अमेरिका और सऊदी अरब के रिश्ते एक बार फिर चर्चा में हैं. वजह है हूतियों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का रुख. कहा जा रहा है कि सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने अमेरिका से हूतियों के खिलाफ हवाई हमले करने की अपील की. ट्रंप प्रशासन ने सऊदी अरब को सीधे सैन्य हमले में मदद देने से इनकार कर दिया. हालांकि, अमेरिका ने खुफिया जानकारी और लक्ष्य से जुड़ी सूचनाएं देने की पेशकश की है. इस फैसले ने एक पुरानी बहस को फिर जिंदा कर दिया है. सवाल है कि क्या अमेरिका ने 1945 के उस समझौते को भुला दिया है, जिसे आम तौर पर क्विंसी पैक्ट कहा जाता है.आइए, इस पूरे मामले के सभी पहलुओं को समझने की कोशिश करते हैं. जानते हैं कि क्विंसी पैक्ट क्या था? इसकी मुख्य शर्तें क्या थीं? क्या वाकई सऊदी अरबअमेरिका के बीच रिश्तों में किसी तरह की दरार आ रही है?

क्विंसी पैक्ट का संबंध 14 फरवरी 1945 की एक ऐतिहासिक मुलाकात से है. उस समय अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी. रूजवेल्ट और सऊदी अरब के संस्थापक राजा अब्दुल अजीज इब्न सऊद की मुलाकात अमेरिकी युद्धपोत यूएसएस क्विंसी पर हुई थी. इस मुलाकात को अमेरिका और सऊदी अरब की दोस्ती की नींव माना जाता है. इसके बाद दोनों देशों के बीच ऊर्जा और सुरक्षा पर आधारित संबंध मजबूत हुए.
क्या अमेरिका ने सुरक्षा का वादा तोड़ दिया?
सऊदी अरब की नजर में अमेरिका का ताजा फैसला निराशाजनक हो सकता है. रियाद को उम्मीद थी कि अगर हूतियों से सीधा खतरा पैदा होता है, तो अमेरिका सैन्य कार्रवाई करेगा. लेकिन अमेरिका ने इस बार सीधा युद्ध शुरू करने से परहेज किया. इसका मतलब यह नहीं है कि अमेरिका ने सऊदी अरब से पूरी तरह दूरी बना ली है. अमेरिका अब भी सऊदी अरब को हथियार देता है. दोनों देशों के बीच खुफिया सहयोग जारी है. अमेरिकी सैनिक भी सऊदी क्षेत्र में मौजूद हैं. अमेरिका की ओर से सैन्य योजना और लक्ष्य से जुड़ी जानकारी भी दी जा रही है. फर्क केवल इतना है कि वॉशिंगटन अब हर क्षेत्रीय खतरे का जवाब अपने सैनिकों और हवाई हमलों से नहीं देना चाहता. यही बदलाव सऊदी अरब के लिए चिंता का कारण है. सऊदी नेतृत्व को लगता है कि सुरक्षा सहयोग अब पहले जैसा भरोसेमंद नहीं रहा.
क्या क्विंसी पैक्ट खत्म हो गया?
क्विंसी पैक्ट को पूरी तरह खत्म हुआ कहना जल्दबाजी होगी. अमेरिका और सऊदी अरब के बीच सैन्य और आर्थिक संबंध अभी भी मजबूत हैं. लेकिन इस समझ की पुरानी व्याख्या जरूर बदल रही है. पहले सऊदी अरब को भरोसा था कि उसके खिलाफ बड़े हमले की स्थिति में अमेरिका सीधे हस्तक्षेप करेगा. अब अमेरिका सीमित सहयोग दे रहा है. वह खुफिया जानकारी दे सकता है. हथियार दे सकता है. सैन्य प्रशिक्षण दे सकता है. लेकिन हर बार अपने सैनिक भेजने या हवाई हमले करने के लिए तैयार नहीं है. इसका अर्थ है कि तेल के बदले सुरक्षा का पुराना मॉडल अब बिना शर्त लागू नहीं है. इसकी जगह लेनदेन आधारित और सीमित साझेदारी ले रही है.
हूती विद्रोही
हूतियों के हमलों से सऊदी अरब को जबरदस्त नुकसान
हूती संगठन यमन में सक्रिय एक शक्तिशाली विद्रोही समूह है. उसे ईरान का समर्थन हासिल है. हाल में हूतियों ने लाल सागर और आसपास के समुद्री मार्गों पर हमले तेज किए हैं. इसका बुरा असर तेल की आपूर्ति पर होता हुआ दिखाई दे रहा है. उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार सऊदी अरब जून में हर रोज करीब 34 लाख बैरल तेल की आपूर्ति करता था. अगस्त में यह 1.28 लाख बैरल तक पहुंच गया. सितंबर में यह अब जाकर सात लाख बैरल रोज तक पहुंचा है. लाल सागर दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक मार्गों में शामिल है.
यहां से तेल, गैस और दूसरी वस्तुओं का बड़ा हिस्सा गुजरता है. अगर हूती इस क्षेत्र में जहाजों या तेल सुविधाओं को निशाना बनाते हैं, तो इसका असर केवल सऊदी अरब पर नहीं पड़ता. इससे वैश्विक व्यापार और तेल की कीमतों पर भी दबाव बढ़ सकता है. ये खबर आप क्विक समाचार में पढ़ रहे हैं। सऊदी अरब के लिए यह खतरा और गंभीर है. यमन सऊदी सीमा के पास है. हूतियों के पास ड्रोन और मिसाइलों का इस्तेमाल करने की क्षमता है. सऊदी अरब पहले भी हूतियों के हमलों का सामना कर चुका है. इसलिए रियाद चाहता है कि अमेरिका इस खतरे को केवल क्षेत्रीय समस्या न माने.
डोनाल्ड ट्रंप
ट्रंप सीधे युद्ध से क्यों बच रहे हैं?
ट्रंप प्रशासन की प्राथमिकताएं बदल गई हैं. अमेरिका इस समय ईरान और होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे मुद्दों पर अधिक ध्यान दे रहा है. वॉशिंगटन यमन में एक नया सैन्य मोर्चा खोलना नहीं चाहता. अमेरिका को डर है कि हूतियों पर हमला करने से ईरान के साथ तनाव और बढ़ सकता है. इससे अमेरिकी सैनिक और जहाज भी निशाने पर आ सकते हैं. संघर्ष का दायरा तेजी से बढ़ सकता है. ट्रंप की विदेश नीति में अमेरिका पहले की तरह हर सहयोगी की सुरक्षा की जिम्मेदारी लेने के पक्ष में नहीं दिखता. उनका जोर सीधा सैन्य हस्तक्षेप करने के बजाय दबाव, हथियारों की बिक्री और सीमित सहयोग पर है. अमेरिकी प्रशासन का मानना है कि हूतियों का संघर्ष मुख्य रूप से सऊदी अरब से जुड़ा है. इसलिए अमेरिका इसमें सीधे शामिल होने से बच रहा है.
क्या सऊदी और अमेरिका की दोस्ती कमजोर क्यों पड़ रही है?
सऊदी और अमेरिका के रिश्ते केवल सुरक्षा पर आधारित नहीं हैं. दोनों देशों के बीच तेल, हथियार, निवेश और व्यापार भी महत्वपूर्ण हैं. फिर भी, हाल के वर्षों में भरोसे की कमी बढ़ी है. सऊदी अरब को लगता है कि अमेरिका उसकी सुरक्षा जरूरतों को पहले जैसी प्राथमिकता नहीं दे रहा.
2019 में सऊदी तेल प्रतिष्ठानों पर हुए हमलों के बाद भी अमेरिका की प्रतिक्रिया सीमित रही थी. उस समय भी रियाद में यह सवाल उठा था कि अमेरिकी सुरक्षा गारंटी कितनी मजबूत है. इसके अलावा, अमेरिका अब मध्य पूर्व में तेल पर पहले जितना निर्भर नहीं है. अमेरिकी ऊर्जा उत्पादन बढ़ा है. इसलिए सऊदी तेल की रणनीतिक अहमियत कुछ हद तक कम हुई है. दूसरी ओर, सऊदी अरब भी अपनी विदेश नीति बदल रहा है. वह केवल अमेरिका पर निर्भर नहीं रहना चाहता. रियाद चीन, रूस, पाकिस्तान, तुर्की और दूसरे क्षेत्रीय देशों के साथ संबंध बढ़ा रहा है. सऊदी अरब का लक्ष्य अब एक संतुलित विदेश नीति बनाना है. वह अमेरिका से रिश्ते भी रखना चाहता है और दूसरे देशों के साथ विकल्प भी तैयार करना चाहता है.
आगे क्या हो सकता है?
अगर हूतियों के हमले बढ़ते हैं, तो अमेरिका पर दबाव भी बढ़ सकता है. तेल आपूर्ति और समुद्री व्यापार प्रभावित होने पर वॉशिंगटन को अपनी नीति पर फिर विचार करना पड़ सकता है. सऊदी अरब भी अपनी सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करेगा. वह क्षेत्रीय देशों के साथ नए समझौते कर सकता है. मिस्र, तुर्की और पाकिस्तान के साथ सैन्य सहयोग बढ़ सकता है. फिर भी, अमेरिका को पूरी तरह छोड़ना सऊदी अरब के लिए आसान नहीं होगा. अमेरिकी हथियार, तकनीक और खुफिया सहयोग अभी भी बहुत महत्वपूर्ण हैं. इसलिए आने वाले समय में दोनों देशों के रिश्ते टूटेंगे नहीं. लेकिन उनका स्वरूप बदल सकता है.