
दुनिया में इंसानों ने अपनी जिद और काबिलियत के दम पर कई ऐसे कमाल किए हैं, जो नामुमकिन लगते हैं. ऐसा ही एक कारनामा आज से करीब 125 साल पहले इक्वाडोर के खतरनाक एंडीज पहाड़ों पर किया गया था. यहां एक ऐसा रेलवे ट्रैक बनाया गया, जिसे आज भी दुनिया का सबसे मुश्किल और खतरनाक रेलवे ट्रैक माना जाता है. इस ट्रैक का नाम डेविल्स नोज यानी शैतान की नाक है. ये खबर आप क्विक समाचार में पढ़ रहे हैं। इस ट्रैक की कहानी जितनी रोमांचक है, उतनी ही डरावनी भी है, क्योंकि इसे बनाने के लिए इंसानों को प्रकृति के साथ-साथ एक ऐसे खौफ से लड़ना पड़ा, जिसे लोग शैतान का श्राप मानते थे.
बात साल 1895 की है, जब इक्वाडोर के राष्ट्रपति जनरल एलोय अल्फारो ने सत्ता संभालते ही एक बड़ा ऐलान किया. उन्होंने देश के तटीय शहर गुआयाकिल को पहाड़ों पर बसी राजधानी क्विटो से रेलवे लाइन के जरिए जोड़ने की बात कही. इस ऐलान के बाद देश में उनका भारी विरोध हुआ. नेताओं से लेकर आम जनता तक, सबका मानना था कि विशाल और ऊंचे एंडीज पहाड़ों को चीरकर ट्रेन ले जाना बिल्कुल नामुमकिन है. लेकिन राष्ट्रपति अल्फारो अपनी जिद के पक्के थे. उन्होंने विरोध प्रदर्शनों की परवाह न करते हुए अमेरिका के कुछ बड़े ठेकेदारों को काम पर रख लिया और उन्हें दुनिया का सबसे कठिन रेलवे ट्रैक बनाने का काम सौंप दिया. इसके बाद साल 1899 में इस ऐतिहासिक रेल लाइन का काम शुरू हुआ.
जहरीले सांप, जगुआर और भयंकर बीमारियां
पहाड़ों पर इस रेलवे लाइन को बिछाना कोई बच्चों का खेल नहीं था. काम शुरू होते ही मजदूरों और इंजीनियरों का सामना लगातार आने वाले भूकंप के झटकों, भारी बारिश, घने जंगलों में घूमने वाले खूंखार जगुआर और जहरीले सांपों से हुआ. इतना ही नहीं, मलेरिया और पीला बुखार (येलो फीवर) जैसी घातक बीमारियों ने काम को बहुत धीमा कर दिया. लेकिन इस पूरे रास्ते का सबसे खतरनाक हिस्सा अलाउसी और सिबाम्बे के बीच खड़ी एक 800 मीटर ऊंची सीधी चट्टान था, जिसे डेविल्स नोज कहा जाता था.
इस सीधी खड़ी चट्टान पर ट्रेन चढ़ाने के लिए इंजीनियरों ने एक अनोखा ‘जिग-जैग’ (Switchback) तरीका निकाला. ट्रेन को 3.5% की सीधी ढलान पर चढ़ाने के लिए ट्रैक को ऐसे काटा गया कि ट्रेन पहले आगे जाती, फिर एक जगह रुकती. इसके बाद ट्रेन का गार्ड नीचे उतरकर ट्रैक का लीवर बदलता और ट्रेन उल्टी दिशा में (रिवर्स होकर) ऊपर की तरफ चढ़ती. फिर यही प्रक्रिया दोबारा दोहराई जाती. इस तरह आगे-पीछे करते हुए ट्रेन इस जानलेवा चट्टान को पार करती थी.
शैतान का श्राप और 2000 मजदूरों की मौत!
उस दौर में स्थानीय लोगों के बीच यह बात फैल गई थी कि इस पहाड़ी पर खुद शैतान का वास है. लोग कहते थे कि शैतान नहीं चाहता कि उसके इलाके में कोई ट्रेन चले, इसलिए जो भी यहां काम करेगा उसे अपनी जान से हाथ धोना पड़ेगा. लोगों का यह डर सच साबित होता दिखा. इस खतरनाक ट्रैक को पूरा करते-करते बीमारी, हादसों और खराब मौसम की वजह से 2,000 से ज्यादा मजदूरों की मौत हो गई. इन मरने वालों में जमैका से लाए गए मजदूर, आजादी के लालच में काम पर लगाए गए सैकड़ों कैदी और खुद इस प्रोजेक्ट के चीफ इंजीनियर मेजर जॉन हरमन शामिल थे.
तमाम मौतों और दिक्कतों के बाद भी साल 1902 में पहली बार ट्रेन ने डेविल्स नोज की चढ़ाई पूरी की, जो उस समय इंजीनियरिंग का एक बहुत बड़ा अजूबा था. यह ट्रेन रूट सालों तक चलता रहा, लेकिन साल 1997 में आए एल नीनो तूफान और भारी लैंडस्लाइड्स ने इस ट्रैक को बुरी तरह तबाह कर दिया, जिससे पूरी लाइन बंद हो गई. हालांकि, आज भी पर्यटकों के रोमांच के लिए अलाउसी से सिबाम्बे के बीच का 12 किलोमीटर का हिस्सा खुला रखा गया है, जहां दुनिया भर से लोग इस ‘शैतान की नाक’ वाले ट्रैक पर ट्रेन के सफर का लुत्फ उठाने और खूबसूरत वादियों को देखने आते हैं.