International Day of Women in Diplomacy 2026: संयुक्त राष्ट्र हर साल अंतर्राष्ट्रीय महिला कूटनीति दिवस मनाता है। यह अवसर विदेश मंत्रालयों, दूतावासों और अंतर्राष्ट्रीय वार्ताओं में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी का जश्न मनाने का है।

हालांकि, यह दिन एक सवाल बारबार उठाता है कि आखिर कूटनीति किसे कहा जाए और किसे एक कूटनीतिक प्रतिनिधि के रूप में मान्यता दी जाए?
दूतावासों से आगे बढ़कर कूटनीति को समझने की जरूरत
जब भी डिप्लोमेसी की बात होती है, तो हमारे मन में सरकार के प्रतिनिधि, औपचारिक समझौते और बंद कमरों में होने वाली बातचीत की तस्वीर दिमाग में उभरती है। इसी सोच ने सालों तक से दूर रखा। काफी समय तक कूटनीति को पुरुषों का क्षेत्र माना गया, लेकिन लीग ऑफ नेशंस के दौर से बहुपक्षीय कूटनीति का विस्तार शुरू हुआ और संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के बाद गैरसरकारी संगठनों और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों के लिए भी वैश्विक मंच खुलने लगे।
सी. बी. मुथम्मा
धर्म से प्रेरित महिलाओं की भूमिका क्यों छिपी रह गई?
संयुक्त राष्ट्र के शुरुआती इतिहास को अक्सर एक पूरी तरह धर्मनिरपेक्ष परियोजना के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। लेकिन यह दृष्टिकोण पूरी तरह से सच नहीं है। शीत युद्ध केवल राजनीतिक संघर्ष नहीं था, बल्कि इसमें धार्मिक, नैतिक और वैचारिक मतों की भी अहम भूमिका थी। इन विचारधाराओं ने कई देशों के गठबंधन, कूटनीति, विकास नीति और सॉफ्ट पावर को प्रभावित किया।
इतिहास में धार्मिक सोच रखने वाली महिलाओं की आवाज को दबा दिया गया। इतिहासकार लॉरेल थैचर उलरिच की एक बहुत ही फेमस लाइन है कि “अच्छा व्यवहार करने वाली महिलाएं शायद ही इतिहास रचती हैं”। वहीं इतिहासकार जोन स्कॉट ने ‘सेक्सुलरिज्म’ की धारणा को मानते हुए कहा कि लैंगिक समानता को केवल धर्मनिरपेक्ष समाज से जोड़कर देखा जाता है। आज भी धर्म, शासन और महिलाओं की भागीदारी को लेकर बहस जारी है। फिर चाहे वेटिकन में महिलाओं की भूमिका हो या फिर आदिवासी महिलाओं की आध्यात्मिक नेतृत्व क्षमता हो।
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घर की जिम्मेदारियों से वैश्विक नेतृत्व तक का सफर
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद महिलाओं के अधिकारों और सामाजिक सक्रियता में बड़ा बदलाव आया। शीत युद्ध के बाद दुनिया तेजी से बदली। ये खबर आप क्विक समाचार में पढ़ रहे हैं। यूरोप के विकास के साथ शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक कार्य जैसे क्षेत्रों में प्रशिक्षित लोगों की मांग बढ़ी। इसी दौरान महिलाओं को सामाजिक और नैतिक मुद्दों की विशेषज्ञ के रूप में देखा जाने लगा। खासकर अंतर्राष्ट्रीय कैथोलिक संगठनों से जुड़ी महिलाओं को। उन्होंने स्थानीय समुदाय और अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं के बीच सेतु का काम किया। उन्होंने प्रतिनिधि, पर्यवेक्षक, विशेषज्ञ और विभिन्न अंतरराष्ट्रीय संगठनों की अध्यक्ष के रूप में भी काम किया।
इतिहास को लैंगिक नजरिए से पढ़ने की जरूरत
इन महिलाओं की भूमिका को समझने के लिए इतिहास को लैंगिक दृष्टिकोण से पढ़ना जरूरी है। सरकारी और धार्मिक फाइलों में केवल उन्हीं लोगों का जिक्र मिलता है, शीर्ष नेतृत्व और पुरुष अधिकारियों पर केंद्रित रहे हैं, लेकिन व्यक्तिगत पत्रों, दस्तावेजों और निजी अभिलेखों के अध्ययन से पता चलता है कि महिलाओं ने फैसले लिए, नेटवर्क बनाए और खासकर शीत युद्ध के दौरान अंतर्राष्ट्रीय नीतियों को प्रभावित करने में अहम भूमिका निभाई।
बेगम शाहिस्ता
संयुक्त राष्ट्र की स्थापना में भी थीं कैथोलिक महिलाएं
आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि 1945 में सैन फ्रांसिस्को में संयुक्त राष्ट्र की स्थापना सम्मेलन में आम महिलाएं शुरुआती गैरसरकारी प्रतिनिधि के तौर पर शामिल थी।
इनमें कैथरीन शेफर, जाडविगा डी रोमर, क्रिस्टीन डी हेम्प्टिन, मारिया बेयर्स, फ्रांस्वा डी सेंट मॉरिस, पिया कोलिनीलोम्बार्डी, मार्गा क्लोम्पे, बारबरा वार्ड और अल्बा जिज्जामिया जैसी प्रमुख महिलाओं का नाम शामिल है। ये महिलाएं केवल दर्शक नहीं थीं, बल्कि के निर्माण में सक्रिय भूमिका निभा रही थीं। अंतर्राष्ट्रीय महिला कूटनीति दिवस केवल वर्तमान में महिलाओं की उपलब्धियों का उत्सव नहीं है, बल्कि उन महिलाओं को भी याद करने का अवसर है, जिनके योगदान को इतिहास में पर्याप्त स्थान नहीं मिला।