Quick Samachar: जिंदगी एक किताब जैसी होती है जिसका हर पन्ना कैसा होगा, उस पर क्या लिखा जाएगा और किस पन्ने को कोरा छोड़ा जाएगा, ये आप तय करते हैं। हर कोई अपने लिए एक खूबसूरत जिंदगी चाहता है, खुशी और प्यार से भरपूर जिंदगी, लेकिन क्या होता होगा जब चीजें वैसी नहीं होती जैसी सोची गईं हो।

आज जब तलाक और ब्रेकअप बहुत आम हो चुके हैं, तब 70 के दशक का गाना ‘मेरा जीवन कोरा कागज’ पहले से कई ज्यादा रिलेटेबल लगता है। आखिर इस गीत में ऐसा क्या था, जिसने आधी सदी बाद भी इसे हर टूटे दिल की आवाज बना दिया। ये गाना सिर्फ टूटे हुए रिश्ते की नहीं बल्कि जीवन में होने वाली अनिश्चितताओं और अधूरे सपनों का दर्द बयां करता है।

गीत ‘मेरा जीवन कोरा कागज’ भारतीय सिनेमा का बेहद भावुक और लोकप्रिय गीत है। ये गीत साल 1974 में आई फिल्म ‘कोरा कागज’ का है। इस गाने के गीतकार एम. जी. हशमत थे, इसका संगीत कल्याणजीआनंदजी ने दिया था और इस गाने के दर्द भरे बोल को अपनी आवाज देने वाले गायक किशोर कुमार थे।

सपनों से शुरू हुआ सफर, खाली पन्ने पर कैसे आकर रुक गया

‘मेरा जीवन कोरा कागज’ सिर्फ एक दुखभरा गीत नहीं है, बल्कि उन सपनों की कहानी है जो प्यार और शादी के बाद पूरे होने चाहिए थे, लेकिन हालात ने उन्हें अधूरा छोड़ दिया। लड़का हो या लड़की, हर कोई अपने नए रिश्ते के लिए एक खुशहाल जीवन की नींव रखता है। प्यार, विश्वास और आपसी समझ के साथ उस नींव को सींचता है।

जब उसमें आपसी समझ, अहंकार का रूप ले लेती है, तो प्यार से खड़ा किया गया वही रिश्ता कमजोर होकर टूटने लगता है। ऐसा ही कुछ ये गाना हमे सिखाता है। सपनों से शुरू हुआ एक दंपति का सफर जो एक दूसरे से बहुत प्यार करते हैं लेकिन उनका आपसी अहंकार उनके रिश्ते को तोड़ देता है। जिसके बाद उनका सफर एक खाली पन्ने पर आकर रुक जाता है।

‘कोरा कागज’ की कहानी: जब प्यार से ज्यादा अहम बन गया अहंकार

साल 1974 में आई फिल्म ‘कोरा कागज’ में इस गाने को जया बच्चन और विजय आनंद पर फिल्माया गया था। ये फिल्म भारत के हर मिडिल क्लास इंसान की कहानी हो सकती है, ये कहना शायद गलत नही है। पति पत्नी के बीच पारिवारिक दखलअंदाजी, गलतफहमियां और रिश्ते में प्यार की जगह अहंकार आ जाना, कई अंदरूनी दूरियों को पैदा कर देता है जो समय के साथ और ज्यादा गहरी होती चली जाती है।

जिसका पता बहुत देर से लगता है। इस फिल्म में ऐसे ही रिश्ते को दिखाया गया है। आजकल ये काफी आम है रिश्तों में प्यार से ज्यादा अहंकार और स्वार्थ को जगह दी जाती है और सफर शुरू होने से पहले ही वो रिश्ते थक जाते है।

किशोर कुमार की आवाज में दर्द क्यों इतना असली लगता है?

उस दौर के बेहतरीन गायकों में से एक किशोर कुमार, अपनी आवाज में ठहराव के साथ साथ अपनी आवाज से उस गाने की भावनाओं और दर्द को बखूबी दिखाने के लिए जाने जाते थे। उन्होंने इस गीत के साथ भी यही किया है। किशोर कुमार अपनी आवाज से हर गीत को सिर्फ सुनने लायक नहीं बल्कि उसे महसूस करने लायक बना देते थे। शायद यही वजह है कि दशकों बाद भी ये गीत लोगों के दिलों को छू जाता है।

हर टूटा रिश्ता बेवफाई से नहीं टूटता, यह गीत यही सिखाता है

हर रिश्ता बेवफाई से ही टूटे, ये जरूरी नहीं है। जब आपसी समझ बनने से पहले ही खत्म होने लगे और उसकी जगह अहंकार और स्वार्थ लेने लगे, तब भी रिश्ते टूट जाते है। शादी से पहले जहां एक दूसरे ने साथ में मिलकर एक प्यारे से जीवन की कल्पना की होती है जब उस कल्पना से बाहर निकलकर उस सच बनाने पर काम किया जाता है तो कई बार एक दूसरे के लिए समय निकालना भारी हो जाता है।

आजकल जब कपल्स अपने करियर की दौड़ में भाग रहे होते हैं तो उस समय एक दूसरे के लिए मुश्किल से समय निकाल पाते हैं। जब दिल में कोई बात थी तब समय नहीं होता है और जब समय होता है तब तक उस बात का वजन ही खत्म हो चुका होता है।

‘मेरा जीवन कोरा कागज, कोरा ही रह गया था’
‘जो लिखा था आंसुओं के संग बह गया’

इस लाइन में कितनी गहरी बात छिपी है कि जिस दुनिया की कल्पना की थी वो वैसी ही रह गई और अगर थोड़ा बहुत उस जैसा जिया भी था तो उन आंसुओं के साथ वो मिट गया जिन आंसुओं को उस काल्पनिक दुनिया की उम्मीद में बहाया था।

धीरे धीरे संवाद की कमी की वजह से रिश्तों में दूरी आना बहुत आम हो जाता है और जीवन की किताब के जिन पन्नों पर एक हसीन दुनिया का सपना देखा होता है वो कहीं पीछे छूट जाता है और वो पन्ना कोरा का कोरा रह जाता है। इस गीत ने बखूबी इस बात को समझाया है।

पांच दशक बाद भी क्यों नहीं पुराना हुआ ‘मेरा जीवन कोरा कागज’?

    आज 50 साल बाद भी ये गाना इसलिए पुराना नहीं हुआ क्योंकि अब तो ये कहानी बहुत आम हो गई है। बदलते दौर, सोशल मीडिया और आधुनिक रिश्तों के बीच भी इसके बोल हर उस इंसान की भावनाओं को छूते हैं जिसने कभी अपने सपनों को टूटते देखा होगा। इस गाने की कालजयी पहचान यही है।