
जन्म के बाद बच्चे के जीवन की पहली जरूरत क्या है? इसका सबसे सरल और प्राकृतिक उत्तर हैमां का दूध। यह केवल नवजात की भूख मिटाने वाला आहार नहीं, बल्कि पोषण, प्रतिरक्षा, विकास, सुरक्षा और मांबच्चे के भावनात्मक संबंध की पहली कड़ी है। आज आधुनिक चिकित्सा विज्ञान पहले छह महीने तक केवल स्तनपान की सलाह देता है। दूसरी ओर, आयुर्वेद में भी स्तन्य को शिशु के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है तथा प्रसव के बाद मां के आहार, दिनचर्या, मानसिक स्थिति और समुचित देखभाल को स्तन्य की स्थिति से जोड़ा गया है। इसलिए स्तनपान को केवल एक महिला की व्यक्तिगत जिम्मेदारी मानने के बजाय इसे परिवार, समाज और स्वास्थ्य व्यवस्था की साझा जिम्मेदारी के रूप में देखना जरूरी है।
पहला दूध पीला है तो खराब नहीं, बेहद खास है
बच्चे के जन्म के बाद निकलने वाला पहला गाढ़ा और पीला दूध कोलोस्ट्रम कहलाता है। इसकी मात्रा सामान्य दूध की तुलना में कम होती है, लेकिन नवजात की जरूरत के अनुसार यह अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। कोलोस्ट्रम में प्रतिरक्षा संबंधी तत्व, प्रोटीन तथा अनेक जैवसक्रिय घटक होते हैं, जो नवजात की संक्रमण से रक्षा करने और उसकी आंतों के विकास में सहायता करते हैं। इसलिए पुराने समय में प्रचलित यह धारणा कि “पीला दूध खराब होता है और इसे निकालकर फेंक देना चाहिए”, वैज्ञानिक रूप से गलत है। कोलोस्ट्रम बच्चे का पहला प्राकृतिक सुरक्षा कवच है। जन्म के बाद जितनी जल्दी संभव हो, मां और बच्चे के बीच त्वचा से त्वचा का संपर्क तथा स्तनपान शुरू करना लाभकारी माना जाता है।
क्या कहता है आयुर्वेद
आयुर्वेद में स्तन्य को नवजात के पोषण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। चरक संहिता तथा अन्य आयुर्वेदिक ग्रंथों में स्तन्य की उत्पत्ति, उसके गुण तथा स्तन्य की स्थिति से संबंधित अवधारणाओं का वर्णन मिलता है। आयुर्वेद की दृष्टि में केवल दूध की मात्रा ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि स्तनपान कराने वाली माता का समग्र स्वास्थ्य भी महत्वपूर्ण है। माता का आहार, पाचन शक्ति, निद्रा, मानसिक स्थिति तथा प्रसवोत्तर दिनचर्या उसके स्वास्थ्य और स्तन्यपान के अनुभव को प्रभावित कर सकते हैं। यही कारण है कि आयुर्वेद में प्रसव के बाद माता की विशेष देखभाल की अवधारणा मिलती है, जिसे सूतिका परिचर्या कहा जाता है। आधुनिक चिकित्सा और आयुर्वेद के दृष्टिकोण को साथ रखकर देखें, तो संदेश स्पष्ट हैस्वस्थ मां ही सफल स्तनपान की मजबूत आधारशिला है।
स्तनपान कराने वाली मां क्या खाए?
स्तनपान कराने वाली माँ को किसी एक विशेष खाद्य पदार्थ पर निर्भर रहने के बजाय संतुलित और पौष्टिक भोजन लेना चाहिए। भोजन में पर्याप्त प्रोटीन, ऊर्जा, फल, सब्जियां, अनाज, दालें, दूध या उपयुक्त विकल्प तथा पर्याप्त तरल पदार्थ शामिल होने चाहिए।
आयुर्वेदिक परंपरा में प्रसवोत्तर काल में सुपाच्य, ताजा और गर्म भोजन को प्राथमिकता दी जाती है। शतावरी, विदारीकंद, यष्टिमधु, जीरक, सौंफ, मेथी और शाली चावल जैसे कुछ द्रव्यों का पारंपरिक रूप से उपयोग प्रसूता के आहार में किया जाता रहा है। कुछ द्रव्यों को स्तन्यजनन अर्थात galactagogue के रूप में भी वर्णित किया गया है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हर माँ को स्वयं से कोई आयुर्वेदिक औषधि या चूर्ण लेना शुरू कर देना चाहिए। स्तन्यवर्धक औषधियों का उपयोग व्यक्ति की प्रकृति, अग्नि, प्रसवोत्तर स्थिति, अन्य दवाओं और स्वास्थ्य समस्याओं को ध्यान में रखकर योग्य आयुर्वेद चिकित्सक की सलाह से ही करना चाहिए।
क्या ज्यादा पानी पीने से दूध बढ़ता है
स्तन्य की पर्याप्तता किसी एक खाद्य पदार्थ या केवल अधिक पानी पीने से निर्धारित नहीं होती। पर्याप्त और संतुलित आहार, उचित आराम, मानसिक शांति और सबसे महत्वपूर्णबच्चे को बारबार और सही तकनीक से स्तनपान करानादूध बनने की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। मां को जबरदस्ती अत्यधिक भोजन या पानी देने के बजाय उसकी भूख, प्यास और स्वास्थ्य के अनुसार संतुलित आहार देना चाहिए। आयुर्वेद में अग्नि और पाचन शक्ति को विशेष महत्व दिया गया है। इसलिए अत्यधिक तलाभुना, बहुत भारी या अपाच्य भोजन लेने के बजाय सुपाच्य और पौष्टिक भोजन को प्राथमिकता देना अधिक उचित है।
स्तनपान को सफल बनाने के लिए पांच बातें याद रखें
n जन्म के बाद जितना जल्दी संभव हो स्तनपान शुरू करें।
n पहले छह महीने तक केवल मां का दूध दें, यदि कोई चिकित्सकीय बाधा न हो।
n बच्चे को मांग के अनुसार और सही तकनीक से स्तनपान कराएं।
n मां को संतुलित पौष्टिक आहार, पर्याप्त आराम और भावनात्मक सहयोग दें।
n दूध कम होने या किसी अन्य समस्या की आशंका में स्वयं से दवा लेने के बजाय विशेषज्ञ से सलाह लें।
मां को भी मिलता है स्वास्थ्य लाभ
स्तनपान का लाभ केवल बच्चे को नहीं मिलता। स्तनपान के दौरान ऑक्सीटोसिन हार्मोन का स्राव प्रसव के बाद गर्भाशय के संकुचन में सहायता करता है और प्रसवोत्तर रक्तस्राव को कम करने में योगदान कर सकता है। लंबे समय तक स्तनपान कराने का संबंध मां में स्तन एवं डिम्बग्रंथि के कैंसर के कम जोखिम से भी पाया गया है। इसके अलावा, बच्चे को गोद में लेकर स्तनपान कराने से मां और शिशु के बीच भावनात्मक संबंध मजबूत होता है।
‘दूध कम है’ हर बार यह सच नहीं
कई नई माताएं बच्चे के बारबार दूध मांगने को दूध की कमी समझ लेती हैं। वास्तव में नवजात का पेट छोटा होता है और शुरुआती दिनों में उसका बारबार स्तनपान करना सामान्य हो सकता है। दूध की पर्याप्तता का आकलन केवल इस आधार पर नहीं किया जाना चाहिए कि बच्चा कितनी बार दूध मांग रहा है। बच्चे का वजन बढ़ना, पर्याप्त पेशाब होना, सक्रिय रहना और चिकित्सकीय रूप से संतोषजनक विकास अधिक महत्वपूर्ण संकेत हैं। यदि बच्चे का वजन नहीं बढ़ रहा हो, वह बहुत सुस्त हो, ठीक से दूध न पी रहा हो या मां को स्तनपान में लगातार कठिनाई हो रही हो, तो चिकित्सकीय सलाह आवश्यक है।
सही तकनीक से भी बढ़ती है सफलता
कई बार समस्या दूध की मात्रा में नहीं, बल्कि बच्चे के सही तरीके से स्तन से जुड़ने में होती है।
बच्चे का मुंह केवल निप्पल पर नहीं, बल्कि एरिओला के पर्याप्त हिस्से पर होना चाहिए। बच्चे को मां के शरीर के करीब और आरामदायक स्थिति में रखकर स्तनपान कराया जाना चाहिए।
यदि लगातार निप्पल में दर्द या घाव, स्तन में अत्यधिक दर्द या लालिमा, बुखार, अथवा बच्चे का वजन पर्याप्त न बढ़ना जैसी समस्या हो तो स्तनपान विशेषज्ञ, बाल रोग विशेषज्ञ या स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ से परामर्श लेना चाहिए।
आयुर्वेद और आधुनिक विज्ञान का संदेश
आयुर्वेद ने प्रसूता के आहारविहार, मानसिक स्वास्थ्य और स्तन्य के महत्व पर प्राचीन काल से विचार किया है। आधुनिक विज्ञान ने स्तनपान के पोषणात्मक, प्रतिरक्षात्मक और विकासात्मक लाभों को वैज्ञानिक शोध के माध्यम से स्पष्ट किया है। आज जरूरत किसी एक पद्धति को दूसरी के सामने खड़ा करने की नहीं, बल्कि सुरक्षित, प्रमाणआधारित और समग्र मातृ एवं शिशु देखभाल को अपनाने की है। स्तनपान कराने वाली हर मां को सही जानकारी, सम्मान और सहयोग मिलना चाहिए। क्योंकि माँ का दूध सिर्फ भोजन नहीं, बच्चे के जीवन की पहली सुरक्षा है। याद रखें जन्म के बाद जितना जल्दी संभव हो स्तनपान शुरू करें। पहले छह महीने तक केवल मां का दूध दें। छह महीने के बाद पौष्टिक पूरक आहार के साथ स्तनपान जारी रखें। मां को पौष्टिक आहार, पर्याप्त आराम और भावनात्मक सहयोग दें। स्तनपान या औषधियों से संबंधित समस्या होने पर योग्य चिकित्सक से परामर्श लें।
मां का मन भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना उसका भोजन
n स्तनपान केवल शरीर की प्रक्रिया नहीं है। इसमें मां की मानसिक स्थिति की भी महत्वपूर्ण भूमिका है।
n प्रसव के बाद नींद की कमी, थकान, चिंता, पारिवारिक दबाव और बच्चे के स्वास्थ्य को लेकर डर मां के आत्मविश्वास को प्रभावित कर सकते हैं।
n आयुर्वेद में मन और शरीर के परस्पर संबंध को विशेष महत्व दिया गया है। इसलिए प्रसूता को शांत वातावरण, पर्याप्त आराम, भावनात्मक सुरक्षा और परिवार का सहयोग मिलना चाहिए।
n बारबार यह कहना कि “तुम्हारा दूध कम है”, “बच्चा भूखा है” या “तुम ठीक से दूध नहीं पिला रही हो” मां का आत्मविश्वास कम कर सकता है। इसके बजाय परिवार को कहना चाहिए “तुम अच्छा कर रही हो, हम तुम्हारे साथ हैं।” कभीकभी यही भावनात्मक सहयोग स्तनपान के अनुभव को पूरी तरह बदल देता है।
बच्चे के लिए मां के दूध के फायदे
मां का दूध शिशु की आवश्यकताओं के अनुरूप प्राकृतिक पोषण प्रदान करता है। स्तनपान से
n शिशु की प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत होने में सहायता
मिलती है।
n दस्त और श्वसन संक्रमण जैसे संक्रमणों के जोखिम को कम करने में मदद मिलती है।
n स्वस्थ वृद्धि और विकास को समर्थन मिलता है।
n मां और बच्चे के बीच भावनात्मक जुड़ाव बढ़ता है।
n आगे के जीवन में अधिक वजन तथा कुछ गैरसंचारी रोगों के जोखिम को कम करने में योगदान मिल सकता है।
डॉ. निधि मोहनपुरिया एम.एस. ये खबर आप क्विक समाचार में पढ़ रहे हैं। , प्रसूति तंत्र एवं स्त्री रोग, सहायक प्रोफेसर एवं परामर्शदाता
रोहिलखंड आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज एवं हॉस्पिटल, बरेली