दिल्ली बारिश को तरसा, UPबिहार में मानसून मेहरबान, ऐसा क्यों?

दिल्ली बारिश को तरसा, UPबिहार में मानसून मेहरबान, ऐसा क्यों?

दिल्ली में मानसूनी बारिश आई लेकिन रूठकर चली गई. अब यूपीबिहार में बरस रही है लेकिन दिल्ली फिर से तपन का शिकार है. सरल शब्दों में कहें तो यह अंतर केवल किस्मत का खेल नहीं है. इसके पीछे हवा, बादल, तापमान, पहाड़, नदियां, समुद्र और स्थानीय मौसम जैसी कई वजहें होती हैं. मानसून एक बड़ी और जटिल मौसमी व्यवस्था है, इसलिए इसका व्यवहार हर शहर और जिले में अलग दिख सकता है. आइए, समझते हैं कि आखिर ऐसा क्यों होता है? मानसून अक्सर अलगअलग इलाकों से छल क्यों करता है?

दिल्ली बारिश को तरसा, UPबिहार में मानसून मेहरबान, ऐसा क्यों?

मानसून केवल बारिश का नाम नहीं है. यह हवा की दिशा बदलने की एक मौसमी प्रक्रिया है. गर्मियों में भारत की जमीन बहुत गर्म हो जाती है. गर्म जमीन के ऊपर की हवा हल्की होकर ऊपर उठती है. इससे कम दबाव का क्षेत्र बनता है. समुद्र के ऊपर हवा अपेक्षाकृत ठंडी और नम रहती है. यह नमी वाली हवा जमीन की ओर बढ़ती है. यही हवा बादलों का निर्माण करती है. बादल घने होते हैं और बारिश शुरू होती है. भारत में दक्षिणपश्चिम मानसून मुख्य रूप से अरब सागर और बंगाल की खाड़ी से नमी लेकर आता है.

दिल्ली और यूपीबिहार का मौसम अलग क्यों है?

दिल्ली, उत्तर प्रदेश और बिहार एक ही बड़े भौगोलिक क्षेत्र में हैं. फिर भी इनका मौसम समान नहीं होता. दिल्ली उत्तरपश्चिम भारत में स्थित है. उत्तर प्रदेश और बिहार गंगा के मैदानों में फैले हैं. बिहार बंगाल की खाड़ी से आने वाली नमी वाली हवाओं के अपेक्षाकृत अधिक निकट है. बंगाल की खाड़ी से आने वाली मानसूनी हवाएं पहले पूर्वी भारत की ओर बढ़ती हैं. इन हवाओं में भरपूर नमी होती है. जब ये हवाएं बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और आसपास के क्षेत्रों से गुजरती हैं, तो वहां तेज बारिश हो सकती है. दिल्ली तक पहुंचतेपहुंचते कई बार हवाओं की नमी कम हो जाती है. यदि हवा की दिशा अनुकूल न हो, तो दिल्ली में बादल तो दिखते हैं, लेकिन बारिश नहीं होती. मौसम विभाग का कहना है कि 19 जुलाई को दिल्ली में बारिश हो सकती है.

उमस ने किया परेशान

मानसून ट्रफ की बड़ी भूमिका

मानसून ट्रफ एक लंबा कम दबाव वाला क्षेत्र होता है. यह उत्तर भारत के ऊपर बनता है. इसकी स्थिति बदलती रहती है. कभी यह हिमालय की तलहटी के करीब चला जाता है. कभी यह गंगा के मैदानों के ऊपर सक्रिय हो जाता है. जब मानसून ट्रफ उत्तर प्रदेश और बिहार के ऊपर या पास होती है, तो वहां बारिश बढ़ सकती है. बादल लगातार बनते हैं. गरजचमक के साथ तेज वर्षा भी हो सकती है.

अगर यही ट्रफ दिल्ली से दूर खिसक जाए, तो राजधानी में बारिश कम हो सकती है. दिल्ली में उमस बढ़ती है. तापमान भी परेशान कर सकता है. लोगों को लगता है कि मानसून रूठ गया है.

दिल्ली का हाल.

कम दबाव का क्षेत्र कैसे बदलता है खेल?

बंगाल की खाड़ी में अक्सर कम दबाव का क्षेत्र बनता है. इसे लो प्रेशर एरिया भी कहा जाता है. यह क्षेत्र नमी वाली हवाओं को अपनी ओर खींचता है. इसके कारण बड़े पैमाने पर बादल बनते हैं. यदि यह कम दबाव का क्षेत्र ओडिशा, झारखंड, बिहार या पूर्वी उत्तर प्रदेश की दिशा में बढ़ता है, तो इन राज्यों में जोरदार बारिश हो सकती है. कई बार एक ही सिस्टम कई दिनों तक सक्रिय रहता है. इससे लगातार वर्षा होती है. लेकिन अगर यह सिस्टम मध्य भारत या राजस्थान की ओर चला जाए, तो दिल्ली और गंगा के मैदानी इलाकों का बारिश पैटर्न बदल सकता है. इसलिए मौसम विभाग बारबार कम दबाव, चक्रवात और मानसून ट्रफ की स्थिति पर नजर रखता है.

हिमालय का मानसून पर कितना असर?

हिमालय भारत के मानसून में बहुत अहम भूमिका निभाता है. यह पर्वत श्रृंखला मानसूनी हवाओं को उत्तर की ओर निकलने से रोकती है. नमी वाली हवाएं हिमालय से टकराती हैं. इससे बादल ऊपर उठते हैं और बारिश होती है. जब मानसूनी हवाएं हिमालय की तलहटी में अधिक सक्रिय हो जाती हैं, तो उत्तराखंड, हिमाचल, नेपाल सीमा, उत्तर प्रदेश के तराई इलाके और बिहार के उत्तरी हिस्सों में भारी बारिश हो सकती है. कई बार नदियों का जलस्तर तेजी से बढ़ जाता है. दिल्ली हिमालय की तलहटी से कुछ दूरी पर है. इसलिए वहां वही प्रभाव हमेशा नहीं मिलता. अगर हवा का रुख और दबाव की स्थिति सही न हो, तो दिल्ली बारिश से वंचित रह सकती है.

हीटवेव से लोगों का हाल बेहाल

दिल्ली का शहरी ढांचा कितना जिम्मेदार?

दिल्ली जैसे बड़े शहरों में स्थानीय मौसम भी बदलता है. यहां बड़ी इमारतें, सड़कें, वाहन, कंक्रीट और प्रदूषण ज्यादा है. ये चीजें शहर का तापमान बढ़ा सकती हैं. इसे शहरी ऊष्मा द्वीप प्रभाव कहा जाता है. शहर के अलगअलग हिस्सों में तापमान अलग हो सकता है. कहीं बादल बनते हैं, कहीं हवा उन्हें आगे ले जाती है. कई बार दिल्ली के एक हिस्से में तेज बारिश होती है और दूसरे हिस्से में एक बूंद भी नहीं गिरती. प्रदूषण के कण बादलों के बनने की प्रक्रिया को भी प्रभावित कर सकते हैं. इसका असर हर बार एक जैसा नहीं होता, लेकिन यह स्थानीय मौसम को जटिल जरूर बनाता है.

यूपी और बिहार में अधिक बारिश रिकॉर्ड की गई है.

बारिश का वितरण हमेशा समान नहीं होता

मानसून का मतलब यह नहीं कि रोज हर जगह बराबर बारिश होगी. मानसून में सक्रिय और कमजोर दौर आते हैं. कुछ दिन तेज बारिश होती है. फिर कई दिन बारिश कम हो सकती है. इसे मानसून ब्रेक भी कहा जाता है. मानसून ब्रेक के दौरान उत्तरपश्चिम भारत के कुछ हिस्सों में बारिश कम हो सकती है. वहीं हिमालयी क्षेत्रों और पूर्वी भारत में वर्षा जारी रह सकती है. दिल्ली में सूखा सा महसूस हो सकता है, जबकि बिहार में बाढ़ की स्थिति बन सकती है. इसलिए किसी एक दिन या एक सप्ताह के आधार पर पूरे मानसून का फैसला नहीं किया जा सकता. कुल मौसमी वर्षा, बारिश वाले दिनों की संख्या और वर्षा की तीव्रता, तीनों को देखना जरूरी है.

यूपी और बिहार में अधिक बारिश के खतरे भी

तेज बारिश खेती के लिए उपयोगी हो सकती है. धान जैसी फसलों को पर्याप्त पानी मिलता है. तालाब, नहरें और भूजल स्रोत भरते हैं, लेकिन बहुत अधिक बारिश नुकसान भी करती है. बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के कई इलाके नदियों से जुड़े हैं. गंगा, घाघरा, गंडक, कोसी और अन्य नदियों का जलस्तर बढ़ सकता है. नेपाल और पहाड़ी इलाकों में हुई बारिश का पानी भी मैदानी क्षेत्रों तक आता है. इससे बाढ़ का खतरा बढ़ता है. खेत डूब सकते हैं. सड़कें टूट सकती हैं. गांवों का संपर्क कट सकता है. इसलिए ज्यादा बारिश को केवल राहत के रूप में नहीं देखा जा सकता.

दिल्ली में कम बारिश की परेशानी

दिल्ली में मानसून कमजोर रहने पर गर्मी और उमस बढ़ जाती है. बिजली की मांग बढ़ती है. पानी की जरूरत भी बढ़ जाती है. कम बारिश से भूजल भरने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है. बारिश कम होने पर हवा में धूल अधिक रह सकती है. हरियाली पर असर पड़ सकता है. लेकिन विडंबना यह है कि अगर थोड़े समय में बहुत तेज बारिश हो जाए, तो शहर में जलभराव भी होता है. इसका कारण कमजोर जल निकासी व्यवस्था और तेजी से फैला कंक्रीट का ढांचा है.

जलवायु परिवर्तन का भी बढ़ता प्रभाव

जलवायु परिवर्तन मानसून के स्वभाव को और अनिश्चित बना रहा है. कई जगह लंबे समय तक बारिश नहीं होती. फिर अचानक कुछ घंटों में बहुत तेज वर्षा हो जाती है. इसे अत्यधिक वर्षा का घटना कहा जा सकता है. तापमान बढ़ने से हवा अधिक नमी धारण कर सकती है. जब यह नमी एक साथ बरसती है, तो बाढ़ और जलभराव का खतरा बढ़ जाता है. दूसरी ओर, बारिश के बीच लंबे अंतराल सूखे जैसी स्थिति पैदा कर सकते हैं. हालांकि, हर एक बारिश या सूखे को सीधे जलवायु परिवर्तन से जोड़ना सही नहीं है. लेकिन लंबे समय के आंकड़ों में मौसम की अनिश्चितता बढ़ती दिख रही है.

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