PMOS In Indian Women: कई बार महिलाओं व बच्चियों में समय से पहले ही पीरियड्स बंद हो जाते हैं। इसकी वजह होती है PMOS. यह एक प्रजनन आयु की महिलाओं में होने वाला दुनिया का सबसे आम हार्मोन संबंधी विकार माना जाता है।

इससे पहले इसे पीसीओएस के नाम से जाना जाता था। हालांकि नाम बदलने के बाद भी कई लोग इसे केवल ओवरी से जुड़ी बीमारी समझते हैं। जबकि विशेषज्ञों के अनुसार, यह वास्तव में एक मेटाबॉलिक डिसऑर्डर है, जो शरीर के लगभग हर सिस्टम को प्रभावित करता है। इसका असर इंसुलिन नियंत्रण, प्रजनन क्षमता, हार्ट हेल्थ, नींद, मूड और मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है।
द लैंसेट में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर में लगभग हर आठ में से एक महिला PMOS से प्रभावित है। वहीं भारत में इसकी स्थिति और भी गंभीर बताई जा रही है। भारत में हर पांच में से एक महिला इस समस्या से प्रभावित है। स्त्री रोग विशेषज्ञों का मानना है कि 25 वर्ष से कम उम्र की लगभग हर पांच में से एक युवती किसी न किसी रूप में PMOS से प्रभावित है, जबकि वैश्विक स्तर पर यह आंकड़ा करीब 8 से 13 प्रतिशत के बीच है।
उनके अनुसार, भारत में इसके अधिक मामलों की एक बड़ी वजह पहले से ही डायबिटीज और इंसुलिन रेजिस्टेंस की ऊंची दर है। इसके अलावा तेजी से हो रहा अर्बनाइजेशन, प्रोसेस्ड फूड का बढ़ता सेवन, शारीरिक गतिविधियों में कमी और लगातार बढ़ता स्ट्रेस भी इस समस्या के मूल में है।
भारत में कम उम्र में PMOS के मामले क्यों बढ़ रहे हैं?
विशेषज्ञों का कहना है कि PMOS के बढ़ते मामलों के कई कारण हो सकते हैं, इनमें से एक कारण यह भी है कि अब पहले की तुलना में अधिक महिलाएं पीरियड्स संबंधित समस्याओं के लिए डॉक्टर से सलाह लेने लगी हैं। अब स्त्री रोग विशेषज्ञ या गायनोकोलॉजिस्ट के पास जाना पहले जैसा टैबू नहीं माना जाता है। हालांकि, अब भी जागरूकता की कमी है। ग्रामीण इलाकों में रहने वाली कई महिलाओं का वर्षों तक सही निदान नहीं हो पाता। वहीं टीनएज बच्चियों के लिए उनकी माएं सहारा होती हैं, जिनके पास वो पीरियड संबंधी समस्या का समाधान ढूंढती हैं, लेकिन कई बार माताओं को भी इस बारे में कम जानकारी होती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, भारत की मेटाबॉलिक कंडीशन भी महिलाओं को PMOS के प्रति अधिक सेंसेटिव बनाती है। यदि परिवार में या इंसुलिन रेजिस्टेंस का इतिहास रहा हो, तो PMOS होने का खतरा अधिक बढ़ जाता है। डॉक्टर के मुताबिक, पूरे भारत में PMOS लगभग 10 प्रतिशत हो सकती है, लेकिन बड़े शहरों में यह आंकड़ा 25 से 40 फीसदी तक हो सकता है। शहरों में इसका कारण मॉडर्न लाइफ स्टाइल हो सकता है, जहां नींद कम होती है और तनाव अधिक रहता है।
समय रहते PMOS की पहचान क्यों है जरूरी?
की शुरुआती पहचान होने पर इसके लक्षणों को बेहतर तरीके से नियंत्रित किया जा सकता है और भविष्य में होने वाली कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं के खतरे को भी कम किया जा सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, यदि ये संकेत दिखाई दें तो इन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए—
- मासिक धर्म का अनियमित होना या कई महीनों तक पीरियड्स न आना
- बिना किसी स्पष्ट कारण के अचानक वजन बढ़ना
- लंबे समय तक बने रहने वाले मुंहासे
- चेहरे या शरीर पर जरूरत से ज्यादा बाल आना
- गर्भधारण करने में कठिनाई
- इंसुलिन रेजिस्टेंस के संकेत, जैसे गर्दन या बगल की त्वचा का काला पड़ना
PMOS का इलाज हमेशा किसी योग्य गायनोकोलॉजिस्ट या एंडोक्राइनोलॉजिस्ट द्वारा ही किया जाना चाहिए। इसके लक्षण हर महिला में अलगअलग हो सकते हैं और अनियमित पीरियड्स होने का मतलब हमेशा PMOS नहीं होता।
PMOS को लेकर जागरूकता बढ़ाना क्यों जरूरी है?
PMOS को लेकर किशोरियों को मासिक धर्म और हार्मोनल स्वास्थ्य से जुड़ी सही और साइंटिफिक जानकारी मिलनी चाहिए। मातापिता को भी अपनी बेटियों के शरीर में होने वाले बदलावों पर खुलकर बातचीत करनी चाहिए, ताकि किसी भी समस्या की समय रहते पहचान हो सके। इसके साथ ही, खासकर छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्यकर्मियों को PMOS के शुरुआती लक्षणों की पहचान और समय पर इलाज के लिए लगातार प्रशिक्षण देने की जरूरत है।