हर चुनाव से पहले यूपी को बांटने का शगूफा, राजभर के बयान के क्या हैं मायने?​

हर चुनाव से पहले यूपी को बांटने का शगूफा, राजभर के बयान के क्या हैं मायने?​

क्या यूपी को बांटा जाए? उत्तर प्रदेश में चुनाव करीब आते ही एक पुराना मुद्दा फिर चर्चा में है. विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले कैबिनेट मंत्री और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर ने इस बहस को फिर हवा दे दी है. देवरिया की एक रैली में राजभर ने दावा किया कि आने वाले समय में यूपी चार हिस्सों में बंटेगा और अगर पूर्वांचल अलग राज्य बनता है तो उसका पहला मुख्यमंत्री राजभर समाज का बेटा होना चाहिए.

ऐसे में सवाल उठता है कि 2027 के चुनाव से पहले राजभर ने इन तीनों मुद्दों को एक साथ क्यों उठाया? आखिर इसके क्या सियासी मायने हैं? इस सवाल का जवाब जानने के लिए सबसे पहले हमें पूर्वांचल की सियासत को समझना पड़ेगा. पूर्वांचल की 28 जिलों की 164 विधानसभा सीटें हमेशा अहम रही हैं. यह 403 सदस्यीय विधानसभा का करीब 41 फीसदी हिस्सा है. एक कहावत है कि जिसने पूर्वांचल जीता, उसने यूपी जीता. हर चुनाव से पहले अलग पूर्वांचल की मांग होती है.

कबकब अलग पूर्वांचल बनाने की मांग उठी

अलग पूर्वांचल की मांग सबसे पहले 1962 में उठी, जब गाजीपुर के सांसद विश्वनाथ सिंह गहमरी ने संसद में पूर्वी उत्तर प्रदेश की पिछड़ेपन की समस्या उठाई. इसके बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने पूर्वांचल के विकास और पिछड़ेपन की स्थिति का अध्ययन करने के लिए पटेल आयोग गठित किया था. फिर 1970 से 80 के दशक तक… कल्पनाथ राय समेत कई पूर्वांचली नेताओं ने इस मांग को राजनीतिक मंचों पर उठाया.

हालांकि इस दौर में यह उत्तराखंड आंदोलन की तरह व्यापक जनआंदोलन नहीं बन सकी. फिर 1994 में पूर्वांचल बनाओ दल नाम से राजनीतिक संगठन सामने आया. 1996 को पूर्वांचल बनाओ मंच का गठन हुआ. इसी दौरान अलग पूर्वांचल के साथसाथ पश्चिमी यूपी के लिए हरित प्रदेश और बुंदेलखंड के लिए अलग राज्य की मांग भी जोर पकड़ती रही. मायावती सरकार ने नवंबर 2011 में उत्तर प्रदेश को चार हिस्सों में बांटने का प्रस्ताव रखा.

मायावती ने पूर्वांचल, पश्चिम प्रदेश, अवध प्रदेश और बुंदेलखंड बनाने का प्रस्ताव कैबिनेट से पास कराया. बाद में यूपी विधानसभा ने भी राज्य पुनर्गठन का प्रस्ताव पारित करके केंद्र को भेजा. 2012 के चुनाव के दौरान मायावती ने यह मुद्दा बनाया, लेकिन सपा ने इसका विरोध किया. 2017 में भी बीजेपी के कुछ नेताओं ने यह मुद्दा उठाया था, लेकिन आवाज उतनी बुलंद न थी. अब 2027 से पहले ओम प्रकाश राजभर ने पूर्वांचल को दोबारा राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है.

राजभर ने क्यों की मांग?

ओम प्रकाश राजभर के अलग पूर्वांचल के पीछे की कई कहानी है. इसमें सबसे बड़ी राजभर समाज के लोगों को अपना सीएम बनने का सपना दिखाना अहम है. वाराणसी, गाजीपुर, मऊ, बलिया, आजमगढ़, जौनपुर, देवरिया, गोरखपुर, बस्ती, संतकबीरनगर और मिर्जापुर समेत पूर्वी यूपी के कई इलाकों में राजभर समाज की राजनीतिक मौजूदगी मानी जाती है. 100 से ज्यादा विधानसभा सीटों पर राजभर वोट को प्रभावशाली बताया जाता रहा है.

2022 में सुभासपा ने सपा के मिलकर 18 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ा था और 6 सीटों पर जीत दर्ज की थी. राजभर के बयान का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यूपी के चार हिस्सों में बंटने की बात से ज्यादा पूर्वांचल के मुख्यमंत्री पद को लेकर है. उन्होंने कहा कि अगर पूर्वांचल अलग राज्य बनता है तो वहां मुख्यमंत्री राजभर समाज का होना चाहिए. ये खबर आप क्विक समाचार में पढ़ रहे हैं। इस तरह उन्होंने अपने सामाजिक आधार को सीधे सत्ता में हिस्सेदारी की दावेदारी से जोड़ दिया.

BJP के साथ गठबंधन और सियासी संदेश

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सुभासपा इस समय बीजेपी के नेतृत्व वाले NDA गठबंधन का हिस्सा है. अभी सीटों को लेकर पेच फंसा हुआ है. राजभर चाहते हैं कि उनको इस बार 18 से ज्यादा सीट मिले. इसके लिए वह अपने समाज की ताकत को ढाल बना रहे हैं. पहले वो राजभर समाज का 100 से अधिक सीटों पर प्रभाव की बात करते थे और अब अलग पूर्वांचल की मांग करके प्रेशर पॉलीटिक्स कर रहे हैं. साथ ही अपने कोर वोट को अपने साथ जोड़े रखना चाहते हैं.

राजभर वोटरों पर सपा की नजर

मंत्री ओम प्रकाश राजभर के पूर्वांचल राग की एक कहानी यह भी है कि सपा लगातार राजभर वोटरों को अपने पाले में लाने की कोशिश कर रही है. सपा ने महिला मोर्चा की कमान सीमा राजभर को दे दी है. साथ ही राम अचल राजभर समेत कई राजभर नेताओं को अपने समाज में जाकर सपा के पक्ष में लामबंद करने का टास्क दे रखा है. बीजेपी के अंदर भी अनिल राजभर एक बड़े ध्रुव हैं. ऐसे में ओपी राजभर की कोशिश है कि राजभर समाज के बीच मैसेज देते रहना है कि वो ही इस समाज के रहनुमा हैं.

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