आधी रात शहर भर में पोस्टर चिपकाकर सुलगाई थी अंग्रेजों के खिलाफ बगावत की आग, कहानी गुमनाम स्वतंत्रता सेनानी हिकमत उल्ला खां की

आधी रात शहर भर में पोस्टर चिपकाकर सुलगाई थी अंग्रेजों के खिलाफ बगावत की आग, कहानी गुमनाम स्वतंत्रता सेनानी हिकमत उल्ला खां की

भारत का स्वतंत्रता संग्राम केवल एक राजनीतिक लड़ाई नहीं, बल्कि लाखों देशभक्तों के त्याग, तपस्या और बलिदान की अमर गाथा है. इसी ऐतिहासिक क्रांति में अपनी अमिट छाप छोड़ने वाले महान स्वतंत्रता सेनानी स्व. हाफिज हिकमत उल्ला खां का जन्म 10 जनवरी 1910 को उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जनपद के ग्राम घेसुपुर में हुआ था. स्व. कुदरत उल्ला खां एवं स्व. फात्मा के आंगन में जन्मे हिकमत उल्ला खां ने किशोरावस्था से ही ब्रिटिश हुकूमत की गुलामी की जंजीरों को तोड़ने का संकल्प ले लिया था.

वर्ष 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान स्व. हाफिज हिकमत उल्ला खां ने मुरादाबाद और आसपास के क्षेत्रों में क्रांति की अलख जगाने में मुख्य भूमिका निभाई थी. अंग्रेजों के दमनकारी शासन को उखाड़ फेंकने के लिए स्व. हाफिज हिकमत उल्ला खां शहर भर में रात के सन्नाटे में ब्रिटिश विरोधी पोस्टर चिपकाते थे. इस साहसिक कदम से पूरे मुरादाबाद क्षेत्र में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ भयंकर जनआक्रोश और हंगामा फैल गया था.

हाफिज हिकमत उल्ला खां केवल शहरों तक सीमित नहीं रहे थे. स्व. हाफिज हिकमत उल्ला खां ने दूरदराज के गांवों में भी सत्याग्रह आंदोलन के समर्थन में ओजस्वी भाषण देकर आम जनमानस में राष्ट्रभक्ति की अलख जगाई थी. देश की आजादी की बलिवेदी पर उनका समर्पित जीवन हर भारतीय के लिए प्रेरणास्रोत है.

ब्रिटिश हुकूमत का दमन, कारावास और यात्रा

आजादी की राह में ब्रिटिश सरकार का दमन चक्र भी स्व. हाफिज हिकमत उल्ला खां के हौसलों को डिगा न सका था. स्वतंत्रता संग्राम के दौरान स्व. हाफिज हिकमत उल्ला खां को अपने महागुरु शेखुल इस्लाम मौलाना हुसैन अहमद मदनी का जेल में सानिध्य मिला था.

हाफिज हिकमत उल्ला खां के साथ स्व. दाऊ दयाल खन्ना, अलीमुद्दीन मौलाना, इफ्तेखार फरीदी, चंद्रदत्त त्यागी, जुगल किशोर और हाफिज कदीर जैसे शीर्ष क्रांतिकारियों ने भी जेल की सलाखें काटी थीं.

धारा 38/121 डी.आई.आर. के तहत 25 फरवरी 1941 को स्व. हाफिज हिकमत उल्ला खां को 8 माह के सश्रम कारावास और 50 रुपये जुर्माने की सजा दी गई थी. जुर्माना न देने पर दो माह अतिरिक्त कैद का प्रावधान था. आंदोलन को दबाने के लिए अंग्रेजों ने स्व. ये खबर आप क्विक समाचार में पढ़ रहे हैं। हाफिज हिकमत उल्ला खां को मुरादाबाद, बरेली से लेकर कैंप जेल चुनार तक स्थानांतरित किया था.

स्वतंत्र भारत में योगदान और राजकीय सम्मान

वर्ष 1942 में 6 माह तक नजरबंद रहे इस महान सेनानी का योगदान आजादी के बाद भी राष्ट्र निर्माण में जारी रहा था. कांग्रेस के शताब्दी समारोह में उनके अमूल्य त्याग और तपस्या के लिए उनका भव्य अभिनंदन किया गया था. इससे पूर्व, 9 अगस्त 1985 को उत्तर प्रदेश के आबकारी मंत्री राजा अजीत प्रसाद सिंह ने स्व. हाफिज हिकमत उल्ला खां को राजकीय स्तर पर सम्मानित किया था.

नागरिक सुरक्षा में मुरादाबाद के सेक्टर वार्डन के रूप में सेवा देने वाले खां साहब ने 1971 के भारतपाक युद्ध के समय समाज में शांति व समरसता बनाए रखी, जिसके लिए सिविल डिफेंस ने उन्हें प्रशंसा पत्र देकर सम्मानित किया था.

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