हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी : बिना ठोस आधार के एहतियाती हिरासत के आदेश अस्वीकार्य, केंद्र से मांगा हस्तक्षेप

हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी : बिना ठोस आधार के एहतियाती हिरासत के आदेश अस्वीकार्य, केंद्र से मांगा हस्तक्षेप
हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी : बिना ठोस आधार के एहतियाती हिरासत के आदेश अस्वीकार्य, केंद्र से मांगा हस्तक्षेप

प्रयागराज। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एनडीपीएस मामलों में बिना पर्याप्त आधार और विवेकपूर्ण विचार के एहतियाती हिरासत के आदेश जारी किए जाने पर कड़ी नाराजगी जताई है। अदालत ने कहा कि केवल औपचारिकता निभाकर ऐसे आदेश पारित करना कानून की मंशा के विपरीत है और केंद्र सरकार को इस तरह की प्रवृत्ति पर जल्द अंकुश लगाने के लिए प्रभावी कदम उठाने चाहिए।

न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने गुरमेल सिंह की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका स्वीकार करते हुए उसे एहतियाती हिरासत में रखने का आदेश निरस्त कर तत्काल रिहा करने का निर्देश दिया।

याचिकाकर्ता गुरमेल सिंह एनडीपीएस अधिनियम के एक मामले में पहले से न्यायिक हिरासत में था। इसके बावजूद 2 जनवरी 2026 को उसके खिलाफ एहतियाती हिरासत का आदेश जारी कर दिया गया। अदालत ने पाया कि हिरासत के आधारों में केवल यह उल्लेख किया गया कि वह जमानत पाने का प्रयास कर रहा है, लेकिन संबंधित अधिकारी यह साबित करने के लिए कोई ठोस सामग्री या रिकॉर्ड प्रस्तुत नहीं कर सके कि उसके जल्द जमानत पर रिहा होने की वास्तविक संभावना थी।

सिर्फ औपचारिकता निभाना पर्याप्त नहीं : हाईकोर्ट

अदालत ने कहा कि जब कोई व्यक्ति पहले से न्यायिक हिरासत में है, तब एहतियाती हिरासत का आदेश जारी करने के लिए यह दिखाना आवश्यक है कि उसकी रिहाई की निकट संभावना है और रिहा होने के बाद उसके दोबारा आपराधिक गतिविधियों में शामिल होने की आशंका के पर्याप्त आधार मौजूद हैं। ये खबर आप क्विक समाचार में पढ़ रहे हैं। खंडपीठ ने टिप्पणी की कि राज्य सरकार ने कानून की अनिवार्य शर्तों का केवल सतही पालन किया और बिना ठोस कारणों के यह निष्कर्ष निकाल लिया कि याचिकाकर्ता को तस्करी जैसी गतिविधियों से रोकने के लिए हिरासत में रखना जरूरी है।

31 जुलाई के फैसले में महत्वपूर्ण टिप्पणी

31 जुलाई को दिए गए अपने फैसले में अदालत ने स्पष्ट किया कि “विश्वास करने का कारण” केवल विश्वसनीय और ठोस साक्ष्यों पर आधारित होना चाहिए। साथ ही यह भी आवश्यक है कि संबंधित अधिकारी के पास यह ठोस आधार हो कि जेल से रिहा होने पर व्यक्ति अपनी स्वतंत्रता का दुरुपयोग कर आपराधिक गतिविधियों में शामिल हो सकता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *