Quick Samachar: तृणमूल कांग्रेस लोकसभा और विधान सभा में खंडखंड हो चुकी है. पहले से टूट चुकी शिवसेनाउद्धव गुट के एक बार फिर से टूटने की चर्चाओं के बीच उत्तर प्रदेश सरकार में डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य और मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने समाजवादी पार्टी के टूटने की संभावना व्यक्त की है. केशव मौर्य ने तो लोकसभा में तीसरे सबसे बड़े दल के टूटने वाले लगभग दो तिहाई सदस्यों की संख्या तक का दावा किया है. इस सूचना में कितनी असलियत है और कितना फ़साना, देखना अभी बाकी है.

आइए, इसी बहाने समझते हैं कि समाजवादी पार्टी कब और कैसे बनी? कबकब टूटी या लोगों ने छोड़ा? कबकब पार्टी में विवाद हुए? अभी कितने सांसदविधायक पार्टी के पास हैं?
समाजवादी पार्टी कब बनी?
समाजवादी पार्टी यानी सपा की स्थापना 4 अक्टूबर 1992 को हुई. इसके संस्थापक मुलायम सिंह यादव थे. मुलायम सिंह यादव उत्तर प्रदेश की राजनीति के बड़े नेता थे. वे तीन बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे. वे देश के रक्षा मंत्री भी रहे. सपा का जन्म जनता दल के बिखराव के बाद हुआ. उस समय देश में मंडल राजनीति, पिछड़ा वर्ग राजनीति और राम मंदिर आंदोलन का दौर था.
उत्तर प्रदेश की राजनीति तेजी से बदल रही थी. मुलायम सिंह यादव ने इसी दौर में एक अलग राजनीतिक रास्ता चुना. उन्होंने समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक न्याय को पार्टी का आधार बनाया और एक नई राह चुनकर आगे बढ़े.
सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव.
सपा कैसे बनी?
सपा किसी अचानक बने दल का नाम नहीं था. इसकी जड़ें समाजवादी आंदोलन में थीं. डॉ. राममनोहर लोहिया की राजनीति का असर इस पार्टी पर साफ दिखा. मुलायम सिंह यादव खुद लोहिया की विचारधारा से प्रभावित थे. जनता दल में कई गुट बन रहे थे. राष्ट्रीय स्तर पर दल कमजोर हो रहा था. ऐसे में मुलायम सिंह यादव ने अपने समर्थकों के साथ अलग दल बनाया. यह दल खास तौर पर उत्तर प्रदेश में तेजी से उभरा. पार्टी ने किसानों, पिछड़ों, मजदूरों, युवाओं और अल्पसंख्यकों को अपना मुख्य आधार बनाया. सपा का चुनाव चिन्ह साइकिल है. यह चिन्ह आम आदमी, मेहनत और सरलता का प्रतीक माना जाता है.
शुरुआती दौर और पहला बड़ा उभार
सपा बनने के बाद जल्दी ही उत्तर प्रदेश की राजनीति में मजबूत हो गई. 1993 में सपा ने बहुजन समाज पार्टी के साथ गठबंधन किया. उस समय नारा चला था, मिले मुलायमकांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्रीराम. इस गठबंधन ने भाजपा को सत्ता से रोका. मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने. लेकिन यह गठबंधन ज्यादा दिन नहीं चला. 1995 में सपा और बसपा के रिश्ते टूट गए. इसी दौर में लखनऊ का चर्चित गेस्ट हाउस कांड हुआ. यह सपा के इतिहास का सबसे बड़ा विवाद माना जाता है. इसके बाद सपा और बसपा लंबे समय तक कट्टर विरोधी बन गईं.
आजम खान.
कबकब लोग सपा से अलग हुए?
सपा में कई बार बड़े नेता अलग हुए. उनमें से कुछ बाद में लौटे भी. राज बब्बर सपा के बड़े चेहरे रहे. बाद में वे पार्टी से अलग हुए और कांग्रेस में चले गए. बेनी प्रसाद वर्मा भी मुलायम सिंह यादव के पुराने साथी थे. वे भी सपा छोड़कर कांग्रेस में गए. केंद्र में मंत्री बने. बाद में वे फिर सपा के करीब आए. आजम खान 2009 में पार्टी से नाराज हुए. उनकी नाराजगी का बड़ा कारण कल्याण सिंह से सपा की नजदीकी बताई गई. बाद में आजम खान फिर सपा में लौटे. अमर सिंह भी सपा के प्रभावशाली नेताओं में गिने जाते थे. वे मुलायम सिंह के करीबी थे, लेकिन 2010 में उन्हें पार्टी से निकाला गया. जया प्रदा भी उसी दौर में सपा से अलग हुईं. बाद में अमर सिंह की पार्टी में वापसी हुई, लेकिन पुराने जैसे हालात नहीं बने.
शिवपाल सिंह यादव और अखिलेश यादव.
तब हुई सपा में सबसे बड़ी टूट
सपा में सबसे बड़ी टूट 201617 में दिखी. यह टूट परिवार के अंदर थी. एक तरफ अखिलेश यादव थे. दूसरी तरफ शिवपाल सिंह यादव और मुलायम सिंह यादव का पुराना संगठन था. टिकट बंटवारे और नेतृत्व को लेकर बड़ा विवाद हुआ. चुनाव आयोग तक मामला पहुंचा. अंत में साइकिल चुनाव चिन्ह अखिलेश यादव गुट को मिला. अखिलेश यादव पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने. सगे चाचा शिवपाल सिंह यादव ने बाद में अलग पार्टी बनाई. उसका नाम प्रगतिशील समाजवादी पार्टी लोहिया था. हालांकि 2022 के बाद शिवपाल फिर सपा के साथ आ गए. साल 2024 में स्वामी प्रसाद मौर्य ने भी सपा छोड़ी. उन्होंने अपनी अलग राजनीतिक राह चुनी. 2024 के राज्यसभा चुनाव में भी सपा के कुछ विधायकों की क्रॉस वोटिंग ने पार्टी के भीतर असंतोष दिखाया.
सपा में कबकब बड़े विवाद हुए?
- सपा का पहला बड़ा विवाद 1995 का गेस्ट हाउस कांड था. इसने सपाबसपा संबंधों को लंबे समय तक खराब रखा.
- दूसरा विवाद 2009 के आसपास हुआ. सपा की कल्याण सिंह से नजदीकी पर आजम खान नाराज हुए. इससे मुस्लिम वोट बैंक को लेकर सवाल उठे.
- तीसरा विवाद अमर सिंह को लेकर रहा. उन पर पार्टी में ज्यादा प्रभाव रखने के आरोप लगे. कई पुराने समाजवादी नेता इससे असहज थे.
- चौथा विवाद 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों के समय हुआ. उस समय उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव की सरकार थी. विपक्ष ने कानूनव्यवस्था पर सवाल उठाए.
- पांचवां और सबसे बड़ा आंतरिक विवाद 201617 का पारिवारिक विवाद था. इसने पार्टी को दो हिस्सों में बांट दिया. अखिलेश यादव ने संगठन पर पकड़ बनाई. मुलायम सिंह यादव की भूमिका कम हो गई.
- 2024 के राज्यसभा चुनाव में क्रॉस वोटिंग भी बड़ा विवाद बनी. इससे पार्टी अनुशासन पर सवाल उठे.
अभी सपा के कितने सांसद हैं?
साल 2024 लोकसभा चुनाव में सपा ने बेहतरीन प्रदर्शन किया. पार्टी ने उत्तर प्रदेश में 37 लोकसभा सीटें जीतीं. इससे सपा लोकसभा में देश की तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बन गई. वर्तमान में राज्यसभा में सपा के चार सदस्य हैं.
समाजवादी पार्टी ने लोकसभा चुनाव में 37 सीटें जीती थीं.
अभी सपा के कितने विधायक हैं?
साल 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में सपा ने 111 सीटें जीती थीं. बाद में उपचुनाव, अयोग्यता, इस्तीफे, निधन और दलबदल के कारण संख्या बदली. उपलब्ध ताजा सार्वजनिक सूचियों के अनुसार उत्तर प्रदेश विधानसभा में सपा के करीब 102 विधायक हैं. महाराष्ट्र विधानसभा में भी सपा के दो विधायक हैं.
#WATCH | Kanpur | Uttar Pradesh Deputy CM Keshav Prasad Maurya says, “2526 MPs of the Samajwadi Party are ready to break away, but we are not breaking away at all. We know that they will themselves break away from the party…”
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— ANI UP/Uttarakhand June 17, 2026
सपा की मौजूदा स्थिति कैसी है?
आज सपा का नेतृत्व अखिलेश यादव के हाथ में है. मुलायम सिंह यादव का निधन 2022 में हो गया. उसके बाद पार्टी पूरी तरह नई पीढ़ी के नेतृत्व में आ गई. 2024 लोकसभा चुनाव ने सपा को नई ताकत दी. पार्टी ने भाजपा को उत्तर प्रदेश में बड़ी चुनौती दी. सपा अब खुद को पिछड़ों, दलितों, अल्पसंख्यकों, किसानों और युवाओं की पार्टी के रूप में पेश करती है. पार्टी पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक फार्मूले पर जोर देती है.
समाजवादी पार्टी 1992 में बनी. इसका आधार समाजवाद और सामाजिक न्याय रहा. पार्टी ने कई उतारचढ़ाव देखे. कभी सपाबसपा गठबंधन बना. फिर वह टूट गया. कई बड़े नेता पार्टी छोड़ गए. परिवार में भी संघर्ष हुआ. फिर भी सपा उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी विपक्षी ताकत बनी हुई है. आज सपा अखिलेश यादव के नेतृत्व में आगे बढ़ रही है. साल 2024 के बाद पार्टी का राष्ट्रीय कद बढ़ा है. 2027 के विधान सभा चुनाव में सपा की असली परीक्षा फिर उत्तर प्रदेश में होगी.
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