
अध्याय 5 : मृत्यु का रहस्य
भाग 5.1 (अध्याय–4)
॥ ॐ नमो नारायणाय ॥
गरुड़ जी ने भगवान श्रीहरि विष्णु से पूछा—
“हे प्रभु! क्या मनुष्य की मृत्यु अचानक होती है, या उसके आने से पहले कुछ संकेत भी मिलते हैं?”
भगवान विष्णु ने उत्तर दिया—
“हे गरुड़! मृत्यु का समय निश्चित है, परंतु अनेक बार प्रकृति शरीर के माध्यम से ऐसे परिवर्तन दिखाती है जो यह बताते हैं कि जीवन की अंतिम अवस्था निकट आ रही है। किंतु इन संकेतों को देखकर भयभीत नहीं होना चाहिए। इनका उद्देश्य मनुष्य को धर्म, भक्ति और आत्मचिंतन की ओर प्रेरित करना है।”
क्या मृत्यु के संकेत सभी को मिलते हैं?
गरुड़ पुराण यह नहीं कहता कि हर व्यक्ति को एक जैसे संकेत अवश्य मिलेंगे।
कुछ लोगों की मृत्यु दीर्घ रोग के बाद होती है, कुछ की वृद्धावस्था में, और कुछ की अचानक दुर्घटना या अन्य कारणों से। इसलिए किसी एक लक्षण को देखकर यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं कि मृत्यु निश्चित रूप से निकट है।
शास्त्र का उद्देश्य भविष्यवाणी करना नहीं, बल्कि जीवन की अनित्यता का बोध कराना है।
शरीर में दिखाई देने वाले परिवर्तन
जब जीवन का अंतिम चरण आता है, तब कई लोगों में शरीर की शक्ति धीरे-धीरे घटने लगती है।
- भूख और प्यास कम हो सकती है।
- शरीर अत्यंत दुर्बल हो सकता है।
- लंबे समय तक बोलना कठिन हो सकता है।
- मन कभी-कभी भीतर की ओर अधिक एकाग्र होने लगता है।
ये परिवर्तन अनेक चिकित्सकीय कारणों से भी हो सकते हैं। इसलिए इन्हें केवल आध्यात्मिक संकेत मानना उचित नहीं है। गरुड़ पुराण का संदेश यह है कि ऐसे समय में व्यक्ति के साथ प्रेम, सेवा और ईश्वर-स्मरण का वातावरण होना चाहिए।
मन की अवस्था
भगवान विष्णु बताते हैं कि अंतिम दिनों में मनुष्य के मन में जीवनभर के संस्कार अधिक प्रबल हो सकते हैं।
जिसने जीवन सत्य, सेवा और भक्ति में बिताया है, उसका मन अपेक्षाकृत शांत रह सकता है।
जिसने लोभ, क्रोध, छल और अन्याय में जीवन बिताया है, उसे पश्चाताप और मानसिक अशांति अधिक अनुभव हो सकती है।
इसलिए शास्त्र बार-बार कहते हैं कि जीवनभर का आचरण ही अंतिम समय की मानसिक अवस्था को प्रभावित करता है।
परिवार का कर्तव्य
गरुड़ पुराण के अनुसार जब किसी व्यक्ति का अंतिम समय निकट हो, तब परिवार को—
- झगड़ा या विवाद नहीं करना चाहिए।
- रोगी के सामने भय या निराशा का वातावरण नहीं बनाना चाहिए।
- भगवान के नाम, गीता, विष्णु सहस्रनाम या हरिनाम का शांतिपूर्वक स्मरण करना चाहिए।
- रोगी को मानसिक शांति और प्रेम देना चाहिए।
यह परंपरा इसलिए है कि अंतिम समय में मन ईश्वर की ओर उन्मुख रहे।
मृत्यु का स्मरण क्यों?
भगवान विष्णु गरुड़ जी से कहते हैं—
जो मनुष्य मृत्यु को याद रखता है, वह जीवन को अधिक मूल्यवान समझता है।
उसे समय का महत्व पता चलता है।
वह दूसरों के साथ अन्याय करने से पहले सोचता है।
वह धर्म, दया और सेवा को अपनाने का प्रयास करता है।
इस प्रकार मृत्यु का स्मरण भय नहीं, बल्कि विवेक उत्पन्न करता है।
क्या संकेतों से डरना चाहिए?
नहीं।
गरुड़ पुराण का उद्देश्य लोगों में अंधविश्वास फैलाना नहीं है।
यदि किसी व्यक्ति को बीमारी है, तो उसका उचित उपचार कराना भी धर्म है।
यदि वृद्धावस्था है, तो सेवा करना धर्म है।
यदि मृत्यु निकट है, तो ईश्वर-स्मरण और मानसिक शांति देना धर्म है।
यही शास्त्र का संतुलित संदेश है।
शास्त्रीय शिक्षा
भगवान विष्णु कहते हैं—
“जो मनुष्य मृत्यु से पहले अपने जीवन को धर्ममय बना लेता है, उसके लिए मृत्यु भय का नहीं, ईश्वर की ओर एक नए मार्ग का आरंभ बन जाती है।”
इस प्रसंग से हमें क्या शिक्षा मिलती है?
- मृत्यु का स्मरण हमें बेहतर जीवन जीना सिखाता है।
- अंतिम समय में परिवार का प्रेम और सेवा सबसे बड़ा सहारा है।
- भगवान का नाम जीवनभर का अभ्यास होना चाहिए।
- किसी भी शारीरिक परिवर्तन को अंधविश्वास से नहीं जोड़ना चाहिए।
- धर्म, करुणा और भक्ति ही जीवन की सबसे बड़ी तैयारी हैं।
अगले अध्याय में
गरुड़ पुराण – भाग 5.1 (अध्याय–5)
“पुण्यात्मा और पापी की मृत्यु में क्या अंतर होता है? गरुड़ पुराण का गहन वर्णन।”
हरे कृष्ण हरे कृष्ण
कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम
राम राम हरे हरे