
भारत की सांस्कृतिक परंपराएं विविधता में एकता की मिसाल हैं। इन्हीं परंपराओं में विशेष स्थान रखता है हरियाली तीज का पर्व। हरियाली तीज भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा का अत्यंत मंगलकारी और आध्यात्मिक महत्व वाला पर्व है, जो श्रावण मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को पूरे भक्ति, श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। सावन मास में आने के कारण यह पर्व प्रकृति की हरियाली, वर्षा की स्फूर्ति और वातावरण की शुद्धता से गहराई से जुड़ा हुआ है। चारों ओर हरियाली की चादर बिछ जाती है और मनुष्य की चेतना भी प्रकृति के इस सौंदर्य से जुड़कर आध्यात्मिकता की ओर आकर्षित होती है।
यह पर्व केवल प्राकृतिक हरियाली का उत्सव नहीं, बल्कि भगवान शिव और माता पार्वती के दिव्य पुनर्मिलन का पावन प्रतीक भी है। पौराणिक मान्यता के अनुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए 107 जन्मों तक कठोर तपस्या की थी। श्रावण मास की शुक्ल तृतीया को व्रत रखकर उन्होंने शिव को प्रसन्न किया और अंतत भगवान शिव ने उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार किया। इसी आध्यात्मिक मिलन की स्मृति में हरियाली तीज मनाई जाती है। विवाहित महिलाएं इस दिन व्रत रखकर भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करती हैं तथा पति की लंबी उम्र और वैवाहिक सुख की कामना करती हैं। कुंवारी कन्याएं भी योग्य वर की प्राप्ति और विवाह संबंधी बाधाओं को दूर करने के लिए यह व्रत करती हैं।
हरियाली तीज का नाम भी सावन की हरियाली से जुड़ा है। इस दिन महिलाएं हरे वस्त्र पहनती हैं, हरी चूड़ियां धारण करती हैं, मेंहदी रचाती हैं और विशेष श्रृंगार करती हैं। हरा रंग प्रकृति की ताजगी, नवीनता, उर्वरता, समृद्धि और अखंड सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। श्रृंगार की यह परंपरा केवल शारीरिक सज्जा नहीं, बल्कि मन और आत्मा के उल्लास की भी प्रतीक है।
हरियाली तीज का सामाजिक और पारिवारिक पक्ष भी अत्यंत गहरा है।
राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और झारखंड सहित कई राज्यों में इसे धूमधाम से मनाया जाता है। लोकगीत, लोकनृत्य और झूले इस पर्व की प्रमुख पहचान हैं। महिलाएं वृक्षों की डालियों पर झूले डालकर सावन के गीत गाती हैं। मंदिरों में भी विशेष पूजा और झूलन उत्सव आयोजित किए जाते हैं। हरियाली तीज हमें प्रकृति संरक्षण का संदेश भी देती है। ये खबर आप क्विक समाचार में पढ़ रहे हैं। वटवृक्ष जैसे वृक्षों की पूजा यह दर्शाती है कि भारतीय संस्कृति में प्रकृति को देवत्व का स्थान प्राप्त है।
आज जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण संकट के दौर में यह पर्व हमें प्रकृति से प्रेम और उसके संरक्षण की प्रेरणा देता है। आधुनिक संदर्भ में भी हरियाली तीज की प्रासंगिकता बनी हुई है। आज की शिक्षित और आत्मनिर्भर स्त्री जब तीज व्रत करती है, तो वह अपनी परंपराओं और जड़ों से जुड़ती है। यह पर्व नारी के तप, प्रेम, सौंदर्य, श्रद्धा और संकल्प का प्रतीक है।
श्वेता गोयल, शिक्षिका