क्या है एडिशनल प्रोटोकॉल? जो अमेरिकासऊदी की न्यूक्लियर डील से गायब

क्या है एडिशनल प्रोटोकॉल? जो अमेरिकासऊदी की न्यूक्लियर डील से गायब

सऊदी अरब और अमेरिका ने अगले 30 सालों के लिए असैन्य परमाणु सहयोग समझौते पर दस्तखत किये हैं. यह समझौता अमल में आया तो सऊदी अरब अपने ही देश में यूरेनियम संवर्धन करने में सक्षम होगा. और इसी मुद्दे को लेकर दुनिया इस समझौते का विरोध कर रही है. इस समझौते में अन्तराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी का एडिशनल प्रोटोकॉल शामिल नहीं किया गया है. गोल्ड स्टैंडर्ड भी इस समझौते का हिस्सा नहीं है. ऐसे में सऊदी अरब बिजली के बहाने परमाणु तकनीक का इस्तेमाल किसी भी काम के लिए कर सकता है.

क्या है एडिशनल प्रोटोकॉल? जो अमेरिकासऊदी की न्यूक्लियर डील से गायब

आइए इसी बहाने जानते हैं कि न्यूक्लियर सेफगार्ड्स क्या होते हैं? सऊदी डील में क्यों नहीं है एडिशनल प्रोटोकॉल? परमाणु ऊर्जा आज के समय में बिजली उत्पादन का एक प्रमुख स्रोत है. लेकिन इसके साथ एक बड़ा जोखिम भी जुड़ा है. परमाणु तकनीक का इस्तेमाल शांतिपूर्ण कार्यों के साथसाथ विनाशकारी हथियार बनाने में भी किया जा सकता है. इसी जोखिम को रोकने के लिए न्यूक्लियर सेफगार्ड्स यानी परमाणु सुरक्षा उपायों की व्यवस्था की गई है.

न्यूक्लियर सेफगार्ड्स क्या हैं?

न्यूक्लियर सेफगार्ड्स तकनीकी उपायों का एक सेट है. इन्हें अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी लागू करती है. इनका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी देश शांतिपूर्ण कार्यों के लिए दी गई परमाणु सामग्री या तकनीक का उपयोग परमाणु हथियार बनाने में न करे. जब कोई देश परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर करता है, तो उसे अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के साथ एक सुरक्षा समझौता करना पड़ता है. इसके तहत एजेंसी के निरीक्षक उस देश के परमाणु केंद्रों की जांच करते हैं. वे देखते हैं कि वहां मौजूद यूरेनियम या प्लूटोनियम का हिसाब सही है या नहीं? यह परमाणु दुनिया की एक ऑडिट प्रणाली है.

सऊदी के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान और अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप. फोटो: Getty Images

एडिशनल प्रोटोकॉल क्या है?

एडिशनल प्रोटोकॉल मानक सुरक्षा समझौते का एक उन्नत और अधिक सख्त रूप है. इसे 1990 के दशक में लाया गया था. सामान्य सुरक्षा समझौतों में अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी केवल उन्हीं जगहों की जांच कर सकती है जिनकी जानकारी देश ने खुद दी हो, लेकिन एडिशनल प्रोटोकॉल एजेंसी को बहुत अधिकार देता है. इसके तहत अंतर्राष्ट्रीय एजेंसी के निरीक्षक उस देश में किसी भी ऐसी जगह की औचक जांच कर सकते हैं जहाँ उन्हें परमाणु गतिविधि का संदेह हो.

यह प्रोटोकॉल देशों को अपनी सभी अघोषित परमाणु गतिविधियों की जानकारी देने के लिए बाध्य करता है. इसका मकसद परमाणु हथियारों के गुप्त विकास को पूरी तरह से रोकना है. भारत और अमेरिका सहित दुनिया के अधिकतर देशों ने इस पर हस्ताक्षर किए हैं.

सऊदी अरबअमेरिका का परमाणु डील

सऊदी अरब अपनी अर्थव्यवस्था को तेल पर निर्भरता से हटाकर विविधता लाना चाहता है. इसके लिए उसे बड़ी मात्रा में बिजली की जरूरत है. सऊदी अरब ने अपनी विजन 2030 योजना के तहत परमाणु ऊर्जा संयंत्र बनाने का लक्ष्य रखा है. अमेरिका इस तकनीक को सऊदी अरब को बेचने का इच्छुक है. अमेरिका के कानून के अनुसार, वह केवल उन्हीं देशों के साथ परमाणु सहयोग कर सकता है जो कड़े सुरक्षा मानकों को मानते हैं. सऊदी अरब और अमेरिका के बीच इसी समझौते की शर्तों को लेकर लंबे समय से बातचीत चल रही थी, जो अब समझौते के रूप में दुनिया के सामने है.

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और सऊदी के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान.

एडिशनल प्रोटोकॉल पर विवाद क्यों है?

सऊदी अरब और अमेरिका के बीच समझौते में सबसे बड़ी बाधा एडिशनल प्रोटोकॉल ही है. अमेरिका चाहता है कि सऊदी अरब इस सख्त प्रोटोकॉल को अपनाए, लेकिन सऊदी अरब फिलहाल इसके लिए तैयार नहीं है. इसके पीछे कई राजनीतिक और रणनीतिक कारण हैं. सऊदी अरब का तर्क है कि वह केवल बिजली बनाना चाहता है. लेकिन वह परमाणु तकनीक पर अपने संप्रभु अधिकारों को पूरी तरह से छोड़ना नहीं चाहता. सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने हाल में कहा था कि अगर ईरान परमाणु हथियार बनाता है, तो सऊदी अरब को भी अपनी सुरक्षा के लिए ऐसा ही करना पड़ेगा.

ईरान फैक्टर और क्षेत्रीय राजनीति

सऊदी अरब की रणनीति का एक बड़ा हिस्सा ईरान से जुड़ा है. ईरान सऊदी अरब का क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी है. सऊदी अरब का मानना है कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंध और निगरानी पूरी तरह प्रभावी नहीं रही है. सऊदी अरब चाहता है कि उसके पास भी यूरेनियम संवर्धन की क्षमता हो. संवर्धन वह प्रक्रिया है जिससे परमाणु ईंधन बनाया जाता है. लेकिन अगर यही संवर्धन बहुत ऊंचे स्तर पर किया जाए, तो परमाणु बम का मसाला तैयार हो जाता है. अमेरिका चाहता है कि सऊदी अरब खुद यूरेनियम संवर्धन न करे, बल्कि ईंधन बाहर से खरीदे. सऊदी अरब इस शर्त को अपनी संप्रभुता के खिलाफ मानता है.

क्या है अमेरिका की चुनौती?

अमेरिका के सामने एक बड़ी चुनौती है. अगर वह सऊदी अरब को बिना एडिशनल प्रोटोकॉल के परमाणु तकनीक देता है, तो परमाणु अप्रसार के वैश्विक प्रयास कमजोर होंगे. दूसरे देश भी ऐसी ही छूट की मांग कर सकते हैं. इसे गोल्ड स्टैंडर्ड का उल्लंघन माना जाएगा. दूसरी तरफ, अगर अमेरिका सऊदी अरब को तकनीक नहीं देता है, तो सऊदी अरब रूस या चीन का रुख कर सकता है. रूस और चीन परमाणु तकनीक देने के लिए अक्सर उतनी सख्त शर्तें नहीं रखते जितनी अमेरिका रखता है. ये खबर आप क्विक समाचार में पढ़ रहे हैं। अमेरिका नहीं चाहता कि खाड़ी क्षेत्र में उसका प्रभाव कम हो और चीन की पकड़ मजबूत हो.

वैश्विक सुरक्षा पर इसका क्या पड़ेगा प्रभाव?

सऊदी अरब में परमाणु कार्यक्रम की शुरुआत पूरे मध्य पूर्व की राजनीति को बदल सकती है. अगर सऊदी अरब को कड़ी निगरानी के बिना तकनीक मिलती है, तो तुर्की और मिस्र जैसे देश भी परमाणु महत्वाकांक्षाएं पाल सकते हैं. इससे क्षेत्र में परमाणु हथियारों की दौड़ शुरू होने का खतरा पैदा हो जाएगा. विशेषज्ञों का मानना है कि इससे भारतपाकिस्तान की तरह मध्य पूर्व में भी परमाणु तनाव बढ़ सकता है. इसलिए अंतर्राष्ट्रीय समुदाय सऊदी अरब पर एडिशनल प्रोटोकॉल अपनाने का दबाव बना रहा है.

सऊदी अरब और अमेरिका का परमाणु समझौता केवल बिजली का मामला नहीं है. यह भूराजनीति, सुरक्षा और भरोसे का खेल है. सऊदी अरब अपनी सुरक्षा और क्षेत्रीय बढ़त चाहता है. वहीं अमेरिका चाहता है कि परमाणु तकनीक का प्रसार न हो. भविष्य में इस डील की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि क्या अमेरिका सऊदी अरब को सुरक्षा की कोई ऐसी गारंटी दे पाता है जिससे वह एडिशनल प्रोटोकॉल पर सहमत हो जाए या फिर, सऊदी अरब अपनी संवर्द्धन की जिद छोड़कर ईंधन आयात करने को तैयार होगा. तब तक एडिशनल प्रोटोकॉल इस डील के बीच एक बड़ी दीवार बनकर खड़ा रहेगा. शांतिपूर्ण दुनिया के लिए यह जरूरी है कि परमाणु ऊर्जा का उपयोग केवल मानवता की भलाई के लिए हो. इसके लिए कड़े सुरक्षा उपाय और पारदर्शी जांच प्रणाली ही एक मात्र रास्ता है.

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