देश आज 80वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है. इस आंदोलन में लाखों देशवासियों ने हिस्सा लिया. अपने प्राणों की आहुतियां दीं. इनमें बच्चे, बूढ़े, किशोर, महिलाएं, सब शामिल हुए. सबने अपनेअपने तरीके से योगदान दिया और हम आजाद हुए. लेकिन क्या आप उन विदेशी चेहरों को जानते हैं, जिन्होंने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लिया. नेतृत्व किया. आइए, ऐसे ही कुछ प्रमुख चेहरों के बारे में जानते हैं. वे कौन थे? कहां से थे? किस तरह से अपना योगदान दिया?

भारत का स्वतंत्रता संग्राम केवल भारतीय नागरिकों तक सीमित नहीं था. न्याय, स्वतंत्रता और मानवीय गरिमा के इस संघर्ष ने दुनिया भर के कई विचारकों, समाजसेवकों और नेताओं को आकर्षित किया. इनमें से कई विदेशी हस्तियों ने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ आवाज उठाई और भारत को अपनी कर्मभूमि बना लिया.
सी.एफ. ये खबर आप क्विक समाचार में पढ़ रहे हैं। एंड्रयूज: महात्मा गांधी के प्रिय ‘दीनबंधु’
चार्ल्स फ्रीयर एंड्रयूज एक ब्रिटिश पादरी और शिक्षक थे. वे महात्मा गांधी के सबसे करीबी और भरोसेमंद मित्रों में से एक बने. जब गांधी जी दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों के अधिकारों के लिए लड़ रहे थे, तब एंड्रयूज वहां पहुंचे. उन्होंने गांधी जी को भारत लौटकर राष्ट्रीय आंदोलन का नेतृत्व करने के लिए प्रेरित किया.
चार्ल्स फ्रीयर एंड्रयूज.
एंड्रयूज ने भारत के गरीब मजदूरों, गिरमिटिया कामगारों और किसानों की सेवा में अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया. उनके इसी सेवा भाव को देखकर महात्मा गांधी ने उन्हें ‘दीनबंधु’ यानी गरीबों का बंधु नाम दिया. उन्होंने ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीतियों की खुलकर आलोचना की और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की स्वतंत्रता की मांग रखी.
एमन डी वलेरा: नेताजी सुभाष चंद्र बोस के आयरिश मित्र
एमन डी वलेरा आयरलैंड के प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी और बाद में वहां के प्रधानमंत्री व राष्ट्रपति बने. वे और नेताजी सुभाष चंद्र बोस गहरे मित्र थे. आयरलैंड भी ब्रिटिश साम्राज्यवाद से पीड़ित था. इस साझा संघर्ष ने दोनों देशों के क्रांतिकारियों को करीब ला दिया. नेताजी जब 1930 के दशक में यूरोप के दौरे पर थे, तब उनकी मुलाकात डी वलेरा से हुई.
एमन डी वलेरा.
दोनों नेताओं ने ब्रिटिश हुकूमत से लड़ने के तरीकों और रणनीतियों पर विचार साझा किए. डी वलेरा ने नेताजी को राजनयिक सहयोग और नैतिक समर्थन दिया. उन्होंने हमेशा यह माना कि भारत और आयरलैंड की स्वतंत्रता एकदूसरे से जुड़ी हुई है.
एनी बेसेंट: होम रूल आंदोलन की मशाल
ब्रिटेन में जन्मी एनी बेसेंट एक प्रखर वक्ता और समाज सुधारक थीं. वे भारत की संस्कृति और दर्शन से इतनी प्रभावित हुईं कि उन्होंने भारत को ही अपना घर मान लिया. उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में सक्रिय भूमिका निभाई. साल 1916 में उन्होंने बाल गंगाधर तिलक के साथ मिलकर ‘होम रूल लीग’ की स्थापना की. इस आंदोलन ने देश भर में स्वशासन की मांग को जनजन तक पहुंचाया. वे 1917 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की पहली महिला अध्यक्ष बनीं. एनी बेसेंट ने शिक्षा के क्षेत्र में भी बड़ा योगदान दिया और बनारस में सेंट्रल हिंदू कॉलेज की स्थापना की, जो बाद में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय का आधार बना.
एनी बेसेंट.
सिस्टर निवेदिता: भारत की सेवा में समर्पित जीवन
आयरलैंड में जन्मी मार्गरेट एलिजाबेथ नोबल, स्वामी विवेकानंद की शिष्या बनने के बाद ‘सिस्टर निवेदिता’ के नाम से जानी गईं. स्वामी विवेकानंद के विचारों से प्रभावित होकर वे 1898 में भारत आईं. उन्होंने भारतीय महिलाओं की शिक्षा और समाज सेवा में ऐतिहासिक कार्य किया. जब बंगाल में प्लेग फैला, तब उन्होंने अपनी जान जोखिम में डालकर मरीजों की दिनरात सेवा की. सिस्टर निवेदिता ने भारतीय राष्ट्रवाद को कला, साहित्य और राजनीति के जरिए मजबूती दी. उन्होंने अरबिंदो घोष और अन्य युवा क्रांतिकारियों को नैतिक और बौद्धिक समर्थन भी दिया.
सिस्टर निवेदिता.
ए.ओ. ह्यूम: कांग्रेस के संस्थापक ब्रिटिश अधिकारी
एलन ऑक्टेवियन ह्यूम एक ब्रिटिश सिविल सेवक थे. वे भारतीय जनता की समस्याओं और असंतोष को गहराई से समझते थे. सेवामुक्त होने के बाद उन्होंने भारतीय नेताओं को एक राजनीतिक मंच पर लाने का प्रयास किया. उनके इसी प्रयास के परिणामस्वरूप 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुई. ह्यूम का मानना था कि भारतीयों को अपनी बात सरकार तक पहुंचाने के लिए एक संवैधानिक संगठन की जरूरत है. उन्होंने कांग्रेस के शुरुआती अधिवेशनों को संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
एलन ऑक्टेवियन ह्यूम.
मीराबेन: बापू की शिष्या मेडेलीन स्लेड
ब्रिटिश नौसेना के एक उच्च अधिकारी की बेटी मेडेलीन स्लेड ने महात्मा गांधी की जीवनशैली से प्रेरित होकर अपना ऐशोआराम छोड़ दिया. भारत आने के बाद गांधी जी ने उन्हें ‘मीराबेन’ नाम दिया. वे साबरमती आश्रम में रहीं और गांधी जी के साथ स्वतंत्रता संग्राम में कंधे से कंधा मिलाकर चलीं. 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उन्हें आगा खां पैलेस में गांधी जी के साथ नजरबंद भी किया गया था. उन्होंने चरखा कातने, खादी के प्रचार और ग्रामोत्थान में अपना पूरा जीवन लगा दिया.
सैमुअल स्टोक्स: खादी पहनने वाले अमेरिकी सत्याग्रही
अमेरिका के एक अमीर परिवार से ताल्लुक रखने वाले सैमुअल इवान्स स्टोक्स 1904 में भारत आए और हिमाचल प्रदेश के कोटगढ़ में बस गए. उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में प्रत्यक्ष रूप से भाग लिया. स्टोक्स ने विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार किया और खादी अपनाई. वे जलियांवाला बाग हत्याकांड से बहुत आहत हुए और खुलकर कांग्रेस के आंदोलन में कूद पड़े. वे एकमात्र अमेरिकी थे, जिन्हें ब्रिटिश सरकार ने राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर जेल भेजा था. उन्होंने अपना नाम बदलकर ‘सत्यानंद स्टोक्स’ रख लिया था.
जॉर्ज यूल और विलियम वेडरबर्न: कांग्रेस के ब्रिटिश अध्यक्ष
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के शुरुआती दौर में कई उदारवादी ब्रिटिश नेताओं ने भारत के अधिकारों की वकालत की. जॉर्ज यूल 1888 में कांग्रेस के चौथे अधिवेशन के अध्यक्ष बने. वे कांग्रेस के पहले गैरभारतीय अध्यक्ष थे. इसी तरह, सर विलियम वेडरबर्न ने भी दो बार कांग्रेस की अध्यक्षता की. उन्होंने ब्रिटिश संसद में भारतीय मामलों को प्रमुखता से उठाया और भारतीय जनता के पक्ष में लगातार आवाज बुलंद की.
साझी विरासत और विश्वव्यापी आंदोलन
भारत की आजादी की लड़ाई केवल एक भौगोलिक क्षेत्र का संघर्ष नहीं थी, बल्कि यह सत्य और न्याय का वैश्विक आंदोलन था. इन विदेशी विचारकों, नेताओं और समाजसेवकों ने यह साबित किया कि मानवता और न्याय की लड़ाई किसी देश, धर्म या नस्ल की सीमाओं से बंधी नहीं होती. उनका त्याग और समर्पण भारत के स्वतंत्रता संग्राम का एक अविस्मरणीय हिस्सा है.