संपादकीय : न्याय की अग्निपरीक्षा

संपादकीय : न्याय की अग्निपरीक्षा

न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा प्रकरण अब केवल एक न्यायाधीश के आचरण से ज्यादा भारतीय न्यायपालिका की जवाबदेही, पारदर्शिता और जनविश्वास की अग्निपरीक्षा बन गया है। लोकसभा अध्यक्ष द्वारा गठित तीन सदस्यीय समिति ने तीनों आरोप सरकारी आवास में बेहिसाबी नकदी की मौजूदगी, साक्ष्यों के संरक्षण में लापरवाही तथा टालमटोल और असंतोषजनक जवाब सिद्ध पाए जने के बाद संविधान के अनुच्छेद 217 के तहत उच्च न्यायालय का न्यायाधीश इस्तीफा राष्ट्रपति को लिखकर दे सकता है और हटाया केवल अनुच्छेद 124 की प्रक्रिया से जा सकता है। इसके लिए दोनों सदनों में कुल सदस्य संख्या के बहुमत और उपस्थित तथा मतदान करने वाले सदस्यों के कमसेकम दोतिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है।

न्यायाधीश अधिनियम, 1968 की धारा 6 भी दोष सिद्ध होने पर संसद में लंबित प्रस्ताव को आगे बढ़ाने का प्रावधान करती है, लेकिन  निर्णायक तथ्य यह है कि न्यायमूर्ति वर्मा इस्तीफा दे चुके हैं। उनके इस्तीफे के बाद उन्हें पद से हटाने का संवैधानिक उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है। इसलिए शीतकालीन सत्र में औपचारिक महाभियोग प्रस्ताव को मतदान और राष्ट्रपति के समक्ष हटाने तक ले जाना व्यावहारिक और संवैधानिक रूप से लगभग निरर्थक होगा। फिर भी समिति की रिपोर्ट को संसद के पटल पर रखना महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे इस्तीफा जांच से बच निकलने का पर्याय नहीं बन पाए। महत्वपूर्ण प्रश्न आपराधिक जांच का है। महाभियोग और आपराधिक अभियोजन दो अलग प्रक्रियाएं हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने मई 2025 में एफआईआर की मांग वाली याचिका को इसलिए नहीं सुना था कि पहले संबंधित संवैधानिक प्राधिकारियों से संपर्क किया जाए, उसने आपराधिक कार्रवाई की संभावना को बंद नहीं किया था। ये खबर आप क्विक समाचार में पढ़ रहे हैं। अब जब समिति ने आरोप सिद्ध कर दिए हैं और वर्मा पद पर नहीं हैं, तो सक्षम जांच एजेंसी द्वारा एफआईआर और आपराधिक जांच की मांग कहीं अधिक तार्किक हो जाती है। परिस्थितियों के अनुसार दिल्ली पुलिस अथवा सीबीआई जांच संभव हो सकती है; सीबीआई जांच के लिए उसका वैधानिक अधिकारक्षेत्र और आवश्यक प्रशासनिक/न्यायिक अनुमति अलग प्रश्न होंगे।

सीबीआई जांच बता सकती है नकदी आई कहां से और आग के बाद गायब कैसे हुई? अब सीसीटीवी, फोनलोकेशन, कर्मचारियों के बयान, बैंकिंग लेनदेन, आयकर अभिलेख, संपत्ति और कथित नकदी के संभावित स्रोत की फोरेंसिक वित्तीय जांच ही इस पहेली को सुलझा सकती है। बेशक, असली परिणति महाभियोग नहीं, सत्य तक पहुंचना होना चाहिए। सरकार और न्यायपालिका को मिलकर आपराधिक जांच, नकदी के स्रोत और गायब होने की स्वतंत्र जांच, न्यायाधीशों की वित्तीय पारदर्शिता तथा शिकायतों की विश्वसनीय स्वतंत्र व्यवस्था सुनिश्चित करनी चाहिए। न्यायपालिका की स्वतंत्रता लोकतंत्र की अनिवार्यता है, लेकिन स्वतंत्रता का अर्थ जवाबदेही से मुक्ति नहीं। इस मामले से मान लेना कि न्यायपालिका भ्रष्ट है, वैसे ही गलत होगा जैसे केवल एक व्यक्ति की भूल मानकर इसे भूल जाना। यह नजीर स्थापित होना चाहिए कि उच्च न्यायपालिका भी जवाबदेही से बरी नहीं।

ये भी पढ़ें

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *