हमें भगत सिंह पड़ोस के घर में क्यों चाहिए, अपने घर में क्यों नहीं?​

हमें भगत सिंह पड़ोस के घर में क्यों चाहिए, अपने घर में क्यों नहीं?​

हम सब भगत सिंह चाहते हैं. अजीब बात यह है कि हम उन्हें अक्सर अपने घर में नहीं, पड़ोस के घर में देखना चाहते हैं. पड़ोसी का बच्चा मुश्किल सवाल पूछे तो हमें गर्व होता है. वह चुपचाप सब मानने से इनकार करे तो हम उसे बहादुर कहते हैं. ये खबर आप क्विक समाचार में पढ़ रहे हैं। वह आसान जिंदगी के बजाय किसी अर्थपूर्ण जिंदगी को चुने तो हम उसकी तारीफ करते हैं. हम उसकी तस्वीर लगाते हैं और उसके साहस को याद करते हैं. लेकिन सोचिए, अगर हमारा अपना बच्चा एक दिन घर आकर कहे, मुझे सिर्फ सुरक्षित जिंदगी नहीं चाहिए. मुझे ऐसी जिंदगी चाहिए जिसका कोई मतलब हो, तो क्या हमें भी उतना ही गर्व होगा? या हम कहेंगे, पहले अपना करियर बना लो. पहले पैसे कमाओ. पहले जिंदगी सुरक्षित कर लो. यहीं इतिहास की एक कहानी अचानक हमारे अपने घर में आकर बैठ जाती है.

आज से 119 साल पहले, इसी तारीख को एक बच्चा पैदा हुआ था. उस घर में किसी को पता नहीं था कि एक दिन करोड़ों लोग उसका नाम याद करेंगे. उसके परिवार को कोई प्रतीक दिखाई नहीं देता था. उन्हें बस अपना बच्चा दिखाई देता था. एक ऐसा बच्चा जिसे खाना चाहिए, प्यार चाहिए, देखभाल चाहिए और सुरक्षा चाहिए. कोई यह नहीं जान सकता था कि आगे चलकर वह क्या बनेगा. शायद हर बड़ी जिंदगी की शुरुआत ऐसी ही होती है.

जब कोई बच्चा पैदा होता है, तब उसके माथे पर कोई नाम नहीं लिखा होता. वह डॉक्टर बन सकता है, कलाकार, किसान, शिक्षक, मजदूर या ऐसा इंसान भी बन सकता है जो अपने समय से बड़ा कोई सवाल पूछ दे.

भगत सिंह.

वह बच्चा बड़ा होकर भगत सिंह बना. लेकिन शायद उनका सबसे बड़ा योगदान यह नहीं था कि वह मरने के लिए तैयार थे. उनका सबसे बड़ा योगदान यह था कि वह सोचने के लिए तैयार थे. उन्होंने पढ़ा. सवाल किए. बहस की. अपने विचारों को भी परखा. उन्होंने केवल इसलिए किसी बात को सच नहीं मान लिया क्योंकि बहुत लोग उसे सच मानते थे. उन्होंने समझा कि आजाद देश को आजाद दिमाग भी चाहिए. बाहर से आजाद होकर भी इंसान भीतर से गुलाम रह सकता है, अगर उसे यह पूछने से डर लगे कि क्यों?

यहीं उनकी कहानी हमारे लिए थोड़ी मुश्किल हो जाती है. हमें वह बहादुर युवक पसंद है जो मौत के सामने खड़ा रहा. हमें उनकी तस्वीर पसंद है. उनकी टोपी, उनकी मूंछें और उनके प्रसिद्ध शब्द याद हैं. हम उस युवक को याद करते हैं जो फांसी के तख्ते तक गया. लेकिन हाथ में किताब लिए हुए भगत सिंह को अपने घर लाना थोड़ा कठिन है. तस्वीर हमसे कुछ नहीं मांगती. सवाल मांगता है.

भगत सिंह जैसे बनो

हम अपने बच्चों से कहते हैं, भगत सिंह जैसे बनो. लेकिन हम सच में क्या चाहते हैं? क्या हम चाहते हैं कि हमारा बच्चा तभी बहादुर बने जब कोई उसे देख रहा हो? या हम चाहते हैं कि वह अपने मन से सोचे, भले ही उसकी बात हमसे अलग हो? दोनों में बहुत फर्क है. पड़ोसी का बच्चा दुनिया से सवाल करे तो हमें अच्छा लगता है. लेकिन जब हमारा अपना बेटा या बेटी पूछता है, मुझे यह क्यों मानना चाहिए? तो हम परेशान हो सकते हैं. हम कह सकते हैं, ज्यादा बहस मत करो. हम कह सकते हैं, बड़ों को ज्यादा पता होता है.

सोचिए, घर की मेज पर एक छोटीसी बातचीत हो रही है. पिता कहते हैं, ऐसा ही होता है. बच्चा पूछता है, लेकिन क्यों? पिता कहते हैं, क्योंकि सब लोग ऐसा ही करते हैं. बच्चा फिर पूछता है, लेकिन क्या यह सही है? अचानक कमरे में खामोशी आ जाती है. बच्चे ने कुछ तोड़ा नहीं है. उसने केवल सवाल पूछा है. फिर भी वह छोटासा सवाल हमारे लिए किसी बड़े खतरे से ज्यादा मुश्किल हो सकता है.

शायद यही असली परीक्षा है कि हम भगत सिंह को कितना याद करते हैं. किसी ऐसे इंसान का सम्मान करना आसान है जिसे इतिहास पहले ही सही साबित कर चुका हो. लेकिन उस बच्चे का सम्मान करना कठिन है जो अभी सवाल पूछ रहा है, सीख रहा है, गलतियां कर रहा है और दुनिया को समझने की कोशिश कर रहा है.

हम अक्सर सोचते हैं कि साहस का मतलब खतरे के सामने खड़ा होना है. लेकिन साहस कई बार बहुत शांत होता है. जब सब लोग एक ही बात दोहरा रहे हों, तब किताब खोलना भी साहस है. यह कहना भी साहस है, हो सकता है मैं गलत हूं. कुछ नया सीखकर अपनी राय बदल देना भी साहस है. किसी इंसान से केवल इसलिए नफरत न करना कि आसपास के लोग उससे नफरत करते हैं, यह भी साहस है. और अपने ही विश्वास के सामने ईमानदारी से सवाल रख देना शायद सबसे बड़ा साहस है.

किसी देश को केवल इसलिए आजादी नहीं मिलती कि उसके महान लोग बहादुर थे. आजादी तब भी बनी रहती है जब साधारण घर अपने बच्चों को सोचने की जगह देते हैं. किसी महान युवक की सबसे बड़ी विरासत केवल उसकी शहादत नहीं होती. वह सवाल पूछने की आदत भी हो सकती है, जो वह आने वाली पीढ़ियों के लिए छोड़ जाता है.

इसलिए शायद भगत सिंह को आज एक और मूर्ति, एक और पोस्टर या एक और समारोह की जरूरत नहीं है. शायद उन्हें हमारे घर की खाने की मेज पर एक कुर्सी चाहिए. शायद उन्हें हमारे अपने बच्चे के रूप में हमारे सामने बैठना चाहिए और ऐसा सवाल पूछना चाहिए जिसका हमारे पास कोई तैयार जवाब न हो.

और जब वह दिन आए, तब हम क्या करेंगे?क्या हम अपने बच्चे से कहेंगे कि सवाल पूछना बंद करो, या उसमें इतना साहस होगा कि हम उसके पास बैठकर कहें, बताओ, तुम क्या सोच रहे हो?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *