बीते कुछ महीने से वेस्ट एशिया में जिस तरह का संकट देखने को मिल रहा है. उसकी वजह से दुनिया भर के एक्सपोर्ट और इंपोर्ट पर संकट के बदल छाए हुए हैं. लाल सागर से लेकर होर्मुज स्ट्रेट का संकट किसी से नहीं छिपा. माल भाड़े में उछाल जैसी चुनौतियां हर किसी देश के सामने हैं. उसके बाद भी भारत के जुलाई के एक्सपोर्ट और इंपोर्ट के आंकड़ों ने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया है. कॉमर्स मिनिस्ट्री की ओर से जारी आंकड़ों के अनुसार, पश्चिम एशिया में गहराते तनाव और वैश्विक अनिश्चितता के बावजूद जुलाई महीने में भारत का मर्चेंडाइज एक्सपोर्ट 44.2 अरब डॉलर के रिकॉर्ड लेवल पर पहुंच गया है.

जहां एक तरफ वैश्विक मंदी और लॉजिस्टिक्स संकट के चलते एक्सपोर्ट में गिरावट की आशंका जताई जा रही थी, वहीं दूसरी ओर भारतीय सामान ने दुनिया भर के बाजारों में अपनी धाक जमाई है. आखिर पश्चिम एशिया के संकट के बीच भारत ने यह मील का पत्थर कैसे हासिल किया? आइए, आसान और सरल भाषा में समझते हैं भारत के इस रिकॉर्डतोड़ एक्सपोर्ट की पूरी कहानी…
एक्सपोर्ट और इंपोर्ट दोनों में बनाया रिकॉर्ड
वेस्ट एशिया में चल रहे संकट के बावजूद, इंजीनियरिंग सामान और इलेक्ट्रॉनिक्स की वजह से जुलाई में भारत का सामान निर्यात एक साल पहले के मुकाबले 19.63 फीसदी बढ़कर 44.24 बिलियन डॉलर हो गया. लेकिन गुरुवार को जारी सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, ट्रेड डेफिसिट एक साल पहले के 27.88 बिलियन डॉलर से बढ़कर 31.98 बिलियन डॉलर हो गया, क्योंकि निर्यात के मुकाबले आयात में ज्यादा तेजी आई.
जुलाई में फर्टिलाइज़र, पेट्रोलियम, इलेक्ट्रॉनिक्स और कोयले के ज़्यादा आयात के कारण कुल आयात बढ़कर 76.22 बिलियन डॉलर हो गया, जो नौ महीने का सबसे ऊंचा स्तर है. इन कीमती धातुओं पर कस्टम ड्यूटी में भारी बढ़ोतरी के बाद सोना और चांदी का आयात कम हुआ. आंकड़ों से पता चला है कि जहां सोने का आयात सालाना आधार पर 4.77 फीसदी बढ़कर 4.16 बिलियन डॉलर हो गया, वहीं चांदी का आयात 66.1 फीसदी घटकर 171.68 मिलियन डॉलर रह गया. सरकार ने मई में कीमती धातुओं पर आयात शुल्क 6% से बढ़ाकर 15% कर दिया था.
ट्रेड डेफिसिट में उछाल
जून 2026 में ट्रेड डेफिसिट 30.43 बिलियन डॉलर था. जुलाई में अमेरिका भारत का सबसे बड़ा निर्यात गंतव्य और चीन सबसे बड़ा आयात स्रोत था. ये खबर आप क्विक समाचार में पढ़ रहे हैं। वेस्ट एशिया को होने वाले निर्यात में सुधार हुआ और इस क्षेत्र में जुलाई का निर्यात पिछले साल जुलाई के मुकाबले लगभग 8.62 फीसदी ज्यादा रहा. कॉमर्स सेक्रेटरी राजेश अग्रवाल ने कहा कि व्यापार की मात्रा के हिसाब से घाटा बढ़ा है, लेकिन व्यापार के प्रतिशत के तौर पर यह पिछले साल जुलाई के 27.3 फीसदी से घटकर जुलाई में 26.5 फीसदी हो गया है. उन्होंने भारत के ज़्यादा निर्यात का श्रेय अलगअलग बंदरगाहों और शिपिंग लाइनों के ज़रिए होने वाले व्यापार को दिया.
क्यों बढ़ा एक्सपोर्ट और इंपोर्ट?
फेडरेशन ऑफ़ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गेनाइजेशन्स के प्रेसिडेंट एससी राल्हन ने कहा कि ग्लोबल लॉजिस्टिक्स और सप्लाई चेन में लगातार रुकावटों और ज्यादा ट्रांसपोर्टेशन कॉस्ट के बावजूद रिकॉर्ड निर्यात हासिल करना, तेजी से जटिल होते ग्लोबल ट्रेडिंग माहौल में भारतीय व्यवसायों की तेजी से प्रतिक्रिया देने की क्षमता को दिखाता है. अग्रवाल ने कहा कि प्रतिशत के हिसाब से भारत चीन, सिंगापुर, ऑस्ट्रेलिया, स्पेन और मलेशिया में अच्छा प्रदर्शन कर रहा है. उन्होंने कहा कि आसियान में बड़ी तेजी आई है. तंजानिया एक उम्मीद की किरण है.
कॉमर्स और इंडस्ट्री मिनिस्ट्री ने कहा कि सिक्किम में नाथू ला रूट के जरिए बॉर्डर ट्रेड छह साल के अंतराल के बाद 1 अगस्त, 2026 को फिर से शुरू हुआ, जो पारंपरिक क्रॉसबॉर्डर ट्रेड को फिर से शुरू करने और क्षेत्र में आर्थिक संबंधों को मज़बूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है. इस फाइनेंशियल ईयर की अप्रैलजुलाई की अवधि में, कीमतों के असर के कारण पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स की अगुवाई में सामान का एक्सपोर्ट 17.04 फीसरी बढ़कर 173.78 बिलियन डॉलर हो गया.