मक्का से मदीना की वो यात्रा जिसने इस्लामी कैलेंडर की नींव रखी

मक्का से मदीना की वो यात्रा जिसने इस्लामी कैलेंडर की नींव रखी

हिजरी संवत इस्लामी दुनिया का प्रमुख धार्मिक कैलेंडर है. इसे इस्लामी या चंद्र कैलेंडर भी कहा जाता है. इसकी शुरुआत पैगंबर हजरत मुहम्मद साहब की मक्का से मदीना की यात्रा से जुड़ी है. इस यात्रा को हिजरत कहा जाता है. हिजरत का अर्थ है एक स्थान छोड़कर दूसरे स्थान पर जाना. यह यात्रा केवल जगह बदलने की घटना नहीं थी. इसने इस्लाम के इतिहास की दिशा बदल दी. इसी कारण बाद में इस घटना को इस्लामी तारीख गिनने का आधार बनाया गया.

मक्का से मदीना की वो यात्रा जिसने इस्लामी कैलेंडर की नींव रखी

आइए, समझते हैं कि आखिर क्या है हिजरी कैलेंडर की पूरी कहानी? यह इस्लाम के लिए क्यों बेहद महत्वपूर्ण है? हिजरत किसे कहा गया? क्या हैं हिजरी कैलेंडर में 12 महीनों के नाम और भी बहुत कुछ.

हिजरत क्या थी?

सातवीं सदी में मक्का अरब का बड़ा धार्मिक और व्यापारिक केंद्र था. पैगंबर हजरत मुहम्मद साहब ने मक्का में एक ईश्वर, इंसाफ, दया और बराबरी का संदेश दिया. कई लोगों ने इस संदेश को स्वीकार किया, लेकिन कुछ प्रभावशाली लोग इसके विरोध में खड़े हो गए. मुसलमानों पर दबाव बढ़ने लगा. उन्हें परेशान किया गया. उनके सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार की कोशिश हुई. ऐसी स्थिति में पैगंबर साहब और उनके अनुयायियों के लिए सुरक्षित जगह की जरूरत पड़ी. मदीना के लोगों ने उन्हें वहां आने का निमंत्रण दिया. तब पैगंबर हजरत मुहम्मद साहब ने मक्का से मदीना की ओर प्रस्थान किया. यह घटना 622 ईस्वी में हुई. इसी यात्रा को हिजरत कहा गया.

मक्का सातवीं सदी में अरब का बड़ा धार्मिक और व्यापारिक केंद्र था. फोटो: pexels

मक्का से मदीना की यात्रा क्यों महत्वपूर्ण थी?

हिजरत के बाद मुसलमानों को मदीना में एक सुरक्षित समाज बनाने का अवसर मिला. वहां धार्मिक जीवन के साथ सामाजिक व्यवस्था भी विकसित हुई. लोगों के अधिकारों, आपसी जिम्मेदारियों और शांति के सिद्धांतों पर जोर दिया गया. मदीना में अलगअलग समुदायों के बीच समझौते हुए. इस्लामी समाज को संगठित रूप मिला, इसलिए हिजरत को इस्लाम के इतिहास में एक नए दौर की शुरुआत माना जाता है. यह केवल एक धार्मिक घटना नहीं थी. इसका सामाजिक और राजनीतिक महत्व भी था. हिजरत ने संघर्ष से संगठन की ओर बढ़ने का रास्ता दिखाया.

हिजरी कैलेंडर कब शुरू हुआ?

हिजरी काल गणना का आधार 622 ईस्वी की हिजरत है. कहा जाता है कि यह 16 जुलाई को शुरू हुआ था. इस तरह हिजरी कैलेंडर शुरू हुए 1404 साल हो गए. हालांकि, उस समय तुरंत नया कैलेंडर लागू नहीं हुआ था. दूसरे खलीफा हजरत उमर फारूक के शासन काल में इस्लामी तारीखों को व्यवस्थित करने की जरूरत महसूस हुई. तब इसे सलीके से लागू किया गया. सरकारी पत्रों, समझौतों और प्रशासनिक दस्तावेजों में तारीख लिखने को लेकर भ्रम होता था. एक ही महीने और दिन का जिक्र होता था, लेकिन साल का स्पष्ट उल्लेख नहीं होता था. इससे रिकॉर्ड रखने में परेशानी पैदा होती थी. इस समस्या को दूर करने के लिए एक निश्चित संवत शुरू करने का निर्णय लिया गया. कई महत्वपूर्ण घटनाओं पर विचार हुआ. अंत में हिजरत को इस्लामी वर्ष का आधार चुना गया. इस प्रकार हिजरी संवत की औपचारिक शुरुआत हुई.

रमजान हिजरी कैलेंडर का नौवां महीना है. फोटो: pexels

हिजरी वर्ष की गिनती कैसे होती है?

हिजरी कैलेंडर चंद्रमा की चाल पर आधारित है. इसे चंद्र वर्ष कहा जाता है. हर नया महीना नया चांद दिखाई देने के बाद शुरू होता है. इसी कारण कई इस्लामी पर्व चांद दिखने पर तय होते हैं. हिजरी वर्ष में बारह महीने होते हैं. एक महीना आम तौर पर 29 या 30 दिनों का होता है. इस तरह एक हिजरी वर्ष लगभग 354 या 355 दिनों का होता है. इसके विपरीत ग्रेगोरियन कैलेंडर सूर्य पर आधारित है. उसमें एक वर्ष 365 या 366 दिनों का होता है, इसलिए हिजरी वर्ष, अंग्रेजी वर्ष से लगभग 10 से 11 दिन छोटा होता है.

हिजरी कैलेंडर के 12 महीने

हिजरी साल के 12 महीने क्रमश मुहर्रम, सफर, रबीउल अव्वल, रबीउस्सानी, जमादिउल अव्वल, जमादिउस्सानी, रजब, शाबान, रमजान, शव्वाल, जिलकादा और जिलहिज्जा हैं. इनमें कई महीने धार्मिक दृष्टि से विशेष महत्व रखते हैं. रमजान रोजे का महीना है. शव्वाल में ईदउलफितर मनाई जाती है. जिलहिज्जा में हज किया जाता है और ईदउलअजहा आती है.

इस्लामी कैलेंडर की शुरुआत मुहर्रम से होती है. फोटो: pexels

मुहर्रम से साल की शुरुआत क्यों होती है?

हिजरी संवत का पहला महीना मुहर्रम है. हालांकि, हिजरत रबीउल अव्वल के महीने में हुई थी. फिर भी वर्ष की शुरुआत मुहर्रम से तय की गई. इसके पीछे एक व्यावहारिक सोच थी. अरब समाज में मुहर्रम को पहले से महत्वपूर्ण महीना माना जाता था. यह उन महीनों में शामिल था, जिनमें लड़ाईझगड़े से बचने की परंपरा थी. साथ ही, हज के बाद लोग अपने घर लौटते थे और नए सामाजिक व व्यापारिक काम शुरू होते थे. इसलिए मुहर्रम को हिजरी वर्ष का पहला महीना माना गया. इस्लामी परंपरा में चार महीनों जिलकादा, जिलहिज्जा, मुहर्रम, रजब को विशेष सम्मान प्राप्त है. इन महीनों को पवित्र माना जाता है. पुराने अरब समाज में भी इन दिनों में युद्ध रोकने की परंपरा थी. इस्लाम ने शांति, संयम और सम्मान की भावना को और मजबूत किया. मुहर्रम का विशेष धार्मिक महत्व भी है. इस महीने की 10 तारीख को आशूरा कहा जाता है. यह दिन इस्लामी इतिहास की कई महत्वपूर्ण घटनाओं से जुड़ा है.

रमजान का क्या है महत्व?

रमजान हिजरी कैलेंडर का नौवां महीना है. यह मुसलमानों के लिए सबसे पवित्र महीनों में से एक है. इस महीने में रोजे रखे जाते हैं. रोजा केवल भूखेप्यासे रहने का नाम नहीं है. इसका उद्देश्य आत्मसंयम, धैर्य और जरूरतमंदों के प्रति संवेदना पैदा करना है. रमजान के दौरान इबादत, दान और सामाजिक सहयोग पर विशेष ध्यान दिया जाता है. महीने के अंत में चांद दिखने पर ईदउलफितर मनाई जाती है. चूंकि हिजरी वर्ष छोटा होता है, इसलिए रमजान हर वर्ष अंग्रेजी कैलेंडर में लगभग 10 से 11 दिन पहले आ जाता है. इसी वजह से कभी यह गर्मियों में आता है, कभी सर्दियों में.

हज और जिलहिज्जा का क्या है रिश्ता?

जिलहिज्जा हिजरी वर्ष का अंतिम महीना है. इस महीने में दुनिया भर के मुसलमान हज के लिए मक्का जाते हैं. हज इस्लाम के प्रमुख धार्मिक कर्तव्यों में शामिल है. जिलहिज्जा की 10 तारीख को ईदउलअजहा मनाई जाती है. इसे कुर्बानी की ईद भी कहा जाता है. यह त्याग, समर्पण और सेवा की भावना का संदेश देती है.

रोजे, हज, जकात के कुछ हिसाब, ईद, मुहर्रम और अन्य अवसर इसी कैलेंडर से जुड़े हैं.

चांद दिखने का क्या है महत्व?

हिजरी महीनों की शुरुआत चांद दिखने से जुड़ी होती है. इसी कारण रमजान, ईद और अन्य धार्मिक अवसरों की तारीख अलगअलग देशों में कभीकभी अलग हो सकती है. आज खगोलीय गणना से चंद्रमा की स्थिति का अनुमान लगाया जा सकता है. फिर भी कई स्थानों पर स्थानीय रूप से चांद देखने की परंपरा जारी है. यह परंपरा हिजरी कैलेंडर की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का अहम हिस्सा है.

हिजरी कैलेंडर आज भी क्यों जरूरी है?

हिजरी कैलेंडर आज भी मुसलमानों के धार्मिक जीवन का आधार है. रोजे, हज, जकात के कुछ हिसाब, ईद, मुहर्रम और अन्य अवसर इसी कैलेंडर से जुड़े हैं. कई मुस्लिम देशों में सरकारी कामकाज में भी हिजरी तारीखों का उपयोग होता है. भारत सहित अनेक देशों में धार्मिक कार्यक्रमों और इस्लामी दस्तावेजों में हिजरी तारीख लिखी जाती है. यह कैलेंडर केवल तारीखों की सूची नहीं है. यह इतिहास, आस्था और समुदाय की स्मृति है.

संक्षेप में कहें तो हिजरी संवत की कहानी मक्का से मदीना की हिजरत से शुरू होती है. यह यात्रा साहस, धैर्य और नई शुरुआत का प्रतीक है. बाद में इसी घटना को इस्लामी वर्ष की गिनती का आधार बनाया गया. चंद्रमा पर आधारित यह कैलेंडर दुनिया भर के मुसलमानों को धार्मिक अवसरों से जोड़ता है. हिजरी संवत हमें याद दिलाता है कि समय केवल दिन और साल नहीं है. समय इतिहास, संघर्ष, विश्वास और बदलाव की कहानी भी है.

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