जंतरमंतर पर प्रोटेस्ट जारी… हिंसक प्रदर्शन रोकने के लिए कहांकहां से आती है फोर्स? समझें पूरा सिस्टम

जंतरमंतर पर प्रोटेस्ट जारी… हिंसक प्रदर्शन रोकने के लिए कहांकहां से आती है फोर्स? समझें पूरा सिस्टम

इन दिनों नई दिल्ली में जंतरमंतर पर काकरोच जनता पार्टी के कार्यकर्ता, पदाधिकारी आंदोलन कर रहे हैं. पिछले सोमवार को संसद मार्च के दौरान पुलिस ने इन पर सख्ती भी की. लठियां चलीं. आंसू गैस छोड़े गए. दौड़ाकर, गिरकर पीटा गया. चोट आंदोलनकारियों को लगी तो पुलिस वाले भी चोटिल हुए. बीती रात भी आंदोलनकारियों की सुरक्षा बलों से भिड़ंत हुई. इस आंदोलन के समर्थन में सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक भूख हड़ताल पर हैं. प्रशासन ने उन्हें अस्पताल में दाखिल कर रखा है. कहने की जरूरत नहीं है कि लगभग एक महीने से चल रहे इस आंदोलन में बहुत बड़ी संख्या में सुरक्षा बलों की तैनाती है.

जंतरमंतर पर प्रोटेस्ट जारी… हिंसक प्रदर्शन रोकने के लिए कहांकहां से आती है फोर्स? समझें पूरा सिस्टम

आइए, जंतरमंतर आंदोलन के बहाने समझते हैं कि देश के किसी भी कोने में आंदोलन के दौरान सुरक्षा बलों की तैनाती का क्या सिस्टम है? कैसे यह पूरी व्यवस्था संचालित होती है?

भारत में आंदोलन और प्रदर्शन लोकतंत्र का हिस्सा हैं. लोग अपनी मांगों को लेकर सड़क, मैदान, जिला मुख्यालय या राजधानी में जुटते हैं. कई प्रदर्शन शांतिपूर्ण होते हैं. कुछ जगह भीड़ बहुत बड़ी हो जाती है. तब प्रशासन को कानूनव्यवस्था संभालनी पड़ती है. फोर्स केवल एक जगह से नहीं आती. ये खबर आप क्विक समाचार में पढ़ रहे हैं। स्थानीय पुलिस से लेकर केंद्रीय बलों तक कई इकाइयां लग सकती हैं. यह स्थिति, भीड़, स्थान और सुरक्षा जोखिम पर निर्भर करता है. दिल्ली का जंतरमंतर इसका अच्छा उदाहरण है. यहां अक्सर अलगअलग राज्यों से लोग अपनी मांग लेकर आते हैं, इसलिए यहां सुरक्षा और व्यवस्था की तैयारी कई स्तर पर की जाती है.

सबसे पहले आती है स्थानीय पुलिस

किसी भी प्रदर्शन में पहली जिम्मेदारी स्थानीय पुलिस की होती है. जिले की पुलिस स्थिति को समझती है. उसे इलाके की सड़कें, संवेदनशील स्थान और स्थानीय लोगों की जानकारी होती है. यही पुलिस प्रदर्शनकारियों से बात करती है. वह आयोजन की जानकारी लेती है. भीड़ की अनुमानित संख्या देखती है। रूट तय करती है. जरूरत पड़ने पर बैरिकेड लगाती है. थाना पुलिस सबसे पहले मौके पर पहुंचती है. इसके बाद पुलिस लाइन से अतिरिक्त जवान बुलाए जा सकते हैं. जिला पुलिस बल में पुरुष और महिला पुलिसकर्मी दोनों शामिल हो सकते हैं. स्थानीय खुफिया पुलिस भी जिला पुलिस के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलती है.

प्रदर्शन में पहली जिम्मेदारी स्थानीय पुलिस की होती है. फोटो: PTI

यातायात पुलिस की भी बड़ी भूमिका

प्रदर्शन का असर अक्सर यातायात पर पड़ता है. सड़क बंद हो सकती है. लोग पैदल या वाहनों से बड़ी संख्या में पहुंच सकते हैं. ऐसे में ट्रैफिक पुलिस की भूमिका बढ़ जाती है. यही फोर्स रास्ते बदलती है. डायवर्जन लागू करती है. लोगों को वैकल्पिक मार्ग बताती है. एंबुलेंस, स्कूल बस और जरूरी सेवाओं के लिए रास्ता खुला रखने की कोशिश होती है. दिल्ली में जंतरमंतर के आसपास कई महत्वपूर्ण सड़कें हैं. संसद मार्ग, कनॉट प्लेस और अन्य व्यस्त इलाके करीब हैं, इसलिए यहां ट्रैफिक व्यवस्था पहले से बनाई जाती है.

दिल्ली में किसके अधीन है पुलिस?

दिल्ली की पुलिस व्यवस्था बाकी राज्यों से कुछ अलग है. दिल्ली पुलिस केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय के अधीन काम करती है. इसका मतलब है कि कानूनव्यवस्था से जुड़े बड़े फैसलों में केंद्रीय स्तर की भूमिका भी रहती है. जंतरमंतर पर प्रदर्शन की व्यवस्था दिल्ली पुलिस संभालती है. संबंधित जिला पुलिस, विशेष शाखा, ट्रैफिक पुलिस और अन्य इकाइयां मिलकर काम कर सकती हैं. अगर आयोजन बड़ा हो, या सुरक्षा संबंधी इनपुट मिले, तो अतिरिक्त बल भी लगाया जा सकता है. जैसे जंतरमंतर पर केन्द्रीय सुरक्षा बलों की टुकड़ियां बड़े पैमाने पर तैनात हैं.

जंतरमंतर पर प्रदर्शनकारियों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है.

राज्य सशस्त्र पुलिस कब लगती है?

हर राज्य के पास सशस्त्र पुलिस इकाइयां होती हैं. इनके नाम अलगअलग हो सकते हैं. कुछ राज्यों में इन्हें पीएसी, एसएपी, आईआरबी या राज्य रिजर्व पुलिस कहा जाता है. ये जवान सामान्य थाने की पुलिस से अलग होते हैं. इन्हें बड़े जमावड़े, दंगा नियंत्रण, संवेदनशील सुरक्षा ड्यूटी और आपात स्थिति के लिए प्रशिक्षित किया जाता है. जब किसी राज्य में बड़ा आंदोलन होता है, तब जिला पुलिस के साथ राज्य सशस्त्र पुलिस को लगाया जा सकता है. उदाहरण के तौर पर किसान आंदोलन, भर्ती परीक्षा विवाद, औद्योगिक आंदोलन या राजनीतिक रैली के समय ऐसी तैनाती दिख सकती है.

आरएएफ. फोटो: PTI

केंद्रीय सुरक्षा बल कब आते हैं?

कई बार राज्य की अपनी फोर्स पर्याप्त नहीं होती. तब केंद्र से केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों की मदद मांगी जा सकती है. यह मांग राज्य सरकार या संबंधित प्रशासन करता है. अंतिम तैनाती स्थिति और आदेश पर निर्भर करती है. केंद्रीय बल आमतौर पर बड़ी भीड़, हिंसा की आशंका, संवेदनशील इलाकों या लंबे समय तक चलने वाले आंदोलन में लगाए जा सकते हैं. इन बलों की भूमिका राज्य पुलिस की जगह लेना नहीं होती. आमतौर पर वे स्थानीय प्रशासन के साथ समन्वय में काम करते हैं. केन्द्रीय सुरक्षा बलों में भी कई संगठन हैं. सबकी भूमिकाएं तय हैं.

सीआरपीएफ के जवान. फोटो:PTI

सीआरपीएफ की क्या है भूमिका?

केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल, यानी सीआरपीएफ, देश के कई हिस्सों में कानूनव्यवस्था संबंधी ड्यूटी में लगाया जाता है. देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए जिम्मेदार यह बड़ा केंद्रीय बल है. बड़ी रैली, तनावपूर्ण विरोध, चुनावी सुरक्षा या गंभीर कानूनव्यवस्था की स्थिति में सीआरपीएफ की कंपनियां तैनात की जा सकती हैं. इनके जवान भीड़ नियंत्रण और संवेदनशील ड्यूटी का अनुभव रखते हैं. इनकी कुछ बटालियनें देश भर में फैली हैं. केन्द्रीय गृह मंत्रालय राज्यों को कुछ सुरक्षा बल रिजर्व फोर्स के रूप में आवंटित करते हैं. राज्य पुलिस के निर्देश पर इनकी तैनाती आवश्यकतानुसार की जाती है.

रैपिड एक्शन फोर्स क्या करती है?

रैपिड एक्शन फोर्स, यानी आरएएफ, सीआरपीएफ की एक विशेष इकाई है. इसका उपयोग खासतौर पर दंगा नियंत्रण और तनावपूर्ण भीड़ की स्थिति में किया जाता है. आरएएफ के जवान अलग पहचान वाली वर्दी में दिखते हैं. इनका उद्देश्य भीड़ को नियंत्रित करना और हिंसा फैलने से रोकना होता है. इन्हें संवेदनशील परिस्थितियों में त्वरित कार्रवाई के लिए तैयार रखा जाता है. हर प्रदर्शन में आरएएफ नहीं लगती. इसकी तैनाती खतरे के स्तर पर निर्भर करती है. जंतरमंतर पर आरएएफ तैनात की गई है.

देश में कई केंद्रीय बल हैं. फोटो:PTI

दूसरे केंद्रीय बलों की भी तय है भूमिका

देश में कई केंद्रीय बल हैं. इनकी मुख्य जिम्मेदारियां अलगअलग हैं. सीमा सुरक्षा बल, यानी बीएसएफ, मुख्य रूप से सीमाओं की सुरक्षा करता है. भारततिब्बत सीमा पुलिस, यानी आईटीबीपी, हिमालयी सीमाओं से जुड़ी ड्यूटी करती है. सशस्त्र सीमा बल, यानी एसएसबी, भी सीमा क्षेत्रों में काम करता है. केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल, यानी सीआईएसएफ, हवाई अड्डों, मेट्रो, सरकारी प्रतिष्ठानों और महत्वपूर्ण औद्योगिक इकाइयों की सुरक्षा करता है. विशेष परिस्थितियों में इन बलों की कंपनियां कानूनव्यवस्था ड्यूटी के लिए उपलब्ध कराई जा सकती हैं, लेकिन उनका मूल काम अलग होता है. इसलिए हर आंदोलन में इनका उपयोग जरूरी नहीं है.

खुफिया इकाइयों की क्या जिम्मेदारी है?

किसी बड़े प्रदर्शन से पहले खुफिया जानकारी भी जुटाई जाती है. इसका उद्देश्य शांतिपूर्ण प्रदर्शन को रोकना नहीं है. उद्देश्य संभावित जोखिम को समझना है. पुलिस की विशेष शाखा और अन्य सुरक्षा एजेंसियां यह देखती हैं कि हिंसा, अफवाह, भड़काऊ नारे या बाहरी गड़बड़ी की कोई आशंका तो नहीं है. सोशल मीडिया पर फैल रही गलत जानकारी पर भी नजर रखी जा सकती है. अगर खतरे का संकेत मिलता है, तो सुरक्षा व्यवस्था मजबूत की जाती है.

प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती

प्रशासन को दो जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाना होता है. पहली जिम्मेदारी है लोगों के शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार का सम्मान. दूसरी जिम्मेदारी है आम जनता की सुरक्षा और रोजमर्रा की व्यवस्था बनाए रखना. यदि सड़कें पूरी तरह बंद हो जाएं, अस्पताल पहुंचना मुश्किल हो जाए या हिंसा फैलने लगे, तो प्रशासन को हस्तक्षेप करना पड़ता है, लेकिन कार्रवाई संतुलित और आवश्यक सीमा तक ही होनी चाहिए.

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