शाहजहां बड़े बेटे दारा पर मेहरबान थे, तो दूसरी तरफ़ औरंगज़ेब पिता की हिमायत हासिल करने के लिए अपने को दारा से बेहतर साबित करने की पुरजोर कोशिश में जुटा हुआ था. दारा की शादी में 1633 में शाहजहां ने बत्तीस लाख खर्च कर मुगल खानदान की तमाम शादियों की शानशौकत को पीछे छोड़ दिया था. उधर औरंगज़ेब ने इस शादी के चंद महीने बाद एक बड़े हाथी को मुकाबले में धूल चटा दी. शाहजहां उसकी बहादुरी का कायल हुआ. लेकिन दरबार में दारा ही पिता के नजदीक बना रहा. दूसरी तरफ औरंगज़ेब को लगातार आगरा से दूर दूसरी जगहों की जिम्मेदारियों और युद्धों में व्यस्त रखा गया.

औरंगज़ेब को हमेशा इसकी कसक बनी रही. हालांकि युद्ध अभियानों के अनुभवों ने गद्दी की लड़ाई में भाइयों पर जीत में उसकी मदद की. पिता शाहजहां को कैद कर उसने अपनी उपेक्षा का हिसाब भी चुकता किया. पढ़िए बादशाह औरंगज़ेब से जुड़े कुछ किस्से.
कम उम्र से ही गद्दी की ललक
कम उम्र में ही शाहजहां के बेटों दारा, औरंगज़ेब, मुराद और शुजा की तख्तएताउस को लेकर खींचतान शुरू हो गई थी. शुरुआत से ही शाहजहां अपने बड़े बेटे दारा शिकोह से ज्यादा लगाव रखता था. दारा की विद्वत्ता और व्यवहार ने उसे काफी प्रभावित किया था. अधिकतर समय दारा को अपने निकट रखकर राजकाज के मामलों से वाकिफ़ कराने की शाहजहां की कोशिशों ने दरबारियों के बीच यह संदेश दे दिया था कि आगे गद्दी दारा को ही हासिल हाेगी. लेकिन दारा के तीन भाइयों के लिए इसे कुबूल करना आसान नहीं था.
मुगल बादशाह औरंगजेब.
असल में मुगलों में सबसे बड़ी संतान के स्वाभाविक उत्तराधिकारी होने जैसी परंपरा नहीं थी. वे इस रिवाज को मानते थे कि सियासी ताक़त हासिल करने के मामले में खानदान का हर शख़्स बराबर का हकदार होगा. अकबर ने इस रिवाज को खानदान के सभी सदस्यों की जगह बादशाह के बेटों के बीच समेट दिया. जाहिर है कि ऐसे में शाहजहां के बेटों के लिए अपने हुनर और ताकत के जोर पर गद्दी का हकदार साबित करने का मौका था.
शाहजहां शुरू से दारा के हक में
उत्तराधिकार की इस खींचतान में शाहजहां साफ तौर पर बड़े बेटे दारा शिकोह की हिमायत में था. दारा से जुड़े हर मसले में शाहजहां बाकी बेटों की तुलना में उसके प्रति उदार रहा. 1633 में दारा की पहली शादी की शानओशौकत और उसमें हुए बेहिसाब खर्च ने इसे मुगल खानदान की यादगार शादी बना दिया. इसमें बत्तीस लाख रुपया खर्च हुआ था , जो उस दौर की बहुत बड़ी रकम थी.
मुगल बादशाह शाहजहां ने बेटे औरंगजेब को आगरा से दूर रखा.
यूरोपीय यात्री पीटर मुंडे के मुताबिक इस शादी की चकाचौंध ने चश्मदीदों को दांतों तले उंगली दबाने को मजबूर कर दिया. इस मौके की आतिशबाज़ी से आगरा का आसमान अट गया. इंग्लैंड के विंडसर पैलेस में उपलब्ध शाहजहां का रोजनामचा “पादशाहनामा” में इस शादी की रौनक और रंगत के ब्यौरे दर्ज हैं. शाहजहां ने अपने पसंदीदा बेटे की शादी की खुशियां मनाने के लिए खजाने का मुंह खोल दिया था और खूब सौगातें बांटीं थीं.
हाथी को हरा दिलेरी का दिया सबूत
इस शादी के समय औरंगज़ेब सिर्फ चौदह साल का था. वो भी चाहता था कि पिता शाहजहां उसकी ओर भी ध्यान दें. चंद महीनों के भीतर उसे इसका मौका भी मिल गया. हाथियों की लड़ाई देखना शाही खानदान को काफी पसंद था. आपस में लड़ने वाले हाथियों को हिंदी नाम दिए जाते थे.
सुधाकर और सूरतसुंदर नाम के दो विशाल हाथी आमनेसामने थे. दारा की इसमें दिलचस्पी नहीं थी. वह मौके पर भी नहीं था. घोड़ों पर सवार बाकी तीन भाई औरंगज़ेब, शुजा और मुराद लड़ाई को नजदीक से देखने के लिए उनका पीछा कर रहे थे. अचानक सुधाकर नामक हाथी बिगड़ा और औरंगज़ेब पर उसने हमला कर दिया. जवाब में औरंगज़ेब ने उसके सिर पर वार किया , जिसने उसे और क्रुद्ध कर दिया. वह औरंगज़ेब के घोड़े को कुचलते हुए आगे बढ़ा. शाहजहां के दरबारी शायर अबू तालिब ने लिखा, ” औरंगज़ेब की बरछी बिजली की मानिंद चमकी और सुधाकर के सिर पर टूट पड़ी. बरछी के असर से हाथी ऐंठ गया और उसके पागलपन का खुमार थम गया.
दारा शिकोह.
बहादुरी के ईनाम में दरबार से दूर की जिम्मेदारियां
शाहजहां ने औरंगज़ेब की दिलेरी की दाद दी. उसे अपने से जुड़े 1610 के उस वाकये की याद आई, जब पिता जहांगीर की मौजूदगी में एक बेकाबू शेर को उसने मार दिया था. औरंगज़ेब की इस बहादुरी ने शाहजहां को उसे दरबार में पास रखने की जगह दूसरी जिम्मेदारियां के निर्वाह और युद्धों की अगुवाई के लिए आगरा से दूर भेजने के लिए प्रेरित किया. 1635 से 1657 के बीच के 22 साल औरंगज़ेब का सफ़र मुगल सल्तनत की हिफाज़त या उसके विस्तार के बीच बीता. इस दौरान उसने बल्ख , बुंदेलखंड और कांधार की जंग लड़ीं और गुजरात, मुल्तान और दक्कन की हुकूमतें सम्भालीं. औरंगज़ेब जंग के मैदान से लेकर सूबों की हुकूमत तक के मसलों में लगातार अपनी काबिलियत साबित करता रहा लेकिन आगरा दिल्ली दरबार से दूर रखने के पिता शाहजहां के फैसले उसे चुभते रहे.
हीराबाई से इश्क ने किया बेहाल
कम उम्र में बड़ी जिम्मेदारियों और कठिन अभियानों में जुटा दिए गए औरंगज़ेब आमतौर पर शाही ठाठबाट और आशिक़ी के लुत्फ़ से दूर रहा. इसकी वजह उसका मिज़ाज था. लेकिन 1653 में ऐसा मौका आया जब आम तोड़ती हीराबाई जैनाबादी को देख उस पर मरमिटा. वह बुरहानपुर अपनी मामी के यहां गया हुआ था. गायिका और नर्तकी हीराबाई के रूपयौवन का उस पर ऐसा जादू चला कि पहली ही नज़र में उसके इश्क में वह गिरफ्तार हो गया.
उसके कदमों में औरंगज़ेब ने अपना सिर रख दिया और ताउम्र शराब न छूने की कसम हीराबाई के कहने पर तोड़ दी. हालांकि कुछ इतिहासकारों के मुताबिक शराब का प्याला औरंगज़ेब के होठों तक पहुंचा लेकिन इसके पहले कि वह चखे, हीराबाई ने उसे रोक दिया. आम तौर पर खुश्क जिंदगी गुजारने वाले औरंगज़ेब की जिंदगी में इश्क के ये रंग ज्यादा दिन नहीं चढ़ सके, क्योंकि साल भर के भीतर ही हीराबाई चल बसी. उसे औरंगाबाद में दफ़नाया गया. इतिहासकारों की राय में अगर हीराबाई का जीवन लंबा होता, तो मुमकिन है कि औरंगज़ेब की शख्सियत का अधिक मानवीय और कोमल पक्ष दिखाई देता. किंतु उसके हीराबाई के निधन के बाद औरंगज़ेब का वही कठोर, धार्मिक और अनुशासनप्रिय व्यक्तित्व इतिहास के पन्नों पर स्थायी रूप से दर्ज हो गया.
हुकूमत के शुरुआती वे दस साल !
पिता शाहजहां की जिंदगी में उसने गद्दी के लिए खूनी लड़ाइयां लड़ीं. अन्य दावेदार तीनों भाइयों को रास्ते से हटाया. पिता को कैद किया. ये खबर आप क्विक समाचार में पढ़ रहे हैं। उसे निरंकुश शासक के तौर पर याद किया जाता है. हिंदुओं पर जजिया कर थोपने और मंदिरों के ध्वंस के कारण मुगल वंश के शासकों में उसकी सबसे ज्यादा आलोचना होती है. लेकिन आड्रे ट्रशके अपनी किताब ” औरंगज़ेब सच्चाई और गल्प” में लिखते हैं, “मुगल हुकूमत के तख्त पर क़ाबिज़ होने के शुरुआती दस सालों में औरंगज़ेब उन रिवाज़ों का हामी रहा, जो हिंदू रीतियों से लिए गए थे. वह हर रोज महल के झरोखे से रियाया को दर्शन देता था. सौर और चंद्र पंचांग के मुताबिक अपने जन्मदिन पर वजन के बराबर सोनाचांदी आदि दान करता था. वास्तविकता में यह हिंदुओं की तुलादान परम्परा है ,जिसे अकबर के समय से मुगलों ने अपनाया था. इस दौरान वह संगीत में भी रुचि रखता था. बख्तावर खान ने तो उसे माहिर फनकार भी लिखा है. लेकिन अगले दशकों में उसने हिंदू परंपराओं से प्रेरित दरबारी रिवाजों से छुटकारा ले लिया. संगीत सहित अन्य विधाओं से जुड़े फनकारों को शाही संरक्षण देना बंद कर दिया. इसी के साथ दरबार का माहौल रुखा और औरंगज़ेब का रवैया सख्त होता गया.
ज्योतिषियों की सलाह बिना एक कदम नहीं
दिलचस्प है कि हुकूमत और उसके इंतजामों को लेकर बेहद व्यावहारिक रुख रखने वाले औरंगज़ेब को ज्योतिषियों पर खासा भरोसा था. इतालवी यात्री गेमिली करारे के अनुसार औरंगज़ेब ज्योतिषियों से सलाह बिना कोई बड़ा फैसला नहीं लेता था. हालांकि ऐसे भी मौके आए जब उसने उनकी राय पर अपने तरीके से अमल किया. 1707 में उसके निधन के पहले एक ज्योतिषी का सुझाव था कि हीरा और एक हाथी का दान करके बादशाह बीमारी से निज़ात पा सकते हैं. औरंगज़ेब ने इसकी जगह चार हजार रुपए गरीबों के बीच बंटवा दिए.
क्या आखिरी दिनों में औरंगज़ेब की हिंदू धर्म और उसके ग्रंथों के प्रति सोच में कुछ बदलाव आया था ? आड्रे ट्रशके की किताब दावा करती है कि 1690 में चंद्रमन नामक शायर ने ” नरगिस्तान ” नाम से रामायण का फारसी संस्करण और 1705 में अमर सिंह ने रामायण का गद्य संस्करण ” अमर प्रकाश ” औरंगज़ेब को समर्पित किया. लेखक का कहना है कि आख़िरी दिनों में औरंगज़ेब भी अपने पुरखों द्वारा अपनाई गई हिंदू रवायतों से दूर नहीं रह सका.