट संदेश मिल गया है कि वे ग्राहकों के अधिकारों का हनन कर मनमानी नहीं कर सकते.

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