बैंक डिपॉजिट की रेटिंग्स से RBI ने खींचे हाथ! रेटिंग एजेंसियों की रेटिंग पर केंद्रीय बैंक का बड़ा कदम

बैंक डिपॉजिट की रेटिंग्स से RBI ने खींचे हाथ! रेटिंग एजेंसियों की रेटिंग पर केंद्रीय बैंक का बड़ा कदम

क्या आप भी बैंक में फिक्स्ड डिपॉजिट कराने से पहले रेटिंग एजेंसियों की AAA या AA+ रेटिंग देखकर यह मान लेते हैं कि आपका पैसा 100 फीसदी सेफ है? भारतीय रिजर्व बैंक अब इसी धारणा को बदलने की तैयारी में है. बैंकिंग सेक्टर के रेगुलेटर आरबीआई ने बैंक डिपॉजिट की क्रेडिट रेटिंग्स से खुद को अलग रखने का बड़ा कदम उठाया है. केंद्रीय बैंक का मानना है कि बैंकों में जमा पूंजी की सुरक्षा उसके कड़े रेगुलेटरी सुपरविजन से तय होती है, न कि प्राइवेट रेटिंग एजेंसियों के कमर्शियल आकलन से. ये खबर आप क्विक समाचार में पढ़ रहे हैं। रेटिंग्स को लेकर आम निवेशकों के मन में बने भ्रम को दूर करने और बैंकिंग गवर्नेंस को मजबूत करने के लिए यह निर्णय लिया गया है. आइए आपको भी बताते हैं कि आखिर इसको लेकर किस तरह की जानकारी सामने आई है?

RBI ने बैंक डिपॉजिट रेटिंग्स से दूरी क्यों बनाई?

बैंकिंग सेक्टर में जब कोई संकट आता है, तो क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों की भूमिका पर सवाल उठते हैं. अक्सर रेटिंग एजेंसियां संकट आने तक हाई रेटिंग बनाए रखती हैं और अचानक उसे डाउनग्रेड कर देती हैं. ऐसे केंद्रीय बैंक नहीं चाहता कि रेटिंग एजेंसियों द्वारा दी गई किसी रेटिंग को निवेशक ‘RBI द्वारा प्रमाणित सुरक्षा’ समझें. बैंकों की वास्तविक स्थिति का आकलन RBI के अपने प्रत्यक्ष निरीक्षण, नेट एनपीए , और कैपिटल एडिक्वेसी रेशियो से होता है.

आम निवेशकों पर इसका क्या असर होगा?

  • रेटिंग पर आंख बंद करके भरोसा न करें: निवेशकों को यह समझना होगा कि उच्च रेटिंग वाली FD भी निजी क्रेडिट मूल्यांकन पर आधारित होती है, न कि केंद्रीय बैंक की गारंटी पर.
  • बैंक की बैलेंस शीट देखना जरूरी: अब ग्राहकों को बैंक के एनपीए स्तर, मुनाफा और प्रोविजनिंग जैसे बुनियादी स्टैंडर्ड को देखकर निर्णय लेना होगा.
  • 5 लाख रुपए तक का डिपॉजिट पूरी तरह सुरक्षित: यह फैसला आपकी जमा पूंजी के सुरक्षा कवर को प्रभावित नहीं करता. DICGC नियम के तहत हर शेड्यूल बैंक में 5 लाख रुपए तक की रकम पूरी तरह बीमित रहती है.

बैंकिंग सिस्टम के लिए इसके क्या मायने हैं?

बैंक अब निजी एजेंसियों से मिली रेटिंग्स का इस्तेमाल विज्ञापन अभियानों में मुख्य हाइलाइट के रूप में आसानी से नहीं कर पाएंगे. वहीं दूसरी ओर नॉनबैंकिंग फाइनेंस कंपनियों के लिए रेटिंग्स जरूरी हो सकती हैं, लेकिन कमर्शियल बैंकों के लिए RBI का सख्त निगरानी ढांचा ही प्राथमिक सुरक्षा गारंटी है.

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